poojy ram
अयोध्या में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा उत्खनन में प्राप्त प्राचीन अवशेष

राम की पूजा भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में होती है। हमारे देश में वैष्णव अर्थात भगवान विष्णु और शैव अर्थात भगवान शिव संप्रदाय के पश्चात देवताओं में राम एवं कृष्ण सर्वाधिक पूज्य हैं। भगवान शिव भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में आराध्य देव माने जाते हैं। भगवान विष्णु दक्षिण भारत में सर्वाधिक पूज्य हैं। भगवान कृष्ण सर्वत्र पूज्यनीय हैं और भगवान राम उत्तर भारत में सर्वाधिक पूज्य हैं। आज आधुनिक काल के यांत्रिक युग में सभी देवी-देवता सर्वत्र पूजित हैं।

राम को सनातन धर्म में भगवान विष्णु का 7वां अवतार माना गया है। वहीं जहां एक ओर भगवान शंकर भी राम का ध्यान करते हैं, तो वहीं भगवान शंकर के ही अंश से बने हनुमान राम के सबसे बड़े भक्त हैं। वह सदैव अपने श्रीराम का ध्यान करते रहते हैं। मान्यता यह है कि राम के बगैर भवसागर पार होना असंभव है।

राम शब्द की व्युत्पत्ति

राम शब्द संस्कृत के दो धातुओं, रम् और घम से बना है। रम् का अर्थ है रमना या निहित होना और घम का अर्थ है ब्रह्मांड का खाली स्थान। इस प्रकार राम का अर्थ सकल ब्रह्मांड में निहित या रमा हुआ तत्व यानी चराचर में विराजमान स्वयं ब्रह्म। शास्त्रों में लिखा है, “रमन्ते योगिनः अस्मिन सा रामं उच्यते” अर्थात, योगी ध्यान में जिस शून्य में रमते हैं उसे राम कहते हैं।

‘रम्’ धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय के योग से ‘राम’ शब्द निष्पन्न होता है। ‘रम्’ धातु का अर्थ है – रमण, अर्थात निवास या विहार। इसका अभिप्राय निवास करने के संबंध में है। वे प्राणीमात्र के हृदय में ‘रमण’ यानि निवास करते हैं इसलिए ‘राम’ हैं। भक्तजन उनमें ‘रमण’ करते हुए ध्याननिष्ठ होते हैं। अतः वे ‘राम’ हैं – “रमते कणे कणे इति रामः।” एक अन्य व्याख्याकार के अनुसार राम शब्द का अर्थ है रमना या निहित होना और घम का अर्थ है ब्रह्मांड का खाली स्थान। इस प्रकार राम का अर्थ सकल ब्रह्मांड में निहित या रमा हुआ तत्व यानी चराचर में विराजमान स्वयं ब्रह्म।

व्याख्याकारों के अनुसार राम कण-कण में बसे हुए हैं। यहीं से एक लोक प्रचलित वाक्य बने कि भगवान हर जगह हैं। कण-कण में हैं। चारों दिशाओं में हैं। सर्वत्र हैं। विगत कुछ वर्ष पहले पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भारत की इसी लोक प्रचलित मान्यता को वैज्ञानिक पुष्टि देने के उद्देश्य से एक विशाल प्रयोग किया कि पृथ्वी के सबसे सूक्ष्म तत्व में भी जीवन है या नहीं। दुर्भाग्यवश वह अनुसंधान अभी तक अपूर्ण है। कारण? प्राचीन भारतीय विज्ञान को चुनौती देना इतना आसान नहीं है। दूसरे भारत में प्रचलित मान्यताओं का जो वैज्ञानिक आधार है उसकी पुष्टि करना वर्तमान पाश्चात्य वैज्ञानिकों की पहुंच से बाहर है। इसका कारण है कि हमारे पूर्वजों ने पृथ्वी को बिना हानि पहुंचाए शोध एवं अनुसंधान बिना मशीनों के, उस विधा और विधान तक दुनिया के वैज्ञानिक अभी नहीं पहुंचे हैं। प्राचीन भारतीय विज्ञान और वैज्ञानिकों ने पाया था कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति के सभी रहस्य धरती पर उपलब्ध हैं। शायद यही कारण है कि उन्होंने काल गणना करके पृथ्वी के अस्तित्व में आने की गणना तक बता दी थी। जिस पर पाश्चात्य वैज्ञानिक विश्वास नहीं करते हैं। यह विषय बहुत विस्तृत है। अतः इसे यहीं विराम देकर अपने मूल विषय पर आते हैं।

‘विष्णुसहस्रनाम’ पर लिखित अपने भाष्य में आद्य शंकराचार्य ने पद्मपुराण का उदाहरण देते हुए कहा है कि नित्यानन्दस्वरूप भगवान् में योगिजन रमण करते हैं, इसलिए वे ‘राम’ हैं। प्राचीन काल से हमारी संस्कृति में दो व्यक्तियों के मिलने पर अभिवादन स्वरूप नमस्कार, नमस्ते, प्रणाम सुप्रभात या राम-राम कहने की परंपरा रही हैं। विश्व में किसी को भी अभिवादन करने की परंपरा हमारी संस्कृति की देन है। कहने का मतलब है कि संपूर्ण विश्व मानव समाज ने हमसे ही सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं अन्य महत्वपूर्ण मान्यताओं को हमसे ही अधिग्रहित किया है। यह परम्पराएं किस कारण से बनी? प्राचीन काल से ही भारत गांव का देश रहा है। अतः यह हमारी ग्रामीण परिवेश की एक स्वस्थ परंपरा है कि अभिवादन हेतु भगवान का नाम लिया जाता था। विशेष रूप से प्रातः काल में। प्रातः काल में भी ब्रह्म मुहूर्त में पहले भी और आज भी हमारे कृषक अपने-अपने खेतों में कृषि कर्म हेतु पहुंच जाते हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि ब्रह्म मुहूर्त में भगवान सर्वत्र विचरण करते हैं। अतः यह काल भगवान को स्मरण करने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

राम-राम का गणित

किसी को अभिवादन करते समय राम के नाम का उपयोग दो बार किया जाता है। यथा- ‘राम-राम’ शब्द हमेशा 2 बार बोला जाता है। विद्वानों के मतानुसार वैदिक गणना के अनुसार पूर्ण ब्रह्म का मात्रिक गुणांक 108 है। वह राम-राम शब्द दो बार कहने से पूरा हो जाता है। विद्वान इसके पीछे यह तर्क देते हैं कि – “हिंदी वर्णमाला में ’र’ 27वां अक्षर है। ‘आ’ की मात्रा दूसरा अक्षर और ‘म’ 25वां अक्षर। सब मिलाकर जो योग बनता है वो है 27 + 2 + 25 = 54, अर्थात एक “राम” का योग 54 हुआ और दो बार राम राम कहने से 108 हो जाता है जो पूर्ण ब्रह्म का द्योतक है।” जाप 108 बार किया जाता है। “राम-राम” कह देने से ही पूरी माला का जाप हो जाता है।

धार्मिक स्वरूप जो भी हो और गणित का मूलांक भले 108 बनता है किंतु महत्वपूर्ण यह है कि हिंदी वर्णमाला द्वापर युग की नहीं है। यह वर्णमाला आधुनिक काल या कलियुग की देन है। इसके अनुसार यह तर्क स्वीकार करने में शायद ही किसी को आपत्ति हो। शेष पाठकों के विवेक पर निर्भर करता है कि वह इसे किस तरह से स्वीकार करते हैं।

108 का महत्व

प्राचीन शास्त्रों के अनुसार माला के 108 मनको का संबंध व्यक्ति की सांसो से माना गया है। एक स्वस्थ व्यक्ति दिन और रात के 24 घंटो में लगभग 21600 बार श्वास लेता है। माना जाता है कि 24 घंटों में से 12 घंटे मनुष्य अपने दैनिक कार्यों में व्यतीत कर देता है और शेष 12 घंटों में व्यक्ति लगभग 10800 बार सांस लेता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार एक मनुष्य को दिन में 10800 ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। एक सामान्य मनुष्य के लिए यह संभव नहीं हो पाता है। अतः धर्मशास्त्रकारों ने दो शून्य हटाकर जप के लिए 108 की संख्या शुभता का प्रतीक घोषित कर दी गई।

108 का वैज्ञानिक महत्व

वैज्ञानिक तथ्य है कि 108 मनके की माला और सूर्य की कलाओं का एक दूसरे से संबंध है। विज्ञान के अनुसार एक वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता हैं। इसमें वह छह माह उत्तरायण रहता है और छह माह दक्षिणायन रहता है। इस तरह से छः माह में सूर्य की कलाएं 108000 बार बदलती हैं। इसी तरह से अंत के तीन शून्य को अगर हटा दिया जाए तो 108 की संख्या बचती है। 108 मनको को सूर्य की कलाओं का प्रतीक माना जाता है। यह कितना सत्य है यह कहना मुश्किल है।

तुलसी के राम

‘राम’ शब्द के संदर्भ में स्वयं गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा –

करऊँ कहा लगि नाम बड़ाई। राम न सकहि नाम गुण गाई।।

स्वयं राम भी ‘राम’ शब्द की व्याख्या नहीं कर सकते। ऐसा राम नाम है। ‘राम’ विश्व संस्कृति के अप्रतिम नायक है। वह सभी सद्गुणों से युक्त है। वह मानवीय मर्यादाओं के पालक और संवाहक है। अगर सामाजिक जीवन में देखें तो राम आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श मित्र, आदर्श पति, आदर्श शिष्य के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। अर्थात् समस्त आदर्शों के एक मात्र न्यायादर्श ‘राम’ है। वस्तुत: राम शब्द की व्याख्या हर युग में होती रही है और भविष्य में भी होती रहेगी।

विद्वानों ने शास्त्रों के आधार पर राम के तीन अर्थ निकाले हैं। राम नाम का पहला अर्थ है – ‘रमन्ते योगिन: यस्मिन् राम:’ यानि ‘राम’ ही मात्र हैं, जो योगियों की आध्यात्मिक-मानसिक भूख हैं, भोजन हैं, आनन्द और प्रसन्नता के स्त्रोत हैं। राम का दूसरा अर्थ है – ‘रति महीधर: राम:’, ‘रति’ का प्रथम अक्षर ‘र’ है और ‘महीधर’ का प्रथम अक्षर है ‘म’, यानि राम। ‘रति महीधर:’ सम्पूर्ण विश्व की सर्वश्रेष्ठ ज्योतित सत्ता है, जिनसे सभी ज्योतित सत्ताएं ज्योति प्राप्त करती हैं। ‘राम’ नाम का का तीसरा अर्थ है, ‘रावणस्य मरणं राम:।’ ‘रावण’ शब्द का प्रथम अक्षर है ‘रा’ और ‘मरणं’ का प्रथम अक्षर है ‘म’। रा+म = राम यानि वह सत्ता जिसकी शक्ति से रावण मर जाता है।

रामनाम

रामनाम का शाब्दिक अर्थ है – ‘राम का नाम।’ ‘रामनाम’ से आशय विष्णु के अवतार राम की भक्ति से है या फिर निर्गुण निरंकार परम ब्रह्म से। सनातन धर्म के विभिन्न संप्रदायों में राम के नाम का कीर्तन या जप किया जाता है। ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ एक प्रसिद्ध मंत्र है। जिसे पश्चिमी भारत में समर्थ रामदास ने लोकप्रिय बनाया। सनातन धर्म के विभिन्न संप्रदायों में राम के नाम का कीर्तन या जप किया जाता रहा है, आज भी होता है और भविष्य में भी होता रहेगा। इसका प्रमुख कारण यह है कि राम करुणा में हैं। शान्ति में हैं। एकता में हैं। प्रगति में हैं। राम शत्रु के चिंतन में हैं। राम तेरे-मेरे मन में हैं। राम सर्वत्र हैं। राम घर घर में हैं। राम हर आंगन में हैं। धर्मशास्त्रकारों ने श्रीराम को साक्षात् भगवान नारायण के मानव अवतार के रूप में स्वीकार किया है। राम का एक अर्थ है ‘प्रकाश।’ किरण एवं आभा या कांति जैसे शब्दों के मूल में राम है। ‘रा’ का अर्थ है – आभा और ‘म’ का अर्थ है मैं; मेरा और मैं स्वयं। इस प्रकार राम का अर्थ हुआ – मेरे भीतर का प्रकाश, मेरे ह्रदय में प्रकाश।

विभिन्न भूखंड में राम

राम का सम्बन्ध सभी एशियाई महाद्वीपों से है। इंडोनेशिया, मलेशिया और कम्बोडिया आदि सभी राममय हैं। वाल्मीकि कृत रामायण महाकाव्य अति प्राचीन ग्रन्थ है। इसका प्रभाव संपूर्ण विश्व में दिखाई देता है। हजारों वर्षों बाद आज भी राम सभी के हृदय में वास करते हैं। उन्हें पुरुषोत्तम भी कहा जाता है। वह एक आदर्श सम्राट। एक बार महात्मा गांधी ने कहा था- “आप मेरा सब कुछ ले लीजिये। मैं तब भी जीवित रह सकता हूं। परन्तु यदि आपने मुझसे राम को दूर कर दिया तो मैं नहीं रह सकता।” ऐसा माना जाता है कि महात्मा गांधी ने मृत्यु से पूर्व जो अंतिम शब्द कहे थे, वह थे ‘हे राम!’ भारत के लगभग हर क्षेत्र में राम को पाया जा सकता है। हर राज्य में हमें एक ‘रामपुर’ या एक ‘रामनगर’ मिल ही जायेगा। भारत में हजारों ‘रामनगर’ हैं। एक अध्ययन से पता चला है कि ‘यूरोप’ में भी राम से सम्बंधित हजारों नाम हैं। विद्वानों के एक वर्ग के अनुसार आस्ट्रेलिया को संस्कृत में अस्त्रालय कहा जाता है। अस्त्र आदत का अर्थ है – ‘अस्त्र रखने का भण्डारगृह। अस्त्र का अर्थ होता है ‘हथियार।’ रामायण काल के दौरान उन लोगों ने वहां अनेक प्रकार के अस्त्र रखे थे। वहां अस्त्र बनाए भी जाते थे। उन अस्त्रों के कारण वहां केंद्र में रेगिस्तान भी था, जिसके कारण वह स्थान निर्जन था।

राम शब्द का संधि विच्छेद

राम शब्द का संधि विच्छेद थोड़ा विवादास्पद है। बहुत से व्याकरण विधाओं का मानना है कि राम एक पद है एवं इसका संधि विच्छेद नहीं किया जा सकता क्योंकि संधि विच्छेद के नियम के अनुसार संधि दो या दो से अधिक पदों के मेल को कहा जाता है। अनेक भाषाविद यह भी कहते हैं कि राम शब्द का संधि विच्छेद र्+आम, र+आम इत्यादि में से कोई एक हो सकता है। अतः राम शब्द का वास्तव में कोई संधि विच्छेद नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह एक पद है।

राम शब्द का रहस्य

राम अत्यन्त विलक्षण शब्द है। साधकों के द्वारा “बीज मन्त्र” के रूप में राम का प्रयोग अनादि काल से हो रहा है और न जाने कितने साधक इस मन्त्र के सहारे परमपद प्राप्त कर चुके हैं। आज राम कहते ही दशरथ पुत्र धनुर्धारी राम का चित्र उभरता है परन्तु राम शब्द तो पहले से ही था। तभी तो गुरु वशिष्ठ ने दशरथ के प्रथम पुत्र को यह सर्वश्रेष्ठ नाम प्रदान किया। धार्मिक परम्परा में राम और “ओऽम्” प्रतीकात्मक है और “राम” सार्थक है। सब “राम” शब्द में अन्तर्निहित है। योगियों और सिद्ध गुरुजनों ने संकेत दिया है कि “ज्ञान” बाहर से नहीं लिया या दिया जा सकता। यह तो अन्दर से प्रस्फुटित होता है। आत्मा “सर्वज्ञ” है साधना के प्रभाव से किसी भी शब्द में निहित सारे अर्थ स्वयं प्रकट हो जाते हैं।

राम शब्द के विभिन्न अर्थ

संज्ञा के रूप में राम का अर्थ है – वयस्क नर भेड़। मशीन का वह भाग जिसका उपयोग किसी चीज़ पर बहुत ज़ोर से प्रहार करने या किसी चीज़ को उठाने या हिलाने के लिए किया जाता है, उसे आंग्ल भाषा ‘रैम’ भी कहा जाता है। राम को पीटने वाले राम के रूप में भी परिभाषित किया गया है। जो लकड़ी या अन्य सामग्री का एक बड़ा और भारी टुकड़ा है जिसका उपयोग दीवारों और दरवाजों को मारने और तोड़ने के लिए किया जाता है। हाइड्रोलिक प्रेस की तरह पिस्टन को ‘रैम’ कहा जाता है।

ज्योतिष में राम

आकाश में मेष राशि के नक्षत्र या चिह्न को राम भी कहा जाता है। राम, लैटिन में मेष, उस व्यक्ति को कहा जाता है जिसका जन्म तब होता है जब सूर्य मेष राशि में होता है, यानि 21 मार्च से 20 अप्रैल के बीच। ऑस्ट्रेलिया में, राम का अर्थ एक आत्मविश्वासी व्यक्ति का सहयोगी है जो एक प्रलोभन के रूप में कार्य करता है, संघ बनाना, शील आदि। dictionary.com के अनुसार कंप्यूटर में ‘रैम’ (RAM) कंप्यूटर मेमोरी है। जिसका पूरा नाम रैंडम-एक्सेस मेमोरी है। www.cga.ct.gov के अनुसार, RAM उन वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक ऋण है, जिन्होंने अपने घरों का भुगतान कर दिया है। वहां रहने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं या घर की मरम्मत, दीर्घकालिक देखभाल, चिकित्सा उपचार या अन्य उद्देश्यों के लिए अतिरिक्त धन की आवश्यकता है। पौराणिक कथाओं में राम भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं।

राम नाम का महत्व

राम चेतना और सजीवता का प्रमाण है। अगर राम नहीं तो जीवन मरा है। इस नाम में वो ताकत है कि मरा-मरा करने वाला राम-राम करने लगता है। इस नाम में वो शक्ति है जो हजारों-लाखों मंत्रों के जाप में भी नहीं है। ‘राम‘ सिर्फ एक नाम नहीं। राम मात्र दो अक्षर नहीं। राम हमारी सांस्कृतिक विरासत है। राम हमारी की एकता और अखंडता हैं। राम हमारी आस्था और अस्मिता के सर्वोत्तम प्रतीक हैं। राम सनातन धर्म की पहचान है। राम प्रत्येक प्राणी में रमा हुआ है।

आत्मा और राम एक

अनेकानेक संतों ने निर्गुण राम को अपने आराध्य रूप में प्रतिष्ठित किया है। कबीरदास के अनुसार – “आत्मा और राम एक है- आतम राम अवर नहिं दूजा। राम नाम कबीर का बीज मंत्र है। रामनाम को उन्होंने “अजपा जप” कहा है। रमते योगितो यास्मिन स रामः अर्थात् – योगीजन जिसमें रमण करते हैं वही राम हैं। इसी तरह ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है – राम शब्दो विश्ववचनों, मश्वापीश्वर वाचकः अर्थात् ‘रा’ शब्द परिपूर्णता का बोधक है और ‘म’ परमेश्वर वाचक है।

राम समूचा ब्रह्मांड

माना जाता है कि महादेव काशी में मृत्यु शय्या पर पड़े व्यक्ति को राम नाम सुनाकर भवसागर से तार देते हैं। भगवान शिव के हृदय में सदा विराजित राम हमारे जीवन के कण-कण में रमे हैं। राम ‘महामंत्र’ हैं, राम नाम ही परमब्रह्म हैं। “रमंति इति रामः”, जो रोम-रोम में रहता है, जो समूचे ब्रह्मांड में रमण करता है। वही राम है। राम जीवन का मूल मंत्र है। राम मृत्यु का मंत्र नहीं, राम गति का नाम है। राम थमने-ठहरने का नाम नहीं, राम सृष्टि की निरंतरता का नाम है। राम महादेव के आराध्य हैं।

राम शब्द एक महामंत्र

खाते-पीते, सोते, चलते और बैठते समय, सुख में या दुख में राम मंत्र का जाप करते हैं, उन्हें दुख, दुर्भाग्य व व्याधि का भी भय नहीं रहता। प्रभु श्रीराम सभी प्रकार के सुखों देने वाले स्वामी हैं। दीन-दुखी पर दया करने वाले कृपालु हैं। चाहे निर्गुण ब्रह्म हो या दाशरथि राम हो, विशिष्ट तथ्य यह है कि राम शब्द एक महामंत्र है। राम नाम का ‘महामंत्र’ आपको जीवन की सभी परेशानियों से बचता है। विद्वानों का मानना है कि “श्री राम जय राम जय जय राम” मंत्र का जाप बड़ी-से-बड़ी दुविधा से निकाल सकता है। इसके उच्चारण या जाप करने के लिए किसी नियम का पालन करने की आवश्यकता नहीं है। इस मंत्र को आप कभी ओर कहीं भी हों, जाप कर सकते हैं।

राम से बड़ा राम का नाम

राम और रामायण के व्याख्याकारों का मत है कि राम के अयोध्या में साकार अवतरण के पूर्व राम नाम का उपयोग निराकार ब्रह्म, परमेश्वर, के लिए सदा से उपयोग होता आया है। राम से बढ़कर राम का नाम। राम शब्द की ध्वनि हमारे जीवन के सभी दुखों को समाप्त करने की शक्ति रखती है। ध्वनि विज्ञान वैज्ञानिकों का मत हैं कि राम नाम के उच्चारण से मन शांत हो जाता। राम या मार : राम का उल्टा होता है। ‘म’, ‘अ’, ‘र’ अर्थात मार। कोई भी इस राम नाम मंत्र का नियमित रूप से जाप करता है वह जहां अचानक आने वाली परेशानियों से बचा रहता है, जीवन की कोई भी मुश्किल उसकी उन्नति में बाधा नहीं बनती। राम नाम निर्विवाद रूप से सत्य है।

राम एवं रामायण

विद्वानों का एक वर्ग मानता है कि भगवान के चरित्र अनंत हैं। चरित्र को लेकर नाम जप भी अनंत ही होगा। महर्षि वाल्मीकि ने जितने श्लोकों की रामायण बनाई, उन श्लोकों की रामायण को भगवान शंकर के आगे रख दिया जो सदैव राम नाम जपते रहते हैं। कहते हैं कि भगवान शंकर ने रामायण के तीन विभाग कर त्रिलोक में बाँट दिया। तीन लोकों को तैंतीस-तैंतीस करोड़ दिए तो एक करोड़ बच गया। उसके भी तीन टुकड़े किए तो एक लाख बच गया उसके भी तीन टुकड़े किये तो एक हजार बच और उस एक हजार के भी तीन भाग किये तो सौ बच गया। उसके भी तीन भाग किए एक श्लोक बच गया। इस प्रकार एक करोड़ श्लोकों वाली रामायण के तीन भाग करते करते एक अनुष्टुप श्लोक बचा रह गया। एक अनुष्टुप छंद के श्लोक में बत्तीस अक्षर होते हैं उसमें दस-दस करके तीनों को दे दिए तो अंत में दो ही अक्षर बचे। यही दो अक्षर राम नाम के हैं। इसमें कितनी वास्तविकता है यह कहना कठिन है। एक करोड़ श्लोकों का विभक्तिकरण करने के उपरांत केवल यदि दो अक्षर बचते हैं और वह हैं र एवं म, तो यह दो शेष बचे अक्षर राम शब्द की ध्वनि कैसे दे सकते हैं। यह दोनों अक्षर तो रम शब्द की ध्वनि है। रम अर्थात किसी में रम जाना। जैसे काम में रम जाना, अध्ययन में रम जाना, प्रेम, भक्ति, शक्ति, रति इत्यादि में रम जाना।

गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं- “महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥” यह ‘राम’ नाम महामंत्र है जिसे महेश्वर, भगवान शंकर जपते हैं और उनके द्वारा यह राम नाम उपदेश का काशी में मुक्ति का कारण है। ‘र’, ‘अ’ और ‘म’ इन तीन अक्षरों के मिलने से यह राम नाम तो हुआ ‘महामंत्र’ और बाकी दूसरे सभी नाम हुए साधारण मंत्र। “सप्तकोट्य महामंत्राश्चित्तविभ्रमकारका:। एक एव परो मन्त्रो ‘राम’ इत्यक्षरद्वयम्॥” सात करोड़ मंत्र हैं। वह चित्त को भ्रमित करने वाले हैं। राम नाम परम मंत्र है। यह सब मंत्रों में श्रेष्ठ मंत्र है। सब मंत्र इसके अंतर्गत आ जाते हैं। कोई भी मंत्र बाहर नहीं रहता। सब शक्तियां इसके अंतर्गत हैं। ‘राम’ नाम काशी में मरने वालों की मुक्ति का हेतु है।

राम नाम वेदों का प्राण

भगवान् शंकर ने यह दो अक्षर रा और म आपने पास रख लिए। राम अक्षर में ही पूरी रामायण है। पूरा शास्त्र है। राम नाम वेदों के प्राण के सामान है। शास्त्रों का और वर्णमाल का भी प्राण है, प्रणव को वेदों का प्राण माना जाता है। प्रणव तीन मात्र वाल ॐ कार पहले ही प्रगट हुआ, उससे त्रिपदा गायत्री बनी और उससे वेदत्रय, ऋक, साम और यजुः, ये तीन प्रमुख वेद बने। इस प्रकार ॐ कार वेदों का प्राण है। राम नाम को वेदों का प्राण माना जाता है, क्योंकि राम नाम से प्रणव होता है। जैसे प्रणव से र निकाल दो तो केवल पणव हो जाएगा अर्थात ढोल हो जायेगा। ऐसे ही ॐ में से म निकाल दिया जाए तो वह शोक का वाचक हो जाएगा। प्रणव में ‘र’ और ‘ॐ’ में ‘म’ कहना आवश्यक है इसलिए राम नाम वेदों का प्राण भी है।

राम नाम का वैज्ञानिक महत्व

वर्तमान आधुनिक चिकित्सा विज्ञान आधारित सत्य यह भी है कि हम 24 घंटों में लगभग 21,600 श्वास भीतर लेते हैं और 21,600 उच्छावास बाहर फेंकते हैं। इस का संकेत कबीर जी ने इस उक्ति में किया है –

सहस्र इक्कीस छह सै धागा, निहचल नाकै पोवै।

अर्थात- मनुष्य 21,600 धागे नाक के सूक्ष्म द्वार में पिरोता रहता है। अर्थात प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में वह राम का स्मरण करता रहता है। स्कंद पुराण में वेद व्यास महाराज जी कहते हैं कि जो लोग राम-राम मंत्र का उच्चारण करते हैं।

राम नाम के फायदे

राम सिर्फ एक नाम नहीं अपितु एक मंत्र है, जिसका नित्य स्मरण करने से सभी दु:खों से मुक्ति मिल जाती है। राम शब्द का अर्थ है- मनोहर, विलक्षण, चमत्कारी, पापियों का नाश करने वाला व भवसागर से मुक्त करने वाला। ‘रामनाम’ से आशय विष्णु के अवतार राम की भक्ति से है या फिर निर्गुण निरंकार परम ब्रह्म से। विद्वानों ने शास्त्रों के आधार पर राम के तीन अर्थ निकाले हैं। राम नाम का पहला अर्थ है ‘रमन्ते योगिन: यस्मिन् राम:।’ यानी ‘राम’ ही मात्र एक ऐसे हैं,जो योगियों कीआध्यात्मिक-मानसिक भूख हैं। भोजन हैं, आनन्द और प्रसन्नता के स्त्रोत हैं। राम का दूसरा अर्थ है, ‘रति महीधर: राम:।’, ‘रति’ का प्रथम अक्षर ‘र’ है और ‘महीधर’ का प्रथम अथर ‘म’, राम। ‘रति महीधर:’ सम्पूर्ण विश्व की सर्वश्रेष्ठ ज्योतित सत्ता है, जिनसे सभी ज्योतित सत्ताएं ज्योति प्राप्त करती हैं। ‘राम’ नाम का का तीसरा अर्थ है, ‘रावणस्य मरणं राम:’। ‘रावण’ शब्द का प्रथम अक्षर है ‘रा’ और ‘मरणं’ का प्रथम अक्षर है म, राम यानी वह सत्ता, जिसकी शक्ति से रावण मर जाता है।’राम’ यह शब्द दिखने में जितना सुंदर है उससे कहीं महत्वपूर्ण है इसका उच्चारण।

‘राम’ कहने मात्र से शरीर और मन में अलग ही तरह की प्रतिक्रिया होती है, जो हमें आत्मिक शांति देती है। इस शब्द की ध्वनि पर कई शोध हो चुके हैं और इसका चमत्कारिक असर सिद्ध किया जा चुका है इसीलिए कहते भी हैं कि ‘राम से भी बढ़कर रामका नाम। हमारे दु:ख कायिक, वाचिक और मानसिक तीन प्रकार के होते हैं। निरन्तर राम-नाम का जप करते रहने से मनुष्य के शरीर व प्राणों का व्यायाम हो जाता है जिससे शरीर स्वस्थ रहता है। नाम का जप करते रहने से मनुष्य अन्य अपशब्दों का उच्चारण नहीं करता है जिससे वाणी शुद्ध हो जाती है। पवित्र राम-नाम लेते रहने से आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है, मनुष्य के बुरे विचार और आदतें दूर हो जाती हैं और वह पवित्रता, महानता और उच्च आदर्शों के मार्ग पर चलने लगता है।

यही आध्यात्मिक उन्नति धीरे-धीरे हमें स्वास्थ्य, सुख, शान्ति और संतुलन की ओर ले जाती है। राम नाम के उच्चारण से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जो लोग ध्वनि विज्ञान से परिचित हैं वे जानते हैं कि ‘राम’ शब्द की महिमा अपरंपार है। जब हम ‘राम’ कहते हैं तो हवा या रेत पर एक विशेष आकृति का निर्माण होता है। उसी तरह चित्त में भी विशेष लय आने लगती है। जब व्यक्ति लगातार ‘राम’ नाम जप करता रहता है तो रोम-रोम में राम बस जाते हैं। उसके आसपास सुरक्षा का एक मंडल बनना तय समझो। राम के नाम का असर जबरदस्त होता है। आपके सारे दुःख हरने वाला सिर्फ एकमात्र नाम है – राम।

राम का नाम मंत्र

‘र, ‘अ’ और ‘म’, इन तीनों अक्षरों के योग से ‘राम’ मंत्र बनता है। यही राम रसायन है। ‘र’ अग्निवाचक है। ‘अ’ बीज मंत्र है। ‘म’ का अर्थ है ज्ञान। यह मंत्र पापों को जलाता है, किंतु पुण्य को सुरक्षित रखता है और ज्ञान प्रदान करता है। हम चाहते हैं कि पुण्य सुरक्षित रहें, सिर्फ पापों का नाश हो। ‘अ’ मंत्र जोड़ देने से अग्नि केवल पाप कर्मो का दहन कर पाती है और हमारे शुभ और सात्विक कर्मो को सुरक्षित करती है। ‘म’ का उच्चारण करने से ज्ञान की उत्पत्ति होती है। हमें अपने स्वरूप का भान हो जाता है। इसलिए र, अ और म का जोड़ एक मंत्र बन जाता हैं, राम। ‘म’ अभीष्ट होने पर यदि हम ‘र’ और ‘अ’ का उच्चारण नहीं करेंगे तो अभीष्ट की प्राप्ति नहीं होगी। ‘रा’ अक्षर के कहते ही निकसत पाप पहार। पुनि भीतर आवत नहिं देत ‘म’ कार किंवार।। अर्थात् ‘रा’ अक्षर के कहते ही सारे पाप शरीर से बाहर निकल जाते हैं और वे दुबारा शरीर में प्रविष्ट नहीं हो पाते क्योंकि ‘म’ अक्षर तुरन्त शरीर के सारे दरवाजे बन्द कर देता है।

राम नाम की विशेषता

राम नाम की विशेषता यह भी है कि वह परमात्मा के निर्गुण स्वरुप की तरह अविनाशी होते हुए उसके सगुण रूप के सामान हमारी पहुँच के अन्दर है, क्योंकि इसके बाहरी वर्णात्मक नाम को बोला या सुना जा सकता है और आन्तरिक धुनात्मक नाम को आन्तरिक प्रकाश और आन्तरिक शब्द के रूप में अन्दर देखा और सुना जा सकता है। अपनी इस विशेषता के कारण राम-नाम परमात्मा के निर्गुण और सगुण, दोनों रूप की विशेषता का बोध कराता है, इनके पारस्परिक सम्बन्ध या एकता को प्रकट करता है और साथ ही जीवों की मुक्ति का भी एकमात्र साधन सिद्ध होता है जो बन्धन ग्रस्त जीवों के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। राम-नाम की विशेषता बताते हुए तुलसीदास जी इसकी तुलना एक कुशल दुभाषिये से करते हैं। तुलसीदास कहते हैं –

“अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी।

उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी।।”

वर्तमान में अध्ययन-अध्यापन की जितनी भी पद्धतियां प्रचलित हैं उनमें राम समाहित हैं। धार्मिक विचारधारा में, आध्यात्मिक ज्ञान में, ज्योतिष शास्त्र में, परंपराओं में, संस्कृत एवं हिंदी व्याकरण में, मंत्रों, यहां तक कि विज्ञान के दृष्टिकोण में भी राम का अस्तित्व दृष्टिगोचर होता है। ऐसे में कैसे न हो राम मेरे आराध्य! यह हर कोई कहता है।

धार्मिक व्याख्या करना अत्यंत कठिन कार्य है। प्रत्येक युग में ईश्वर संबंधी अवधारणाओं में परिवर्तन होता रहा है। मान्यताओं में परिवर्तन के कारण परंपराओं एवं आस्था में भी बदलाव स्वाभाविक है। ऐसा होता रहा है और होता रहेगा।