Hindi Immortal Story: “अंग्रेज हम भारतवासियों को लूटकर कंगाल बना रहे हैं। हमारे देश में आकर भी वे मालिक बनकर रह रहे हैं और करोड़ों भारतीय अपमान का जीवन जी रहे हैं। तो फिर अंग्रेजी शासन के खजाने को लूटना गुनाह क्यों है? हम अंग्रेजों का खजाना लूटकर उससे हथियार खरीदेंगे और अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की मशाल जलाएँगे।”
जिस समय महान क्रांतिकारी बिस्मिल क्रांति-पथ के अपने साथियों को यह समझा रहे थे, सबकी आँखों में एक नई ज्वाला थी। देश के लिए कुछ करने की घड़ी सामने आ गई थी। और हर कोई उसके लिए त्याग और बलिदान करने तथा अपना जीवन दाँव पर लगाने के लिए बेसब्र था।
ये रामप्रसाद बिस्मिल ही थे, जिन्होंने यह समझ लिया था कि बिना हथियार उठाए अंग्रेज यहाँ से जाने वाले नहीं हैं। जगह-जगह क्रांति और विद्रोह की मशाल जलाकर ही उन्हें यहाँ से भगाया जा सकता है? और तभी हमारा देश फिर से अपने पुराने गौरव को हासिल करेगा तथा भारत की जनता खुशहाल होगी।
देश में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह और क्रांति का बिगुल बजाने के लिए, वे जगह-जगह अलख जगाते घूम रहे थे। ताकि देश के लिए मर मिटने की तमन्ना वाले युवक आगे आएँ और अंग्रेजी शासन के खिलाफ मिलकर लड़ाई लड़ें।
उन्हें ऐसे वीर और उत्साही युवक मिलते गए और धीरे-धीरे क्रांतिकारियों का एक छोटा सा दल बन गया। अपनी गतिविधियों को अंग्रेजी शासन के अधिकारियों से गुप्त रखते हुए, वे धीरे-धीरे एक बड़ी लड़ाई की योजना बनाने लगे। और तभी बनी काकोरी कांड की वह योजना, जिसने पूरे देश में सनसनी फैला दी और अंग्रेज सरकार थरथरा उठी। इसके पीछे रामप्रसाद बिस्मिल की ही जोशभरी प्रेरणा थी।
हमारे देश के स्वाधीनता संग्राम में जिन क्रांतिकारियों ने हँसते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए, उनमें रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ अलग दिखाई पड़ता है। वे एक महान क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि भारत में अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ उठ खड़े हुए क्रांतिकारी आंदोलन के अगुआ और वीर नायक भी थे। रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की क्रांतिकारी गतिविधियों और वीरतापूर्ण कारनामों ने अंग्रेजी सत्ता को हिला दिया। अंग्रेज रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से थर-थर काँपते थे। दूसरी ओर भारतीय जनता में इससे जोश की नई लहर उमड़ पड़ी थी। जगह-जगह अंग्रेजों का विरोध हो रहा था। बच्चा-बच्चा पुकारने लगा था, ‘हम आजादी लेकर रहेंगे!’
अंग्रेजी सरकार रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ को पकड़ने के लिए रात-दिन एक किए हुए थी। लेकिन बिस्मिल इससे डरने वाले कहाँ थे! उन्होंने गुपचुप क्रांतिकारियों का एक संगठन बना लिया था। अंग्रेजों के खिलाफ और भी जोर-शोर से लड़ाई छेड़ दी। संगठन के लिए धन की आवश्यकता थी। बिस्मिल ने कहा, “हम अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटेंगे!” योजना बनी और क्रांतिकारी अपने काम में लग गए। इतिहास में क्रांतिकारियों के इस साहसिक कार्य को काकोरी-कांड के नाम याद किया जाता है। अंग्रेज सरकार इससे हक्की-बक्की रह गई थी।
कुछ समय बाद रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ पकड़े गए। उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई। लेकिन उनके चेहरे पर अपूर्व शांति और तेज था।
19 दिसंबर, 1927 को उन्हें फाँसी दी जानी थी। फाँसी से पहले उनकी माँ और पिता उनसे मिलने आए। बिस्मिल लपककर उनके चरणों में जा गिरे। माँ-पिताजी दोनों ने उन्हें उठाकर गले लगाया। यह अंतिम मिलन था।
उस समय रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की आँखें भरी हुई थी। बिस्मिल की माँ भी वीर स्त्री थीं। उन्हें अपने बेटे पर गर्व था कि वह अपने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर रहा है। पर उसकी आँखें भरी देखकर माँ ने सोचा कि कहीं यह मौत से डर तो नहीं गया? बोलीं, “बेटा, तुम्हारी आँखों में आँसू!”
बिस्मिल एकदम तनकर खड़े हो गए। बोले, “माँ, मुझे मौत का डर होता तो मैं यह रास्ता चुनता ही क्यों? ये खुशी के आँसू हैं। तुम धन्य हो माँ, तुम्हारा बेटा धरती माँ के काम आया।”
यह कहते हुए बिस्मिल के चेहरे पर अनोखी मुसकान थी। गर्व से उनका माथा दमक रहा था।
फाँसी के तख्ते की ओर जाते हुए भी बिस्मिल ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष कर रहे थे। वे फाँसी के तख्ते पर चढ़े और शेर की भाँति दहाड़कर इन शब्दों में गर्जना की—
मरते बिस्मिल, रोशन, लहरी, अशफाक अत्याचार से,
होंगे पैदा सैकड़ों इनके रुधिर की धार से!
ऐसे वीर कभी मरते नहीं। वे सदा-सदा के लिए अमर हो जाते हैं। इन महान शहीदों के कारण ही आज हमारा देश आजाद है।
“सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है…!” काकोरी कांड के शहीद और महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल का लिखा यह क्रांति-गीत उन दिनों हजारों कंठों से एक साथ गूँजता था और हवाओं में जोश और उत्साह की लहर सी फैल जाती थी। खासकर देश के लिए जान हथेली पर लेकर लड़ने वाले क्रांतिकारियों का तो यह प्रिय गीत था—
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।
इस राष्ट्रीय गीत में बिस्मिल के महान बलिदान की महक है तो अनगिनत तकलीफें झेलकर चुपचाप क्रांति-अभियान में लगे हर क्रांतिकारी का वह सपना भी, जो लाखों लोगों के दिलों में कुछ कर गुजरने का तूफान पैदा कर देता है—
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आस्माँ,
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है।
बिस्मिल के लिखे इस गीत में भारत के वीरतापूर्ण क्रांतिकारी आंदोलन की पूरी तसवीर है। यही कारण है कि उनका लिखा शहादत का यह गीत इतना अधिक लोकप्रिय हुआ। गीत की आखिरी पंक्तियों में फाँसी के फंदे को चूमने की उनकी बेसब्री का कमाल का चित्र है—
अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़, एक मिट जाने की हसरत अब दिले बिस्मिल में है।
ये कहानी ‘शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Shaurya Aur Balidan Ki Amar Kahaniya(शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ)
