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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

कृषि विभाग से रिटायर हुए सदानंद अब लगभग 75 साल के हो चुके हैं। बेटी रीना शादीशुदा है और बंगलुरु में रहती है। सप्ताह में एक बार पापा को फोन जरूर कर लेती है। पति-पत्नी दोनों आईटी क्षेत्र में काम करते हैं। कभी रात की और कभी दिन की शिफ्ट होती है। जब छुट्टी होती है तो दिल करता है ढंग से खाया पिया जाए, आराम फरमाया जाए और बीच-बीच में कुछ मित्रों के साथ तफरी हो जाए। छुट्टियाँ बहुत कम मिलती हैं और जब मिलती हैं तो ससुराल जाना जरूरी होता है।

इस सबके बावजूद जैसे-तैसे समय निकाल कर पिता से मिलने भी आ जाती है। आते ही घर के जाले उतार कर, डस्टिंग करके तथा सभी चीजों को करीने से टिकाने का काम करती है। पूरे घर के कपड़े धो डालती है, गर्म कपड़े बॉक्स में डालके हल्के सूती कपड़े निकाल कर रख देती है। पिता को हॉस्पिटल ले जाती है। डॉक्टर से कंसल्ट करती है और सारे टेस्ट करवाती है। दो-चार महीनों की दवाइयां अलग-अलग लिफाफों में डाल कर पिता को समझा देती है। कैसे एक सप्ताह सरपट रफ्तार से गुजर जाता है और कब बेटी की वापसी का समय आ जाता है, सदानंद को पता ही नहीं चल पाता। पांच साल पहले पत्नी का देहांत हो गया था। सदानंद अब बिलकुल अकेले हैं और पत्नी बात-बेबात याद आती ही रहती है।

बेटा अतुल पन्द्रह साल से अपने परिवार के साथ अमेरिका में रहता है। उसकी ये जिद्द थी कि उसे विदेश ही जाना है। सदानंद ने अपनी सारी कमाई बेटे को बाहर भेजने में लगा दी। बैंक से लोन भी लिया यही सोच कर कि बेटा किसी तरह से विदेश में सैट हो जाए तो चैन की साँस मिले और जिंदगी मजे में गुजरे। अतुल विदेश चला गया, उसे नौकरी भी मिल गई और शादी भी वहीं कर ली। शुरू-शुरू में अतुल हर सप्ताह पिता को फोन करके हाल-चाल पूछ लेता तो सदानंद की खुशी का ठिकाना न रहता। पड़ोस में सभी को बताता कि बेटे का अमेरिका से फोन आया था, कहता है हम दोनों को भी वह साथ लेकर जाएगा। धीरे-धीरे अतुल दो हफ्ते में एक बार फोन करने लगा फिर कभी-कभी पूरा महीना भी गुजर जाता। अबकी बार तो तीन महीने गुजर गए अतुल का फोन आए। पिता को चिंता होने लगी कि अतुल ठीक भी है या नहीं, कहीं बीमार तो नहीं हो गया? अचानक फोन की घंटी बजी, ये तो अतुल का फोन था: सॉरी पापा, ऑफिस में काम थोड़ा ज्यादा हो गया है और एक एग्जाम भी देना था तो फोन नहीं कर पाया।

आप कैसे हैं पापा? माँ तो ठीक है ना? अपना ख्याल रखना, पापा! घर के खर्चे के लिए कुछ पैसों की जरूरत हो तो बता देना। सदानंद का सधा हुआ जवाब था: नहीं बेटा हम दो जनों का खर्चा ही कितना है? मेरी पेंशन से हमारा गुजारा ठीक चल रहा है, जरूरत पड़ेगी तो तुम्हें बता देंगे, अपना ख्याल रखना बेटा, बहू को हमारा आशीर्वाद! वक्त गुजरता गया। अब अतुल का फोन छः-सात महीनों में एक बार आने लगा। सदानंद भी बीमार पत्नी की देखभाल करने में व्यस्त हो गए। पत्नी को बीपी व शुगर दोनों हो गए थे, सुनना तो जैसे बिलकुल ही बन्द हो गया। फोन पर बात न सुनने के कारण वो सदानंद से पूछती रहती: अतुल का फोन आया था? कैसा है वो? और सदानंद झूठ ही कह देते कि अतुल का फोन आता रहता है, हर बार तुम्हारे बारे में पूछता है, तुम्हारे इलाज के लिए उसने कुछ पैसे भी भेजे हैं। यह कहकर सदानंद की आँखें भर आतीं और अपने बिस्तर पर आकर लेट जाते। और फिर इंतजार करने लगते कि अतुल का फोन कब आए। हमेशा फोन को अपने बिलकुल करीब रखकर सोते, ना जाने कब फोन आ जाए और कहीं मैंने घंटी ना सुनी तो।

और लो, अब माँ को संभालने अतुल और उसका परिवार पहुंच गया। सदानंद को लगा कि जीवन सफल हो गया। बीमार माँ भाव विह्वल हो उठी, जैसे कि उसे कोई बीमारी थी ही नहीं। अतुल ने माँ के सारे टेस्ट करवाए, अच्छे डॉक्टरों से सलाह मशविरा किया। हफ्ते दस दिन बाद अतुल के बच्चे बोर होने लगे, पत्नी को भी वापस लौटने की बेसब्री होने लगी। आखिर अतुल ने जल्दी ही वापस आने को कहते हुए सपरिवार अमेरिका की फ्लाइट पकड़ ली।

अब तो अतुल का फोन लम्बे अर्से के बाद ही आता था। सदानंद को भी अंदाजा हो चला है कि अब अतुल को उनकी नहीं बल्कि अपने परिवार और नौकरी की अधिक चिंता है। लम्बी बीमारी के चलते पत्नी का देहांत हो गया। इस बार अतुल अकेला आया। तमाम क्रिया कर्म करके वापस जाने से पहले कहने लगा: पापा आप अब अकेले नहीं रहोगे, मेरे साथ चलो। सदानंद का विरक्त सा जवाब था: बेटा, मैं घर को ताला नहीं लगा सकता, मेरे सब दोस्त, जान-पहचान के लोग, रिश्तेदार सभी यहीं पर तो हैं, मेरा ध्यान रखने के लिए। वैसे भी, वहाँ जाकर मैं करूँगा भी क्या? तुम मेरी चिन्ता मत करो, वापस जाकर अपनी नौकरी और परिवार को संभालो। अतुल ने एक गहरी साँस लेते हुए पिता से विदाई ली।

सदानंद को अब अकेलापन खलने लगा। वक्त गुजरता गया और जीने के अर्थ को समझने की कसमसाहट दिल को कचोटने लगी। शरीर भी उम्र के साथ-साथ वक्त-बेवक्त छोटे-बड़े झटके देता रहा। अब बेटे के फोन की प्रतीक्षा भी अनावश्यक लगने लगी। फिर भी मन में रहता था कि इस बार अतुल का फोन आया तो कहूंगा: बेटा! तुमसे बहुत सी बातें करनी हैं, जिंदगी का अब कोई भरोसा नहीं कब चल बसूं, वसीयत लिख दी है, घर जमीन, बैंक अकाउंट का हिसाब अभी करना है। एक बार घर आ जाओ तो सब कुछ तुम्हें सम्भलवा दूँ। लेकिन, फिर वही उदासी और वही अकेलापन। सदानन्द अब सुबह-शाम अपनी बालकनी में बैठ जाते हैं और आते-जाते लोगों को निहारते रहते हैं। कभी कोई साइकिल वाला, कोई स्कूटर वाला, दूध वाला, सब्जी वाला, प्रेस वाला सभी सदानंद को नमस्ते अंकल कहकर गुजर जाता है। जब कोई गाड़ी घर के नजदीक आकर धीमी हो जाती है तो सदानंद का दिल धड़कने लगता है कहीं अतुल तो नहीं आ गया। लेकिन गाड़ी के गुजर जाने के बाद उनकी बूढ़ी आँखें दूर तक ना जाने क्यों निहारती रहती हैं। यकायक सदानंद घर के अंदर तेजी से घुसते हैं, उन्हें लगा फोन की घंटी बजी है। फोन को शांत देखकर वे फिर बालकनी में बैठ जाते हैं और सड़क के दोनों ओर से गुजरने वालों के साथ बिना बोले ही उन के साथ अपना रिश्ता जोड़ते-तोड़ते रहते हैं। कई बार तो सड़क के दोनों ओर आने-जाने वालों की तरफ देखकर गर्दन को यूँ हिलाते हैं जैसे कि उनसे मूक वार्तालाप चल रहा हो। अब आने-जाने वालों की चहल-पहल ही उनकी दुनिया है, ये ही उनके अपने हैं। लेकिन फोन की घण्टी अब भी कभी-कभी बिना बोले ही सुनाई देने लगती है। रात को भी फोन अपने नजदीक रखकर सोते हैं, पता नहीं कब घण्टी बोल उठे।

साल भर से कोविड के दौर ने तो इतना अकेला कर दिया कि जीवन बेमानी सा लगने लगा। चहल-पहल बेरौनक-सी हो गयी, खाना-पीना बेस्वाद सा। अतुल की अपने पिता को सुरक्षित रहने की बार-बार हिदायतें आने लगी जैसे कि कुछ अनहोनी की आशंका पापा की बजाए बेटे को अधिक है। अखबार, टीवी, आस-पड़ोस ने कुछ ऐसा माहौल बना दिया कि सदानंद को अपने बारे में अनेकों बार बहम होने लगता कि उसके सांस में कहीं खिंचाव-सा है। कभी-कभी शरीर में हरारत का-सा एहसास हल्के बुखार का शक पैदा करता रहता लेकिन थर्मामीटर हर बार पारा 98.4 डिग्री ही दिखाता है। शायद नया थर्मामीटर खरीदने की आवश्यकता है जो सही टेम्प्रेचर बताए। फिर जेहन में आता कि थर्मामीटर खराब थोड़े ही है। इसी उहापोह के चलते सदानन्द को वास्तव में ही बुखार और खींचते हुए श्वास का एहसास इतना यकीनी हो गया कि थर्मामीटर से जाँचने की आवश्यकता ही महसूस होनी बंद हो गयी। अब तो आइसोलेशन में रहना ही होगा। मन में अनेकों क्यास उठने लगे कि शायद सब्जी वाले से या दूध वाले से या ब्रेड वाले से या इससे या उससे कोरोना ने अपनी चपेट में ले ही लिया। बेचैनी ने मन और शरीर को अपनी गिरफ्त में ले लिया। अंत कैसा होगा इस बारे में ऊल-जलूल ख्यालों ने जीवन को दुःस्वप्न का सा रूप दे दिया। कभी सांसें अत्यंत धीमी सी लगती तो कभी द्रुतगति वाली। कभी लगता कि सब ठीक-ठाक है और यूँही मन में बेवजह उठने वाली उलझनें ही तमाम परेशानियों का सबब हैं। लेकिन, शरीर तो नीमहोशी की सी हालत में जा रहा है और मन की कारगुजारियां कभी पत्नी को सामने खड़े हुए देखती हैं, कभी बेटी को और कभी जवानी के वलवले फिल्म के स्क्रीन की मानिद दौड़ लगा रहे हैं।

अचानक आधी रात को फोन की घंटी बजी। अतुल का ही फोन था: कैसे हैं पापा आप? सॉरी पापा कम्पनी वालों ने ट्रेनिंग पर यूरोप भेज दिया था और आपको खुशी होगी कि मेरी प्रोमोशन हो गई है। ऑफिस की जिम्मेदारी अब और भी बढ़ गई है। बच्चों के एडमिशन भी करवाने थे, एक मिनट की भी फुर्सत नहीं मिल पा रही है। आप ठीक हैं न पापा! दवाई तो ठीक से ले रहे हो ना? कभी नींद ना आये तो वो छोटी वाली गोली ले लिया करो जो मैं आपको समझा कर गया था। अपने खाने का भी पूरा ख्याल रखना, कैल्शियम, मल्टीविटामिन, ग्रीन वेजिटेबल और फ्रूट जरूर लेते रहना। अपना ख्याल रखना पापा! टेक केयर, पापा! प्लीज टेक केयर। और यह सब सुनते, ना सुनते सदानन्द के हाथ से मोबाईल गिरकर बिस्तर से फर्श पर लुढ़क गया लेकिन उसमें से लगातार आवाज आ रही थी: टेक केयर पापा, टेक केयर!

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’