kahani kadubu ki
kahani kadubu ki

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

भीमण्णा आज बहुत खुश था। आज वह अपने ससुराल जा रहा था। उसे विश्वास था कि ससुराल में उसका बड़ा स्वागत होगा, आवभगत होगी और उसे बहुत स्वादिष्ट पकवान खाने को मिलेंगे। वह दामाद जो ठहरा! उसकी पत्नी महिने भर के लिए मायके गयी थी। भीमण्णा को पत्नी से मिलना भी था और अपने ससुराल में मजे भी लेने थे।

“अरे भीमण्णा जा तो रहा है लेकिन वहां संयम रखना! खास कर खाने पीने पर। तुम्हें खाने के मामले में होश नहीं रहता। लेकिन उन बिचारे ससुराल वालों को ज्यादा तकलीफ मत देना। और हां, एक दिन से ज्यादा वहां मत रहना” भीमण्णा की मां गंगव्वा ने चेतावनी दी।

यह बात तो ठीक थी। भीमण्णा खाने के मामले में बिलकुल संयम नहीं रखता था। वह इतना ज्यादा खाना खाता था कि उसके मित्र उसे बकासुर कहते थे! खाने में भी उसको मीठा बहुत ज्यादा पसंद था। अलग-अलग तरह के मीठे पकवान उसे बहुत पसंद आते थे। लेकिन भीमण्णा में एक दोष भी था। उसे कोई चीज याद नहीं रहती थी। वह भुलक्कड था।

भीमण्णा की पत्नी कावेरी का मायका कागिणा नदी के पार था। भीमण्णा आराम से चलते-चलते निकला। गंगव्वा ने बेटे के लिए रास्ते में खाने के लिए सब्जी रोटी बना दी थी। बहत चलकर जब भख लगी तो उसने सारी रोटियाँ खा डाली। पेट तो भर गया लेकिन फिर भी उसके मन में विचार आया, काश कुछ मीठा भी मिल जाता! बीच में नदी आयी तो उसने देखा नदी में पानी बहुत गहरा था और नदी का पाट भी चौडा था। भीमण्ण ॥ को तुलसीदास की कहानी याद आयी। उसकी अवस्था भी तुलसीदास की तरह थी। कब एक बार पत्नी के मायके पहुंचु, ऐसा उसे हो रहा था।

फिर वह नदी के पाट में उतरा और बडी मुश्किल से एवं कष्ट से गिरते-फिसलते उसने नदी को पार किया। फिर वह वहां से चलते-चलते पत्नी के मायके आ गया। उसे देखते ही उसकी पत्नी और ससुराल के सारे लोग खश हो गये। “दामादजी आ गये!” “जीजाजी आ गये।” इस तरह की आवाजें घर मे गूंजने लगी। भीमण्णा को देखकर कावेरी भी खुश हो गयी। उसने अपनी ओर से कुछ प्यार भरे इशारे पति की तरफ किए। पर भीमण्णा का ध्यान उस तरफ कहां? उसे तो बहुत भूख लगी थी। और वह स्वादिष्ट मीठे पदार्थों की प्रतीक्षा कर रहा था।

रात के खाने में देर होने लगी तो भीमण्णा ने कावेरी से पूछा, “खाने को इतनी देर क्यूं हो रही है?”

“आज लाड़ले दामाद जी आये हैं ना तो मां खास मीठा पकवान बना रही है।” कावेरी ने कहा।

“क्या बना रही है तुम्हारी मां?” भीमण्णा ने उत्सुकता से पूछा।

“वो मैं तुम्हें नहीं बताऊंगी। वह हमारा राज है।” कावेरी ने बड़ी अदा से कहा।

यह सुनकर भीमण्णा की उत्सुकता और बढ़ गयी और वह बेसब्री से रात के भोजन की प्रतीक्षा करने लगा। रात में सब लोग खाने के लिए बैठ गये। भीमण्णा, उसके ससुरजी, उसके दो साले और दो छोटे बच्चे इतने लोग खाने में थे। भीमण्णा की पत्नी कावेरी और उसकी सास खाना परोस रहे थे।

खाना बडा ही स्वादिष्ट था और भीमण्णा को भूख भी बहुत लगी थी। वह मजे ले कर भोजन कर रहा था। मगर उसे प्रतीक्षा थी मीठे पकवान की! कुछ देर पश्चात भीमण्णा की सास वह खास मीठा पदार्थ एक बड़े बर्तन मे ले आयी और उसने वह पदार्थ भीमण्णा को परोसा। वह एक गेहूं से बना तला हुआ और अंदर मीठा भरा हुआ अर्धचंद्राकार पदार्थ था। भीमण्णा ने जैसे जी उसका स्वाद चखा, वह पदार्थ उसे बहुत ही पसंद आया। बड़े चाव से उसे चबाते हुए और उसका मजा लेते हुए उसने ससुर जी से पूछा, “ससुरजी, इस पदार्थ को क्या कहते हैं?” “दामाद जी इसे कडुबु कहते हैं।” ससुरजी ने जवाब दिया। पहले सासूजी ने तीन-चार कडुबू भीमण्णा के थाली में डाले थे। भीमण्णा को कडुबू इतने अच्छे लगे की उसे और खाने की इच्छा हुई। लेकिन वह पदार्थ का नाम भूल गया। फिर उसने ससुर जी की थाली में जो कडुबू थे उसे दिखाकर कर कहा, “मुझे वह पदार्थ और चाहिए।” “ओह! कावेरी अपने पति के लिए और कडुबू ले आना।” कावेरी कडुबू लेकर आयी। उसने दो कडुबू भीमण्णा की थाली मे डाले। “और दो-तीन डालो।” भीमण्णा ने पत्नी को आज्ञा दी। “देखिये जी कडुबू संभलकर खाइये। वरना तकलीफ होगी।” कावेरी ने आदर्श पत्नी का कर्तव्य निभाते हुए उसे सावधान किया। लेकिन भीमण्णा को कडुबू इतने पसंद आये कि उसने कावेरी के कडुबू तो खाये ही फिर सासुजी से और दो मांगकर खाये।

दूसरे दिन भीमण्णा वापस निकला। उसने निश्चय किया कि वह घर जाकर यही मीठा पदार्थ बनाने के लिए अपनी मां गंगव्वा को कहेगा। पर समस्या यह थी कि वह भुलक्कड था, उसे उस पदार्थ का नाम याद नहीं रहा। उसने कावेरी को बुलाया और फिर उस मीठे पदार्थ का नाम पूछा। “अजी सुबह से कितनी बार पूछ रहे हो? उसे कडुबू कहते हैं।” कावेरी ने कहा।

भीमण्णा वापस निकला। उस मीठे पदार्थ का नाम कहीं मस्तिष्क से न निकल जाये इसलिए वह उसे रट रहा था। कडुबू! कडुबू!! कडबू!!! रास्ते में जाते लोग उसकी इस हरकत को विचित्र नजर से देख रहे थे, पर भीमण्णा को उसकी चिंता नहीं थी। वह किसी भी हालत में उस पदार्थ का नाम नहीं भूलना चाहता था। थोड़ी देर चलने के बाद अचानक भीमण्णा का पांव एक पत्थर पर फिसल गया और वह धड़ाम से गिर गया। इतना ही नहीं उसके चेहरे में मामूली खराश भी आयी। जैसे-तैसे भीमण्णा उठकर खड़ा हो गया और फिर चलने लगा। मगर इस झटके से उसका ध्यान बट गया और वह कडुबू शब्द भूल गया। कुछ प्रयास के बाद उसे कुछ शब्द याद आये और वह उस पदार्थ को बुडूक कहने लगा। वह अब रास्ते में बड़क! बड़क!! बडबडाने लगा। फिर रास्ते के लोग उसे विचित्र समझने लगे मगर उसने परवाह नहीं की।

अब बीच रास्ते मे नदी आ गयी। भीमण्णा नदी मे उतर गया और बुडूक बुडूक बडबडाते नदी पार करने लगा। अचानक नदी के तेज प्रवाह में उसका संतुलन खो गया और वह फिर नदी में फिसलकर गिर गया। फिर पानी के अंदर के पत्थरों से उसका मुंह टकरा गया और वह डूबने लगा। बड़ी मुश्किल से उसने फिर अपने आप को संभाला और थोडा-सा तैरते, थोडा-सा चलते वह बाहर आ गया। इसी झमेले मे वह फिर बुडूकु शब्द भी भूल गया। उसने अपने दिमाग पर जोर दिया फिर कुछ शब्द उसे याद आये। अब वह कडुबू को डुबूकू कहने लगा। डुबूकू! डुबूकू!! बडबडाते वह फिर चलने लगा और अपने घर पहुंच गया।

अपने घर आते ही उसने अपने मां गंगव्वा को कहा, “मां बहुत थक गया हूं और भूख भी बहुत लगी है। खाना बनाओ और हां मेरे लिए डुबूक जरूर बनाना। ससुराल में बनाये थे और मुझे बहुत पसंद आये थे।”

गंगव्वा की समझ में कुछ नहीं आया।

“भीमा, क्या बनाने को बोल रहे हो?”

“डुबूक! डुबूकू!!”

“भीमा मुझ बुढिया का मजाक मत कर। इस तरह का कोई मीठा पदार्थ नहीं होता”

“नहीं मां! होता है! डुबूकू! मैंने ससुराल मे खाया है!”

“हे भगवान! न जाने क्या खिला दिया मेरे बेटे को ससुराल वालों ने? यह कावेरी तो पति की तरफ ध्यान ही नहीं देती।” गंगव्वा ने लगे हाथों बहू और ससुराल वालों को कोसा।

“नही मां! उन्होंने बहुत अच्छी व्यवस्था की थी। खास मेरे लिए डुबूकू बनाये थे। मां तुम भी बनाओ ना डुबूकू।”

“देख भीमा मजाक मत कर! डुबूकू नाम का कोई पदार्थ नहीं होता।”

“होता है मां! डुबूकू होता है। उसे गेहूं से बनाते हैं, अर्धचंद्राकार होता है और उसमें पूरन भरते हैं।”

“अच्छा! तो उन्होंने होळगी बनायी होगी, या करंजी बनायी होगी या फिर मीठी पूरियां!!” गंगव्वा ने तर्क से कहा।

“नहीं मां उन्होंने डुबूकू ही बनाये थे!

“फिर वही! अरे मुर्ख डुबूकू नाम का कोई पकवान नहीं होता।”

“नहीं मां! डुबूकू! डुबूकू!! डुबूकू!!”

अब गंगव्वा को गुस्सा आ गया! एक तो बेटा भुलक्कड था और अजीब जिद कर रहा था। उसने बाजू का झाडू उठा लिया और एक जोर का वार भीमण्णा के पांव पर मारा। भीमण्णा ओये-ओये चीललाने लगा।

“मुझ बुढिया को जानबूझकर तकलीफ देता है? सताता है?” गंगव्वा ने और दो वार झाडू से किए। भीमण्णा दूर भाग गया। उसे मालूम हो गया कि अब मां गुस्से में है और अब उसको उसके पसंद की चीज नहीं मिलेगी। वह निराश होकर घर के बाहर के पलंग पर लेट गया। अब भी वह डुबूकू-डुबूकू शब्द रट रहा था।

गुस्सा उतरने के बाद गंगव्वा को बेटे के ऊपर फिर प्यार आ गया। वह भीमण्णा के नजदीक आ गयी। चूंकि धूप की वजह से भीमण्णा के चेहरे पर कपडा था इसलिए गंगव्वा को उसका चेहरा ठीक तरह से नहीं दिखा था। अब उसका चेहरा खुला था। भीमण्णा रास्ते में दो बार पत्थर पर गिरा था और चोट लगने से उसके चेहरे पर सूजन थी।

भीमण्णा के चेहरे को देखकर गंगव्वा घबरायी।

“बेटे क्या हुआ? कहीं गिरा था क्या?”

“हां मां! पत्थर पर जोर से गिरा था।”

“अरे रे देख बेटा तेरी हालत क्या हो गयी है। जख्मों के लाल निशान है और तेरा चेहरा कडुबू की तरह सूजा हुआ है।

जैसे ही भीमण्णा ने “कडुबू” शब्द सुना उसे पूरा याद आ गया। वह अचानक उठकर पलंग से नीचे आ गया और नाचने लगा। “मुझे याद आ गया! मुझे याद आ गया!!”

“क्या याद आ गया बेटा?”

“मां वही पदार्थ जो मैंने ससुराल मे खाया था! कडुबू मां कडुबू!! मां कडुबू बनाओ!!”

“अरे फिर ऐसा बोल ना! ले अभी बनाती हूं मेरे प्यारे भीमा के लिए कडुबू!” कहकर गंगव्वा रसोई की तरफ निकली।।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’