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मैं अपनी मम्मी को बूढ़ी नहीं होने दूंगा

बात अब से 22-23 साल पहले की है। हम संयुक्त परिवार में रहते थे। मेरे बेटे को मुझ से बहुत ज्यादा प्यार था इसलिए वह हमेशा मेरे आसपास रहता था। उसकी दादी, बुआ आदि उसे छेड़ती, ‘तुम्हारी मम्मी अच्छी नहीं है, तुम्हें प्यार भी नहीं करती। बेटा कहता, ‘मेरी मम्मी बहुत अच्छी है, आप तो […]

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फ्रिज में सेब का पेड़

बात तब की है जब मैं चार वर्ष का था। मुझे सेब बहुत अच्छे लगते थे। मैंने पापा से कहा, पापा क्यों न हम अपने बाग में सेब का एक पेड़ लगवा लें। पापा ने कहा कि सेब सिर्फ ठंडे स्थानों पर ही फलता है, यहां गर्मी में नहीं। यह सुनते ही मैंने कहा, तो क्यों नहीं हम इसे […]

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“” मुग्धा “”

सच में बहुत सोच समझ कर ही यह नाम रखा था दादी ने वो ऐसी ही थी जो उसे देखता बस मुग्ध हो जाता। दादी की देख रेख और मां के प्यार ने मुग्धा को सिर्फ रूप का ही नही गुणों का भी धनी बना दिया था। और एक कहावत ही शायद उसी के लिए […]

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सोने पर लोन

मैं गांव की रहने वाली सीधी-सादी, कम पढ़ी-लिखी लड़की थी। शादी होकर इलाहाबाद आई, एक दिन पति के साथ मैं बाहर घूम रही थी तो मैंने अपने पति से कहा, ‘सुनो जी, आज रात को हम लोग इस बैंक के पास ही सोएंगे। मेरे ऐसा कहने पर मेरे पति ने मुझे बड़े आश्चर्य से देखा और बोले, ‘तुम […]

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डबल धमाल कर दिया

उन दिनों मैं मायके उन दिनों मैं मायके  गई हुई थी। अचानक, एक दिन मेरे पति देव अपने एक जिगरी मित्र के साथ वहां आ धमके। कुछ ही देर में मैं उन दोनों के लिए चाय बनाकर ले आई। इनके मित्र महोदय पहला घूंट लेते ही तपाक से बोल पड़े, ‘अच्छा खासा मजाक कर लिया भाभी आपने! क्या हम […]

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जिसने बांधा, वही खोले

बात तब की है, जब मैं तकरीबन तीन-चार साल की थी। मेरे पिताजी रोज सुबह ‘दुर्गा सप्तशती का पाठ करके ही ऑफिस जाया करते थे। एक दिन उनकी पूजा के समय मैं बहुत ही जिद कर रही थी। जिस पर उन्होंने गुस्से में मुझे चारपाई के पाये से बांध दिया और खुद पूजा करने लगे। […]

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इतना खाते हैं शर्म नहीं आती

हमारे घर पर पापा के कुछ दोस्त आए हुए थे तो मम्मी ने तरह-तरह के पकवान बनाए। मैं भी मम्मी का हाथ बंटा रही थी। जब मेहमान खाने पर आए तो वो लोग खाना खाने में सकुचा रहे थे, तो मैंने झट से बोला, इतना खाते हैं… शर्म नहीं आती। सभी मेहमानों का मुंह देखने […]

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पापड़ गायब हो गए

एक बार मैं अपने मायके गई हुई थी, उसी समय मेरी दीदी और उनके दोनों बच्चे भी वहां आए हुए थे। घर पर जब सब इकट्ठे होते तो बहुत खाते-पीते और मस्ती करते। एक दिन गली में पापड़ वाला आवाज देते हुए निकला, हम सभी को पापड़ खाना बहुत पसंद था। जैसे ही हमने पापड़ वाले की आवाज सुनी […]

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खूब पड़ी बारिश की मार

जब मैं 7-8 साल का था, मुझे बारिश में नहाना बहुत पसंद था। एक दिन की बात है, मैं स्कूल के लिए निकला। मैंने देखा बहुत जोर की बारिश आ रही है। सोचा घर जाऊंगा तो खाना नहीं मिलेगा और खेल भी नहीं। फिर मैं बस में चढ़ गया। जब स्कूल आने में 5 मिनट […]

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जै हो गैया मैया की – गृहलक्ष्मी कहानियां

शहर की स्वच्छता को चार-चांद लगाते उस सिविल अस्पताल के पिछवाड़े में खाने लायक कुछ ढूंढने वह वह रोज वहां आती थी। वह आती और बड़ी दिलेरी से रोगियों की जूठन या फिर फलों के सड़े गले छिलके तक खाने में वह गुरेज न करती और उस ढेर पर चढ़ती चली जाती, एक ही झटके में, देश के स्वास्थ्य नियमों को ठेंगा दिखाने की नीयत से शायद। इंजेक्शन की सुईयां तो रोगी तक को नहीं चूकती तो फिर उसके नंगे नखों को छलनी करने से क्योंकर कतराती?

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