Hitopadesh ki Kahani : कान्यकुब्ज देश में वीरसेन नाम का राजा था। उसने वीरपुर नगर में अपने पुत्र तुंगबल को वहां का राज्यपाल बना दिया। राज्यपाल की शान तो निराली होती ही है। इस प्रकार एक दिन वह राज्यपाल उस नगर में भ्रमण कर रहा था कि उसने वहां घूमते हुए बड़ी ही सुन्दर और उसी प्रकार के नाम वाली लावण्यवती युवती को देख लिया ।
उस वाणिक्पुत्री को देखकर वह तुंगबल काम पीड़ित हो गया। वह अपने निवास स्थान पर लौट आया, किन्तु उसके काम की ज्वाला किसी प्रकार भी शान्त नहीं हुई ।
अन्य कोई मार्ग न देखकर उसने लावण्यवती का पता लगाया और फिर उसके पास अपनी दूती को भेजा ।
क्योंकि कहा गया है कि मनुष्य अच्छे मार्ग पर तो तब तक ही रह सकता है, इन्द्रियों पर उसका वश भी तभी तक रह सकता है, लज्जा तभी तक रह सकती है और विनय भाव भी तभी तक रह सकता है जब तक कि भौंह रूपी धनुष से छूट कर धैर्य को भगा देने वाले तथा कानों की ओर जाने वाली ललनाओं की कटीली आंखों के दृष्टिरूपी बाण किसी को नहीं आ लगते ।
जो दशा तुंगबल की थी लावण्यवती की भी वही दशा उसको देखकर हो गई थी । वह भी काममोहित होकर अचेत सी होने लगी थी। वह निरन्तर तुंगबल का ही ध्यान करने लगी। कहा भी है कि असत्यभाषण, जल्दबाजी, माया, ईर्ष्या, अधिक लोभ, गुण का अभाव और अपवित्रता ये सब स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं।
दूती लावण्यवती के समीप पहुंच गई। उसने उसको तुंगबल का सन्देश दिया । दूती के वचन सुनकर लावण्यवती कहने लगी, “मैं तो विवाहित हूं और पतिव्रता हूं। इस पतिलंघनरूपी अधर्म के काम में मैं किस प्रकार आगे बढूं?
“क्योंकि वही भार्या सच्ची भार्या है जो घर के काम धन्धे में निपुण हो, जो सन्तानवती हो, जो पतिव्रता हो, और जो पतिव्रता है वही पति को प्रिय है।
“जो भार्या अपने पति को प्रसन्न नहीं कर सकती उसे भार्या नहीं कहा जा सकता । पत्नी का पति यदि सन्तुष्ट हो गया तो समझ लो कि उस पर सब देवता प्रसन्न हो गये हैं । “
लावण्यवती कहने लगी, “मेरे प्राणपति मुझको जो आज्ञा देते हैं मैं तो वही करती हूं।”
दूती बोली, “क्या तुम्हारा कहना सत्य है ? “
लावण्यवती बोली, “हां, अवश्य सत्य है । “
यह सुनकर दूती वापस चली गई। तब जाकर उसने तुंगबल को सारा विवरण सुना दिया ।
यह सुनकर तुंगबल बोला, “यह किस प्रकार संभव है कि स्वयं उसका पति उसको यहां लाकर मेरे हवाले कर दे?”
कुटिनी कहने लगी, “उपाय तो करिये।
“कहा भी गया है कि उपाय से जो सम्भव है वह पराक्रम से सम्भव नहीं हो सकता। बार एक सियार अपने उपाय से हाथी को दलदल के मार्ग से ले गया और इस प्रकार उसने उसको मार डाला।”
तुंगबल ने पूछा, “यह किस प्रकार ?” कुटिनी बोली, “सुनाती हूं, सुनिये ।”
