Vishnuputra Ekveer
Vishnuputra Ekveer

Hindi Katha: देवी लक्ष्मी को शापमुक्त करने के लिए भगवान् विष्णु ने अश्व (घोड़े) का रूप धारण कर लक्ष्मी से योग किया था। इसके फलस्वरूप लक्ष्मी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। तब श्रीविष्णु बोले – ” प्रिय ! ययाति वंश में हरिवर्मा नाम के एक हैं। पुत्र पाने के लिए वे सौ वर्षों से कठोर तप कर रहे हैं। उन्हीं के लिए मैंने यह पुत्र उत्पन्न किया है।

वैकुण्ठ जाने से पूर्व भगवान् श्रीविष्णु देवी लक्ष्मी के साथ राजा हरिवर्मा के सामने प्रकट हुए।

भगवान् विष्णु को देखकर राजा हरिवर्मा ने उनके श्रीचरणों में मस्तक झुका दिया और स्तुति करते हुए बोला – “प्रभु! मुझ अज्ञानी को दर्शन देकर आपने मुझे धन्य कर दिया । “

भगवान् विष्णु ने उसे इच्छित वर माँगने को कहा। हरिवर्मा ने हाथ जोड़कर कहा- ‘भगवन् ! मैंने पुत्र पाने के लिए तप किया है। मुझे अपने जैसा एक वीर, तेजस्वी और धर्मात्मा पुत्र प्रदान करने की कृपा करें, प्रभु। “

भगवान् विष्णु बोले – “हे राजन! तुम यमुना और तमसा ( टौंस नदी के पावन संगम पर चले जाओ। वहाँ मेरा एक पुत्र तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है। स्वयं देवी लक्ष्मी उस बालक की जननी हैं। उसकी उत्पत्ति तुम्हारे लिए ही की गई है। अतः उसे स्वीकार करो। “

भगवान् विष्णु की बात सुनकर हरिवर्मा अत्यंत प्रसन्न हुआ। वह उसी समय रथ पर सवार होकर भगवान् विष्णु के बताए स्थान पर गया और उस दिव्य बालक को पुत्र रूप में स्वीकार करके प्रसन्नतापूर्वक अपने नगर की ओर चल पड़ा।

हरिवर्मा की पत्नी एक साध्वी स्त्री थी। वह उस बालक को देखकर आनन्द- मग्न हो गई। राजा हरिवर्मा ने एक बड़े समारोह का आयोजन करके पुत्रोत्सव मनाया। याचकों को प्रचुर दान दिया गया। हरिवर्मा ने अपने उस पुत्र का नाम एकवीर रखा।

राजा हरिवर्मा ने बालक के सभी संस्कार सम्पन्न करवाए और उसके लिए की व्यवस्था की। ग्यारहवें वर्ष में राजा ने यज्ञोपवीत संस्कार कराकर एकवीर के लिए धनुर्विद्या पढ़ाने की व्यवस्था की । जब राजा हरिवर्मा ने देखा, राजकुमार ने धनुर्विद्या सीख ली है और राजधर्म के सभी नियम उसे भली-भाँति ज्ञात हो गए हैं, तब उसके मन में उसका राज्याभिषेक करने का विचार उत्पन्न हुआ।

शीघ्र ही एक शुभ मुहूर्त में अभिषेक में प्रयोग आने वाली सारी सामग्री एकत्र की गई। वेदों और शास्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मण बुलवाए गए और हरिवर्मा ने राजकुमार एकवीर का विधिवत राज्याभिषेक करवाया । एकवीर को राज्य का कार्यभार सौंपकर राजा हरिवर्मा रानी सहित वन में चला गया।

वन में आश्रम बनाकर हरिवर्मा और उनकी पत्नी तपस्वी की भाँति रहने लगे। उन्होंने अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण अधिकार कर लिया था। मैनाक पर्वत पर आश्रम में उनका समय बीतने लगा। कुछ समय बाद उन दोनों का शरीर पंचतत्वों में विलीन हो गया। भगवान् विष्णु के आशीर्वाद से उन्हें मृत्यु के बाद वैकुण्ठ में स्थान प्राप्त हुआ।