Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: “क्या हुआ तुम्हारा?” मैंने कार में उसके बैठते ही पूछा। उसके चेहरे पर गुस्से और शांति का वही बेजोड़ तालमेल था, जो मुझे परेशान कर देता है।

“मेरा क्या होना था?”

“कल की बात पूछ रहा हूँ।” कल उसे लड़के वाले देखने आने थे।

“मत पूछो तो अच्छा होगा।”

“कोई कांड तो नहीं कर दिया?” मेरे मुँह से निकल ही गया।

“अच्छा, तुम्हें भी बिना कोई बात जाने यही लगता है कि, मैंने कोई कांड किया होगा?”

“अरे नहीं यार, क्या हुआ बताओ तो?”

“होना क्या है, हम तो सामान हैं न। हो गया देखना-परखना और डील बता दी गई है। अब ख़रीदार की तरफ़ से हाँ-ना आना बाकी है।”

“ऐसा क्यों बोल रही हो?”

“और क्या बोलूँ? मुझे कल ऐसा लगा जैसे हम लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई भी हमारी क़ीमत बढ़ाने के लिए ही कराई जाती है। जितने काम हमें आते हैं वे सब हमारी थोड़ी-थोड़ी क़ीमत बढ़ाते जाते हैं। हमारी डिग्री-विग्री तो बस इसलिए है कि, हमे कोई ढंग का लड़का और परिवार ख़रीद ले, कोई प्रोडक्टिव यूज़ नहीं उनका।”

“इतना क्यों चिढ़ती हो। हर किसी के साथ ऐसा होता है और लड़कियाँ ही नहीं लड़कों की वैल्यू भी तो उनकी डिग्री, कमाई और घर से लगाई जाती है ना?”

“हाँ, उसे ही मैं ‘प्रोडक्टिव यूज़’ कह रही हूँ। जब घर का ही काम कराना है, तो काहे को इतना बॉयोडाटा देखना। दो-चार चीजें बनवाकर और झाडू-पोंछा लगवा कर देख लो। काम तो आपके वही आना है।”

“घर के कामों से तुम्हें दिक्क़त तो नहीं थी कुछ। तुम तो सब करती ही हो।”

“करती हूँ और करूँगी क्यों नहीं। घर के काम, क्या काम नहीं होते? मुझे तो अच्छा ही लगता है क़रीने से घर रखना और नए-नए आइटम बनाना। लेकिन मैं सिर्फ़ इन्हीं कामों के लिए पैदा हुई हूँ क्या?”

“नहीं, ऐसा नहीं है। लेकिन एक बार तो लड़के-लड़की देखने में यह सब दोनों तरफ़ से देखा ही जाता है।”

“हाँ, लेकिन लड़के को इंसान की तरह देखा जाता है और हमें? उस लड़के की माँ ने मेरे हाथ अपने हाथों में लेकर ऐसे देखे, जैसे लम्बाई-चौड़ाई नाप रही हो और पाँच-पाँच उँगलियाँ से कम ज़्यादा तो नहीं हैं यह देखने के लिए मेरे पैर भी ऊपर कराकर देखे। मुझसे हिन्दी-इंग्लिश पढ़ाकर देखा कि मेरी डिग्रीयाँ फ़र्ज़ी तो नहीं। मेरे बाल छूकर और सहलाकर उनकी क्वालिटी और शायद असली रंग का अंदाज़ा लगा रही थी। मेरी स्लीव्स ऊपर कराकर मेरा रंग देखा और कहती है ‘बेटा बुरा मत मानना, आजकल चेहरे-वेहरे पर तो इतना मेकअप लगा होता है कि, असली रंग का पता ही नहीं चलता।’ मेरा बस चलता तो उस बुढ्ढ़ी हरामज़ादी को उसके सब रंग का पता चला देती।”

“ऐसा कौन करता है यार आजकल। यह तो बहुत ही गलत किया उन्होनें। तुमने मना क्यों नहीं कर दिया।”

“मैंने ऐसे-ऐसे जवाब दिए हैं कि, बहुत निर्लज होंगे तभी हाँ करेंगे और हाँ किए, तो फिर मैं मना करूँगी।”

“हर तरह के लोग अब भी होते हैं दुनिया में। तुम दूसरों के ख़राब व्यवहार के लिए ख़ुद क्यों जलभुन रही हो? भाड़ में जाने दो उन्हें।”

“कभी-कभी तो मन में आता है कि,‘हाँ’ हो जाए और मैं उसके घर जाकर अच्छे से नाच नचाऊँ उस पूरे ख़ानदान को।”

“अबे, बदला लेने में अपनी ज़िंदगी क्यूँ ख़राब करनी। उस बुढ़िया की कोई फोटो है क्या तुम्हारे पास?”

“हाँ! मेरे पास तो दुनिया का कोई दूसरा काम बचा नहीं है, जो मैं उस बुढ़िया की फोटो सीने से लगाकर घूमूँ।”

मैंने कार एक किनारे रोकी और उससे नीचे आने को कहा। फुटपाथ के एक पेवर ब्लॉक की ओर इशारा करते हुए कहा- “इसमें तुम उस बुढ़िया और बगल वाले में उस लड़के का चेहरा इमेजिन करो।”

“चाहते क्या हो तुम?”

“अरे करो तो…”

“हाँ कर लिया।” उसने उपेक्षा से कहा।

“अब देखते हैं कितनी नफ़रत तुमने इकठ्ठी की है, इन माँ-बेटे के लिए…एक, दो, तीन…पूरी ताक़त से थूको इन पर…” हम दोनों ने बार-बार उन पर थूका और हँसते-हँसते गालियों के सैलाब बहाते, अपने-अपने पेट पकड़े अपनी सीटों की तरफ़ बढ़ गए।