किर्चे- गृहलक्ष्मी की कहानियां: Grehlakshmi ki Kahani
Kirche Grehlakshmi ki Kahani

Grehlakshmi ki Kahani: सुबह -सुबह जैसे ही वृंदा ने खिड़की खोली ..एक ठंडे हवा के झोंके ने उसके गाल थपथपा दिए। बाहर काले -काले मेघों ने पूरे आकाश को अपने आग़ोश में लिया हुआ था। मौसम अत्यंत सुहावना था ।वृंदा का मन हवा की थपथपाहट के प्रफुल्लित हो गया । संडे की छुट्टी का दिन था ।प्रफुल्लित मन के साथ उसने अपने लिए और पति प्रणव के लिए चाय बनायी ।दोनों बाल्कनी में बैठ कर सुहावने मौसम के साथ चाय की चुस्की का आनंद ले रहे थे की तभी वृंदा केफ़ोन पर घंटी बजी । फ़ोन पर “ मम्मी कॉलिंग “ देख उसकी बाँछे खिल गयी ।
“ कैसी है  वृंदा “
“ अच्छी हूँ माँ ..आप बताओ सब कैसे हैं घर पर ..भैया ,भाभी ,रिया और आशु ..?
“ सब अच्छे हैं बेटा ..अच्छा सुन अगले इतवार को रिया की सगाई है ….तुम दोनों और बच्चे सब आ जाना “ 
“ वाउ रिया की सगाई ….ये कब हुआ और लड़का क्या करता है ? “ अपनी माँ की बात बीच में काटते हुए उत्सुकतावश बोली 
“ अरे उतावली क्यूँ हो रही है ..यहाँ आ जाएगी फिर देख लेना सब ..और हाँ हो सके तो तुम एक दिन 
पहले ही आ जाना । तेरे भाई -भाभी को अच्छा लगेगा “
“ फिर भी माँ बताओ ना लड़का कौन है ..क्या करता है ?”
“ अरे यहाँ आकर देख लियो “
“ बताओ ना माँ प्लीज़ …”
“ बेटा लव मैरिज है ….लड़का उसके साथ उसके ऑफ़िस में था ,साउथ इंडियन है ..” माँ ने हिचकते हुए बोल कर फ़ोन रख दिया ,क्यूँकि इसके बाद कुछ कहने को बचा नहीं था ।
फ़ोन रख कर वृंदा वही जड़वत हो गयी ।मौसम की ख़ुमानी अब अश्रु बन कर बह रही थी ।माँ के कहे शब्द “ बेटा लव मैरिज है ..साउथ इंडियन  है “ उसके कानों में गूंज रहे थे ।अतीत के अपमान की किर्चे शूल की तरह उसके हृदय को भेद रही थीं ।
प्रणव शब्द विहीन मूक दर्शक बन उसे देख रहा था ।वो चुपचाप आँखों में नमी लिए सोफ़े पर आँखें मूँद कर लेट गयी। यादें उसे अतीत में खींचने लगी ।आँखों के समक्ष पंद्रह वर्ष पुराना वो अपमान भरा दृश्य चलचित्र की तरह चलने लगा ।स्नातक की पढ़ाई पूरी करके वृंदा ने कई जगह नौकरी के लिए अप्लाई कर दिया था ।सौभाग्यवश बैंगलोर की एक बड़ी कम्पनी से उसे नियुक्ति पत्र भी आ गया था ।वो पत्र देख कर तो जैसे वो एक चिड़िया की तरह पंख फैलाए आसमान में उड़ने लगी ,किंतु उसे ऐसा लगा की जैसे उसके पंख पकड़ लिए हो ।उसके पिता और भाई उसके बैंगलोर जाने के विरुद्ध थे। दिल्ली से बैंगलोर ….इतनी दूर …वृंदा के अकेले जाने में उन्हें आपत्ति थी ।उसने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की किंतु वे अपने निर्णय पर अटल थे ।उसका साथ सिर्फ़ उसकी माँ ने दिया ।बहुत अनुनय – विनय के पश्चात अंतत: वो अपने पिता और भाई को मनाने में सफल हो गयी ।नए परिवेश में उसे सामंजस्य बैठाने में कुछ समय लगा ।
किंतु जल्द ही वो अपने परिवेश और ऑफ़िस के सभी सहकर्मियों से घुल -मिल गयी । वहीं उसकी मुलाक़ात प्रणव श्रीनिवासन से हुई ।प्रणव अत्यंत सौम्य और शालीन व्यक्तित्व का स्वामी था ।साधारण रूप -रंग के प्रणव में एक कशिश थी जिस कारण वो उसकी तरफ़ खिंच रही थी ।समय के साथ उसकी प्रणव से अच्छी मित्रता हो गयी किंतु उसने सदा मित्रता की गरिमा बनाए रखी ।अपने हृदय के बात उसने कभी प्रणव से नहीं कही ।समय अपनी गति से गतिमान था ।उस दिन वैलेंटायन डे पर जैसे उसकी मुँह -माँगी मुराद मिल गयी ।प्रणव ने उसके समक्ष अपने प्रेम का इज़हार करते हुए विवाह का प्रस्ताव रख दिया ।वो सतरंगी दुनिया में रंगने लगी ।सुलझे हुए प्रणव का साथ पा कर वो अत्यंत खुश थी किंतु कहीं न कहीं उसके मन में भय था कि उसका परिवार उसके इस प्रेम प्रसंग को स्वीकृति नहीं देंगे ।प्रणव उससे जब भी उसके परिवार से मिलने को कहता वो हमेशा टाल देती ..किंतु कब तक । और अंततः वो दिन आ गया जिसे वो टाल रहीथी , प्रणव की ज़िद के समक्ष उसे झुकना पड़ा ।जिस बात का उसे भय था आख़िर वही हुआ ।एक साउथ इंडियन लड़केके साथ विवाह प्रस्ताव उन्हें क़तई मंज़ूर नही था ।
“ वृंदा तुम सोच भी कैसे सकती हो इस विवाह के लिए । हमारी संस्कृति ,रहना -सहना सभी कुछ इनसे बहुत भिन्न है ।”
“ लेकिन पापा ,भैया मैं प्रणव से प्रेम करती हूँ “
“ वृंदा प्रेम का बुलबुला जब विवाह के पश्चात फटता है तो सैलाब बन जाता है ।और फिर तुम्हारे समक्ष इसका कोई वजूदनहीं है ।तुम्हारे रंगरूप के समक्ष इसका रंगरूप जैसे चाँद पर लगा बड़ा सा काले भद्दे दाग जैसा है ।एक साउथ इंडियन …”
“ भैया आप प्रणव का अपमान कर रहे है ..”
“ अरे वो है ही इसी लायक …” पापा के कड़क स्वर से वो हिल गयी ।
प्रणव ने जैसे ही कुछ बोलना चाहा ,उसके भाई ने उसका घोर अपमान करके उसे घर से निकाल 

दिया किंतु वो अकेला नहीं गया ,वृंदा ने भी सदा के लिए घर छोड़ दिया ।
वक़्त अपनी रफ़्तार से चल रहा था ।कहते हैं ना की वक़्त से बड़ा मरहम कोई नहीं । वक़्त बड़े -से  बड़ा घाव भी भर देता है।

धीरे -धीरे वृंदा और उसके परिवार के बीच की कड़वाहट भी ख़त्म हो गयी किंतु उसके परिवार ने मुक्त हृदय से प्रणव को कभी स्वीकार नहीं किया ।
कहते हैं ना इतिहास सदा अपने को दोहराता है । एक साउथ इंडियन लड़के ने उसके परिवार में पुन:
प्रवेश किया था और वो भी भैया के दामाद के रूप में ।इंसान कितना भी परम्परा वादी , सामजिक क्यूँ ना हो किंतु अपनी
संतान के समक्ष वो हार जाता है । 
बहन के लिए तो भैया कट्टर विरोधी बन गए थे और बेटी के लिए ….।
“ वृंदा ..” की आवाज़ से वो अपने अतीत के विचारों की दुनिया से अपमान की किर्चे समेटते हुए बाहर आयी ।
“ वृंदा भूल जाओ सब बातें ।पुरानी अपमान की किर्चो को कितना समेटोगी वे उतनी ही चुभेंगी ,जिसकी पीडा तुम्हें कभी जीने नहीं देंगी ।सब समय -समय की बात होती है ।
मैंने दिल्ली की दो टिकट्स करवा ली हैं ।हम ख़ुशी ख़ुशी सगाई का हिस्सा बनेंगे ।भाई आख़िर मेरे ससुराल में पहली शादी है …” कह कर प्रणव हंसने लगा और वृंदा उसके गले लग गयी ।