आज तीन दिन हो गये थे, वो ना जाने कहाँ गायब हो गया था!
एक अजीब सी तड़प महसूस हो रही थी मुझे, उसकी ग़ैर-मौजूदगी से।
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मिसाल – गृहलक्ष्मी लघुकथा
शांतिनगर मोहल्ले का माहौल शोरमय हो गया। ढोल नगाड़े के शोर में लोगों की ऊंची आवाजें ‘हरी बाबू- जिंदाबाद’ गूंज रही थीं।
घर के अंदर सभी सदस्य एक दूसरे को बधाई देते हुए आगत की तैयारी में जुट गये थे।
दहेज – गृहलक्ष्मी लघुकथा
शिवांश एक कम्पनी में इंजीनियर था। उसके साथ कम्पनी में अक्षिता भी कार्य करती थी, दोनों एक दूसरे को पसन्द करते थे परन्तु डरते थे कि कहीं दोनों के माता-पिता जाति -भेद के कारण मना न कर दें।
नशा – प्रेमचंद कहानियाँ
ईश्वरी एक बड़े जमींदार का लड़का था और मैं ग़रीब क्लर्क था, जिसके पास मेहनत-मजदूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी। हम दोनों में परस्पर बहसें होती रहती थीं। मैं ज़मींदार की बुराई करता, उन्हें हिंसक पशु और ख़ून चूसनेवाली जोंक और वृक्षों की चोटी पर फूलनेवाला बंझा कहता। वह ज़मींदारों का पक्ष लेता; पर स्वभावत: उसका पहलू कुछ कमज़ोर होता था, क्योंकि उसके ज़मीदारों के अनुकूल कोई दलील न थी।
मानुष गंध – गृहलक्ष्मी लघुकथा
मैं अपनी धुन में सड़क पर चला जा रहा था तभी एक आवाज सुनाई दी-एक्सक्यूज मी, इस रोड का नाम क्या है? स्टेट बैंक की ब्रांच इसी रोड पर है?
खालीपन – गृहलक्ष्मी कविता
एक अजीब सी बात हो गई, कुछ अलग सी बात हो गई। यूं तन्हा से जब कर गए, तो जिंदगी वीरान सी हो गई। मेरे ख्यालों को कर गए खाली, और खालीपन सी बात हो गई। अब सिर्फ ख्याल बाकी हैं, और सांस खयालों में खो गई। यह खालीपन रहा होगा कहीं न कहीं तुममें […]
वफादार नेवला: पंचतंत्र की कहानी
एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ गाँव में रहता था। उनका एक पुत्र था, जिसे वे दोनों बेहद चाहते थे। एक शाम ब्राह्मण घर लौटा तो अपने साथ छोटा सा नेवला लेता आया। उसने पत्नी से कहा कि नन्हा नेवला उनके बेटे का पालतू बन जाएगा। बच्चा व नेवला दोनों ही बड़े होने लगे। धीरे-धीरे […]
गृहलक्ष्मी की कहानियां – कान्हा
मोबाइल की रिंग सुन सुचारिता अपने दुपट्टे से हाथ पोंछती हुई डायनिंग टेबल पर रखे फोन की ओर बुदबुदाती हुई बढ़ी-
अरमानों की आहुति
शाम हो चुकीथी। ठंडी हवा चल रही थी। घर की खिड़कियों में पर लगे वो हल्के पीले रंग के पर्दे उड़ने लगे थे। बाहर बालकनी में लगे मनीप्लांट की बेल भी मानो हवा का आनंद ले रही हो। तुलसी का कोमल पौधा तेज़ हवा को सहन नहीं कर पा रहा था। तभी सुधाजी तेज क़दमों से आई और तुलसी के पौधे को भीतर ले गई।
एक व्हाट्सएप संदेश
मुन्नों कल से तुम्हें फोन मिला- मिला कर थक गई ।अब तुम्हारी तो नई-नई शादी हुई है, तो मजे कर रही होगी ,लेकिन अपनी मैं किससे कहूं। एक तुम ही तो मेरी अपनी हो, इसीलिए व्हाट्सएप कर रही हूं ।
