बस जिस्म नहीं हूं मैं—गृहलक्ष्मी की कविता
Bas Jism Nahi Hoon Mein

Hindi Poem: बस जिस्म नहीं मैं एक कली हूं कब तक मुझको तोड़ोगे
क्या दिल बहलाने का सामान बना कर मुझको छोड़ोगे

रूहानी मोहब्बत होती है तुम जिस्मानी करते हो
हैवानो से बनकर के तुम वहशीपन मुझ पर करते हो
बेइज्जत और बदनाम कर बाजारू का इल्जाम दिया
अस्मत लेकर रोटी देते पर कहते हो अहसान किया
खुद की आंखे तो नंगी है मुझ को कब तक तुम ढांकोगे
पट जाऊं तो अच्छा है अगर ना मानूं ऐसिड फेंकोगे

इन हवस भरी आंखों से तुम अब कब तक मुझको तोड़ोगे
क्या दिल बहलाने का सामान बना कर मुझको छोड़ोगे

इंसानियत को छोड़ के तुम मज़हब को आगे रखते हो
तेरी बेटी मेरी बेटी कह मुझको नंगा करते हो
दो दिन का धरना देकर के इंसाफ कि बातें करते हो
तारीखों पर तारीख चढ़ा सूली पर मुझको धरते हो
आसिफा के अंदर खून वही जो निर्भया में बहता है
मज़हब इंसानों से बनता क्यूं इंसा मरता रहता है

अपनी बेटी को घर में रख दूजे की बेटी छेडोगे
क्या दिल बहलाने का सामान बना कर मुझको छोड़ोगे

मांग सिंदूर सजा के तुम हकदार मेरे बन जाते हो
जब चाहा दिल बहला लेते जब चाहा आंख दिखाते हो
लाखों सेहरे तुमने पहने सफेद मुझे पहनाते हो
इक मोम की गुड़िया समझ मुझे फरमानों पे नचाते हो
इतिहास गवाही देता है बस ऐश मर्द ही करता है
औरत के हिस्से गुरबत है सहना बस सहना पड़ता है

जिस कोख में कोपल बनते हो उसको भी तुम ना छोड़ोगे
क्या दिल बहलाने का सामान बना कर मुझको छोड़ोगे

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