‘मां आज नाश्ते में आलू के परांठे बना देना, नहीं मां आलू के नहीं प्याज़ के बनाना, रोहन-रिया की फरमाइश अभी सुन ही रही थी कि अजय कहने लगे, ‘क्या तुम लोग भी आलू प्याज करते रहते हो यह भी कोई परांठे हैं, खाने हैं तो गोभी या पनीर के खाओ, मज़ा आ जायेगा।
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खुला आकाश – गृहलक्ष्मी कहानियां
ट्रिन– ट्रिन हेलो कौन?
– नमस्ते भाईसाहब कैसे हैं?
ठीक हूं। तुम सुनाओ।
समीकरण – गृहलक्ष्मी कहानियां
आसमां से विधाता भी अपनी इस कृति (इंसान) को देख निहाल हो रहा था। ‘विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी सकारात्मक और आशावादी बने रहकर तू विजयी हो ही जाता है। धन्य है तू!
गवाही – गृहलक्ष्मी कहानियां
प्लीज यहां से जाओ, तुम कभी नहीं समझ सकती कि मैं तुमसे कितना प्यार करता था। तुम्हारे लिए मैं कुछ भी करता पर तुमने, तुमने तो कभी मेरी कोई बात ही नहीं सुनी, तुम कभी मुझे सुनना ही नहीं चाहती थीं
बेटी
रमेश अपनी पांच वर्षीय बेटी के साथ खेल रहा था। कभी बच्ची छिपती। रमेश ढूंढ़ता।कभी रमेश छिपता। बेटी ढ़ूंढ़ती । जब पिता नहीं मिलते तो बच्ची रोने ल्रगती।रमेश दौड़कर उसे गले लगा लेता ।रमेश अपनी बेटी को और पिताओं से कुछ ज्यादा ही प्यार करते थे ।
किराए का घर
रानीगंज गांव का बलदेव एक छोटा-सा किसान है। उसके पास लगभग दो एकड़ की खेती है। अनाज की पूर्ति उसे अपने खेतों से हो जाती है और रोजमर्रा की जरूरतों को रोजी-मजदूरी कर पूरी करता है।
लत – टीवी के तेज़ होते वॉल्यूम
टीवी के तेज़ होते वॉल्यूम के साथ बहू माला के डांटने का स्वर गूंजा तो बाबूजी की नींद भी उचट गई। अब फिर से नींद नहीं आने वाली, सोचकर उन्होंने तकिए के नीचे से अमृता प्रीतम की ‘सात सौ बीस कदम’ निकाली और सहारा लेकर बैठ गए। नजरें स्वत: ही समीप लेटी पत्नी वसुंधरा की ओर घूम गई।
