नदी के किनारे छोटे-छोटे कंकड़ों को लेकर फिर नदी में फेंकना और उनकी डुबुक-डुबुक लहराती कई जगह कूदती चाल देखना ये भी अपने आप में इंतज़ार का समय बिताने का एक कतिपय साधन है। रोहित आज अपनी प्रेमिका सुधा का इंतज़ार ऐसे ही कर रहा था।
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शाबाश – गृहलक्ष्मी कहानियां
तन्वी छोटी सी थी जब उसके पिता नहीं रहे, नानी नानाजी उसे और उसकी माँ को अपने घर ले आये थे। ननिहाल में वैसे बाक़ी सब ठीक था किन्तु माँ ने सबके लाख समझाने पर भी दूसरा विवाह नहीं किया था।
इसलिये जब कभी नानी और माँ में खटकती तो नानी पहले उसके मरहूम पापा को कोसती जो अपनी जिम्मेदारी पूरी किये बिना इस दुनिया से चले गए और फ़िर तन्वी की बारी आती, जिसके मोह में उनकी बेटी जीवन भर वैधव्य की चादर ओढ़ कर बैठी थी। तीसरा वार वो ईश्वर पर करती थी। जिसने उसकी पुत्री और नातिन को आश्चर्यजनक रूप दिया, और इतनी ख़राब किस्मत दी, अब इन दो प्राणियों की चिन्ता में वो स्त्री दिन प्रतिदिन चिड़चिड़ी होती जा रही है।
धूप की तलाश – गृहलक्ष्मी कहानियां
बड़ी देर से धूप की तलाश थी। पता नहीं आज सूरज भगवान कहाँ गायब हो गए हैं। ठंढ से बदन अकड़ा जा रहा है। ऊपर नजर दौड़ाई, आसमान दिख ही नहीं रहा है। यानी नीला आसमान गायब है। उसकी जगह मटमैली, भूरी, फटी सी चादर दिख रही है। झबरी बोली-कई दिनों से ये धुँध बढ़ती ही जा रही है।
नारी – गृहलक्ष्मी कविता
किसी किताब के पन्नों में लिखा था नारी को देवी का रूप कहा था पर आज नारी को कोई देवी नहीं मानता उसे खुलेआम बदनाम करने से कोई नहीं चुकता पुराणों में जहां नारी की शक्ति को दर्शाया आज वहां नारी को समझ कोई नहीं पाया। जिस देश में नारियों को देवी के रूप में […]
दिन और रात उनके दर्शन करते हैं
जब मैं सात-आठ साल की थी तो मैं अपनी नानी जी के घर रहने के लिए गई थी। वहां पर हम सभी बैठे बातें कर रहे थे तो वैष्णों देवी की बातें होने लगीं और मेरे मामा-मामी जी ने बताया कि जब वे लोग वैष्णों देवी की यात्रा पर गए थे तो उन्होंने लगभग रात […]
रिवाज या लालच – गृहलक्ष्मी कहानियां
हैलो समधन जी! कैसी हैं आप? मैंने सोचा कि आपको याद दिला दूं कि शिखा की गोद भराई आने वाली है| सब तैयारी हो गई है ना? देखना हमारा सबके सामने तमाशा ना बने” शिखा की सास लता जी ने फोन पर कहा।
जब चीटों ने दिखाया रास्ता
मैं बचपन से ही बेहद नटखट थी व खाने की बेहद शौकीन। एक दिन पिताजी आए, उनके हाथों में कई पैकेट व एक हाथ में बड़ा सा बर्तन था। पिताजी ने माताजी को निर्देश दिए कि ये मिठाइयां व रसगुल्ले वे ननकू हलवाई के यहां से लाए हैं, जो देसी घी की स्वादिष्ट मिठाइयां बनाता […]
सिनेमा घर का चक्कर
जब मैं छोटा बच्चा था तो बेहद नटखट था। मेरी माताजी की, उनकी सास यानी मेरी दादी से आए दिन खट-पट होती ही रहती थी और माताजी को मनाने के लिए हमारे पिताजी पास के ही सिनेमाघर में माताजी को ले जाते थे, मेरा भी बहुत मन होता था कि मैं भी जाकर देखूं वहां होता क्या है।
हमें भी सम्मानित करो – गृहलक्ष्मी कहानियां
कोरोना कब जाएगा ये तो चीन को भी नहीं पता परंतु कोरोना कैरियर्ज से ज्यादा कोरोना वारियर्ज की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।
संबंधों के समीकरण – गृहलक्ष्मी कहानियां
शुचिता से मिलने के बाद जाते हुए जब दीप ने अपना फैसला सुनाया तो उसे सुनकर न केवल शुचिता के मम्मी पापा चौंक गए बल्कि खुद दीप के मम्मी पापा को अपने बेटे के इस अप्रत्याशित फैसले से हैरानी हो रही थी ।
