सास-ससुर की फोटो घर में टांगना यानी नई परम्परा का सूत्रपात और नारी को समान अधिकार दिये जाने की दिशा में सराहनीय काम।
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अपना- अपना आसमान – गृहलक्ष्मी कहानियां
अनु को महसूस हो रहा था कि काशीबाई और उसमें क्या फर्क है, दोनों की दशा एक जैसी है। फिर अचानक एक दिन अनु और काशीबाई ने मिलकर ऐसा क्या किया जिससे दोनों को अपना- अपना आसमान मिल गया…
नाबालिग अपराधी – गृहलक्ष्मी कहानियां
मनोज अमीर माँ बाप का इकलोता बेटा था। घर में किसी चीज़ की कमी न थी उसकी हर जिद्द पूरी की जाती थी। उसके पिताजी की कई फैक्टरियां थी। उनकी इच्छा थी कि मनोज बडा होकर उनका कारोबार सम्भाले, लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। बचपन से ही मनोज का मन पढाई में नहीं लगता था । सारा दिन पार्क में खेलना,मौज मस्ती करना ही उसे अच्छा लगता था ।
मोहल्ले का इकलौता नल – गृहलक्ष्मी कहानियां
जिस मकान के सामने नल लगा था, उन्हें लोग कह रहे थे आप मजे में रहे। लेकिन अगली सुबह ही उस परिवार को समझ आ गया कि वह किस मुसीबत में पड़ गए हैं..
वीरा या प्रेरणा – गृहलक्ष्मी कहानियां
सुबह शायद चार बजे थे वीरा को नींद नहीं आ रही थी । बार बार सोने की कोशिश करती, पर नींद थी कि उसका दूर दूर तक कहीं पता न था । मन में अनेक संकल्प चल रहे थे कि उठ कर कुछ पढ़ लूं या कुछ व्यायाम ही कर लूं। वीरा को सुबह सुबह प्राणायाम करने की आदत थी । पिछले तीस सालों से यह सिलसिला चालू था । पर अभी तो रात के दो ही बजे थे। इतनी सुबह उठ गयी तो दिन भर थकावट लगती रहेगी । यही सोच बिस्तर पर पिछले एक घंटे से करवटें बदल रही थी ।
रंग जो छूटे नाहि – गृहलक्ष्मी कहानियां
अरे भाई, जरा ठीक से रिक्शा चलाओ न। क्या सामान समेत नीचे ही गिरा दोगे। रिक्शा वाला बोला, हम क्या करें, रास्ते में इतने गड्ढे हैं कि झटके तो लगेंगे ही। वो बड़ी मुश्किल से बैठ पा रही थी, कभी अपना बैग तो कभी अपनी अटैची सम्भालती। इतना तो विदेश से कानपुर आने में नही परेशान हुई जितना कि अपनी गली में आने से थक गयी और झुंझलाते हुए बोली कि हद हो गयी, इतने सालों बाद कुछ भी नहीं बदला।
बुआ फिर आना – गृहलक्ष्मी कहानियां
छोटी सी मिनी पर इतना सारा पढ़ाई का बोझ, उसपर टीचर और मां की डांट। घर आई मिनी की बुआ ने ऐसा क्या किया कि हमेशा उदास रहने वाली मिनी अब खिलखिलाती रहती। कभी बुआ से कहानी सुनती तो कभी उन्हें कविता सुनाती…
बिना छांव का दरख़्त – गृहलक्ष्मी कहानियां
अनु जरा जल्दी जल्दी हाथ चला, मुझे देर हो रही है। हां मम्मी, बस काम खत्म होने वाला है , मैंने सब्जी काट दी और किचेन का सारा काम भी निबटा दिया है।
मुफ्तखोरी की महिमा – गृहलक्ष्मी कहानियां
कई बार तो मुफ्त में मुंह की खानी पड़ती है। मुफ्त में दिमाग खाने वाले हर जगह उपलब्ध हैं। कल ही महंगाई कहने लगी, ‘मैं जान दे दूंगी, पर ठंडे चूल्हे पर आंच नहीं आने दूंगी’, महंगाई की इस जिद का भी मुफ्तखोरी पर कोई असर नहीं दिखता।
सेवा का सुख – गृहलक्ष्मी कहानियां
पति की मृत्यु के बाद नीलाद्रि के सामने समस्या थी कि वह अपना जीवन अकेले कैसे व्यतीत करे। उसके एक बड़े निर्णय ने उसकी सारी समस्या ही हल कर दी।
