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दरार भरने की दरार – गृहलक्ष्मी कहानियां

मैंने घर में सबको मना कर दिया था कि जब श्रुति दी आएँ तो उस समय कमरे में कोई नहीं आएगा। छोटे भाई-बहनों को इस बात की कतई तमीज़ नहीं है। कोई भी मेरे पास आएगा, तो आनेवाले के आस-पास वे इस प्रकार मँडराएँगे, गोया वह उन लोगों से ही मिलने आया हो।

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श्मशान- गृहलक्ष्मी कहानियां

तीन वर्ष बीत गए। इन तीन वर्षों में दोनों एक-दूसरे के कितने निकट आ गए थे, इस बात का अहसास ही उन्हें उस दिन हुआ, जब ललित के विदेश जाने की बात निश्चित हो गई। बड़े जोश के साथ सारा घर तैयारी में जुट गया।

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सौदागर व जिन्न – अलिफ़ लैला की कहानियाँ

एक समय की बात है, एक धनी सौदागर था। वह अक्सर व्यापार करने दूसरे शहरों में जाता था। एक दिन वह लंबी यात्रा पर रवाना हुआ। उसने खजूरों से भरा एक थैला लिया क्योंकि उसे एक ऐसे रेगिस्तान से गुजरना था, जहां खाने के लिए आसानी से कुछ नहीं मिलता था। वह तीन दिन के लंबे सफर के बाद चौथे दिन ऐसी जगह पहुंचा, जहां रेगिस्तान में कुछ पानी था और खजूर व ताड़ के पेड़ दिख रहे थे। वह काफी भूखा व थका हुआ था। उसने पेड़ के नीचे सुस्ताने का मन बनाया।

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चश्मे – गृहलक्ष्मी कहानियां

बरामदे के दरवाजे के आखिरी ताले को झटका देकर जब मिसेज वर्मा आश्वस्त हुई, तो भीतर ड्राइंग-रूम की घड़ी ने साढ़े ग्यारह बजे का एक घंटा बजाया। बीच में रखी हुई ड्रेसिंग टेबल से उन्होंने दूध का गिलास उठाया तो काली-सी परछाई शीशे में उस समय तक दिखाई देती रही, जब तक वे बरामदे की आखिरी सीढी उतरीं।

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वापसी – गृहलक्ष्मी की कहानियां

रात के 10:00 बज चुके थे ।सड़क छोड़कर रमेश धीरे धीरे पुल की तरफ बढ़ रहा था। सामने पुल नजर आ रहा था। रमेश ने एक बार जी भर कर उस सड़क को देखा, कितनी यादें जुड़ी हैं इस सड़क के साथ। इस सड़क के इस पार कुछ ही दूर पर तो उसका घर था और दूसरी ओर स्कूल ।हालांकि स्कूल भी थोड़ा दूर ही था, लेकिन उस की बिल्डिंग इतनी बड़ी थी, कि दूर से ही नजर आती थी।

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रानी माँ का चबूतरा – गृहलक्ष्मी कहानियां

आज रात को जब चबूतरे पर बैठक लगी तो औरतों की चर्चा का विषय पूर्णिमा को होनेवाला आयोजन था। कौन क्या पहनेगी, पूजा की थाली में क्या ले जाएगी, क्या मनौती मानेगी आदि बातों पर चर्चा हो रही थी कि रामी अपनी छोटी बहिन धन्नी को लेकर पहुँची। बूढ़े काका ने अपनी चिलम दूसरे के हाथ में थमाते हुए कहा, ‘बड़ी देर कर दी रामी। शायद बहिन की खातिर में लगी थी।’

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शायद – गृहलक्ष्मी कहानियां

जहाज़ की बत्तियाँ जलीं तो लगा, जैसे पानी में बिछी अँधेरे की चादर में अनेक दरारें पड़ गई हों। चारों ओर बल्बों की झूलती बंदनवार देखकर ही राखाल को खयाल आया कि इस बार वह दीवाली घर पर ही मनाएगा। कितना अच्छा होता, किसी तरह वह पूजा पर ही पहुँच पाता।

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निर्धन अब्दुल्ला और उसका सपना – अलिफ़ लैला की कहानियाँ

बहुत समय पहले की बात है। अब्दुल्ला नाम का एक गरीब आदमी था। उसकी पत्नी सुलताना उसे हमेशा कोसती रहती थी। उनका घर सुलतान के महल के खंडहर की टूटी दीवार से लगा हुआ था।

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एक बार और – गृहलक्ष्मी कहानियां

सारा सामान बस पर लद चुका है। बस छूटने में पाँच मिनट बाकी है। ड्राइवर अपनी सीट पर आकर बैठ गया है। सामान को ठीक से जमाकर कुली नीचे उतर आया है और खड़ा-खड़ा बीड़ी फेंक रहा है। अधिकतर यात्री बस में बैठ चुके हैं, पर कुछ लोग अभी बाहर खड़े विदाई की रस्म अदा कर रहे हैं। अड्डे पर फैली इस हल्की -सी चहल-पहल से अनछुई-सी बिन्नी चुप-चुप कुंज के पास खड़ी है। मन में कहीं गहरा सन्नाटा खिंच आया है। इस समय कोई भी बात उसके मन में नहीं आ रही है, सिवाय इस बोध के कि समय बहुत लंबा ही नहीं, बोझिल भी होता जा रहा है। लग रहा है जैसे पाँच मिनट समाप्त होने की प्रतीक्षा में वह कब से यहाँ खड़ी है। कुंज के साथ रहने पर भी समय यों भारी लगे, यह एक नयी अनुभूति है, जिसे महसूस करते हुए भी स्वीकार करने में मन टीस रहा है।

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असामयिक मृत्यु – – गृहलक्ष्मी कहानियां

सब-कुछ जहाँ का तहाँ थम गया।
गति महेश बाबू के हृदय की बंद हुई थी, पर चाल जैसे सारे घर की ठप्प हो गई। अधूरा बना हुआ मकान और अधकचरी उम्र के तीन बच्चे।

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