भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
मेघालय की राजधानी शिलांग में दो दोस्त आर्यन और आरुष रहते थे। वे वहाँ के नामी विद्यालय में एक ही कक्षा में पढ़ते थे। दोनों ही पढ़ाई में अव्वल और खेल-कूद में भी बहुत रुचि रखते थे। सब-कुछ बहुत अच्छा चल रहा था लेकिन अचानक आरुष को शैतान बच्चों की संगत पसन्द आने लगी। अब वह आर्यन से भी कन्नी काटने लगा।
आर्यन को अपने मित्र की चिन्ता सताने लगी। उसका भी अब पहले जैसा पढ़ाई में मन नहीं लग रहा था। वह जैसे ही आरुष को कुछ समझाने की कोशिश करता। वह आग-बबूला हो उठता और कहता- मैं तुम्हारे रोज-रोज के उपदेशों से तंग आ गया हूँ। सारे दिन पढ़ने के बाद थोड़ी मौज-मस्ती भी जरूरी है। आर्यन को अपने दोस्त की बात का बहुत बुरा लगा लेकिन वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। अब दोनों आपस में कम बात करते थे।
उनकी कक्षा में एक और सहपाठी सुलभ भी था, जिसे आर्यन पसन्द करता था लेकिन आरुष के कारण वह उससे ज्यादा मेल-जोल नही बढ़ा पाता था। आरुष और सुलभ एक ही सोसाइटी में रहते थे फिर भी आरुष उसे पसन्द नहीं करता था। मध्यावकाश के समय एक दिन आर्यन को अकेले उदास बैठे देख सुलभ उसके पास आया और बोला, “क्या बात है? आर्यन, तुम्हारी दोस्ती आरुष से टूट गई है।” “नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है, पर आरुष को आजकल मुझसे ज्यादा कुछ और दोस्त अच्छे लगने लगे हैं,” उदास स्वर में आर्यन ने कहा।
हाँ दोस्त, तुमने अच्छा याद दिलाया। मैंने भी देखा है कि अकसर आजकल शाम को जब उसके मम्मी-पापा बाहर घूमने जाते हैं, तब उसके दोस्त घर पर आकर बहुत हुड़दंग मचाते हैं। उसकी दीदी और दादी तो उसे ज्यादा कुछ कहती नहीं। तुम तो जानते हो कि उसके माँ-बाप ने भी उसे काफी छूट दे रखी है। वह जो भी माँगता है, उसे तुरन्त पूरा कर देते हैं। मेरे साथ ऐसा नहीं होता। मेरे मम्मी-पापा मुझे वही लाकर देते हैं, जिसकी मुझे खास जरूरत होती है। आर्यन की बात सुनकर सुलभ ने कहा- अच्छा आर्यन, जब तक आरुष तुम से फिर से दोस्ती नहीं कर लेता, तुम मुझे ही अपना दोस्त समझो।” “नहीं सुलभ, ऐसी बात नहीं है, तुम तो हमेशा से मेरे दोस्त हो।” आर्यन की बात सुन सुलभ को बहुत खुशी हुई।
एक दिन आर्यन ने देखा कि आरुष स्कूल से अनुपस्थित था। उसे चिन्ता सताने लगी कि कहीं वह बीमार तो नहीं पड़ गया। वह स्कूल खत्म होते ही आरुष के घर गया। वहाँ जाकर उसे पता चला कि वह तो सुबह स्कूल के लिए ही निकला था, पर स्कूल नहीं गया। वह अभी तक घर भी नहीं पहुँचा। आरुष की मम्मी को यह जानकर और हैरानी हुई कि बहुत समय से आरुष और आर्यन के सम्बन्ध ठीक नहीं चल रहे थे। आरुष की माँ ने दो-चार जगह फोन करके उसके बारे पूछा लेकिन जवाब नकारात्मक ही रहा। आरुष की माँ रीना को बहुत चिन्ता हुई।
वह आर्यन से बोली, “आर्यन के पिताजी शहर के बाहर हैं, तब तक चलो बेटा, हम लोग खुद जाकर उसे ढूँढते हैं।” रीना ने अपनी गाड़ी निकाली और आर्यन को बैठने के लिए कहा। सुलभ भी अपने घर के बाहर खड़ा था और वह पास आकर रीना से बोला, “आंटीजी, मैं भी आपके साथ चलता हूँ क्योंकि मुझे भी एक-दो जगहों का पता है, जहाँ आरुष अपने दोस्तों के साथ खेलने जाता है”, यह कहकर वह भी गाड़ी में बैठ गया। तब तक आरुष के पापा भी आ चुके थे। वे लोग दो-तीन जगह गये लेकिन वहाँ भी आरुष का कुछ पता नहीं चला।
इधर-उधर आरुष को खोजते-खोजते अन्धेरा घिर आया था। अब उन्होंने ज्यादा देर न करते हुए पुलिस स्टेशन जाने का विचार किया, तभी आर्यन की नजर सड़क के किनारे नाले पर पड़ी। नाले के पास कोई गिरा हुआ था। जब वे लोग पास पहुँचे तो देखा कि वह और कोई नहीं, आरुष ही था। वह बेहोशी की हालत में था। पानी के छींटे डालने पर उसे होश आया और अपने सामने माँ-पिताजी, आर्यन और सुलभ को देख उसकी जोर-जोर से रुलाई फूट पड़ी। “चुप हो जा दोस्त, देखो अब हम सब तुम्हारे साथ हैं,” आर्यन ने उसे चुप करते हुए कहा।
आरुष रो-रो कर कहता जा रहा था- आर्यन मेरे दोस्त, मुझे माफ कर दे। मैंने बुरी संगत में पड़कर आप सब को बहुत तकलीफ पहुँचाई। माँ-पिताजी, आज मैं अपनी गलतियों के कारण बहुत शर्मिंदा हूँ। मैंने कई बार माँ के पैसे चुराये, पापा की एक घड़ी भी में शर्त मे हार गया। मैंने आज उन लड़कों के कहने पर दादी का सोने का हार चुराया। जब उसे बेचने लगा तब मुझे मेरी गलती का एहसास हुआ और मैं उसे घर पर वापस रखने जा रहा था तो मेरे उन दोस्तों ने मुझसे हार छीन लिया। इसी छीना-झपटी में उन्होंने मेरी खूब पिटाई की और मुझे यहाँ गिराकर चले गये। पिताजी, मुझे माफ कर दो। अब मैं ऐसा कोई गलत काम नहीं करूँगा। अब मैं आर्यन और सुलभ का दोस्त बन कर रहूँगा।
“बेटा कुछ गलतियाँ हमारी भी थीं, हमने तुम पर ध्यान देना ही छोड़ दिया था। हम अपने काम में इतने व्यस्त हो गए थे कि तुम्हारे और तुम्हारी दीदी के लिए समय नहीं निकाल पाए। अब से ऐसा नहीं होगा”, पापा उसे गले लगाते हुए बोले।
अब पहले के दिन फिर लौट आए थे। अब आर्यन और आरुष और भी गहरे दोस्त बन गए थे और उन्हें एक और प्यारा दोस्त सुलभ भी मिल गया था।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
