पांव में दर्द आज कुछ ज़्यादा ही महसूस हो रहा था। शायद ठण्ड की दस्तक का असर था । बदन में सिहरन भी थी। बालकनी में बाहर निकल कर देखी तो रास्तों पर गाड़ियां भी कम ही दिख रही थी। सामने वाले पार्क में छोटे बच्चे दौड़- दौड़ कर खेल रहे थे,
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कभी न भूलने वाली कहानी – गृहलक्ष्मी कहानियां
बात है सावन महीने में बिहार के सिंहेश्वर नाम के बाबा भोले नाथ की छोटी सी नगरी की जहां बहुत से श्रद्धालु देश विदेश से पूजा करने और बाबा को जल अर्पित करने आते हैं।
मज़ाक – गृहलक्ष्मी कहानियां
विनय आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था। वह बहुत तेज तर्रार और शरारती लड़का था। सदा कुछ न कुछ शरारत करता ही रहता था, परन्तु कभी भी पकड़ा नहीं जाता था। उल्टा उसके कारण दूसरों को डाट पड़ जाती थी। एक दिन उसने अपने एक मित्र सुरेश की साइकिल के टायर में पिन चुभो दिया।
शक्तिला – गृहलक्ष्मी कहानियां
साबित कर दिया शक्तिला ने कि हिम्मत हो तो कोई नहीं डिगा सकता किसी को भी… और लडक़ी की सबसे बड़ी खूबसूरती है, मुश्किलों से लडऩे का हौसला और सही निर्णय लेने की क्षमता। आज अपने नाम को सार्थक कर लिया था उसने…।
नाबालिग अपराधी – गृहलक्ष्मी कहानियां
मनोज अमीर माँ बाप का इकलोता बेटा था। घर में किसी चीज़ की कमी न थी उसकी हर जिद्द पूरी की जाती थी। उसके पिताजी की कई फैक्टरियां थी। उनकी इच्छा थी कि मनोज बडा होकर उनका कारोबार सम्भाले, लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। बचपन से ही मनोज का मन पढाई में नहीं लगता था । सारा दिन पार्क में खेलना,मौज मस्ती करना ही उसे अच्छा लगता था ।
मोहल्ले का इकलौता नल – गृहलक्ष्मी कहानियां
जिस मकान के सामने नल लगा था, उन्हें लोग कह रहे थे आप मजे में रहे। लेकिन अगली सुबह ही उस परिवार को समझ आ गया कि वह किस मुसीबत में पड़ गए हैं..
वीरा या प्रेरणा – गृहलक्ष्मी कहानियां
सुबह शायद चार बजे थे वीरा को नींद नहीं आ रही थी । बार बार सोने की कोशिश करती, पर नींद थी कि उसका दूर दूर तक कहीं पता न था । मन में अनेक संकल्प चल रहे थे कि उठ कर कुछ पढ़ लूं या कुछ व्यायाम ही कर लूं। वीरा को सुबह सुबह प्राणायाम करने की आदत थी । पिछले तीस सालों से यह सिलसिला चालू था । पर अभी तो रात के दो ही बजे थे। इतनी सुबह उठ गयी तो दिन भर थकावट लगती रहेगी । यही सोच बिस्तर पर पिछले एक घंटे से करवटें बदल रही थी ।
सीख अनकही – गृहलक्ष्मी कहानियां
पति सोमेश के एक हफ्ते के टूर पर जाते ही पूनम ने भी अपना मन मायके में जाने का बना लिया, क्योंकि दोनों बच्चे भी समर कैैंम्प के लिये गये हुए थे। मन इतना खुश था कि रात को ही मां को फोन करके अपने आने की सूचना भी दे दी।
बुआ फिर आना – गृहलक्ष्मी कहानियां
छोटी सी मिनी पर इतना सारा पढ़ाई का बोझ, उसपर टीचर और मां की डांट। घर आई मिनी की बुआ ने ऐसा क्या किया कि हमेशा उदास रहने वाली मिनी अब खिलखिलाती रहती। कभी बुआ से कहानी सुनती तो कभी उन्हें कविता सुनाती…
मुफ्तखोरी की महिमा – गृहलक्ष्मी कहानियां
कई बार तो मुफ्त में मुंह की खानी पड़ती है। मुफ्त में दिमाग खाने वाले हर जगह उपलब्ध हैं। कल ही महंगाई कहने लगी, ‘मैं जान दे दूंगी, पर ठंडे चूल्हे पर आंच नहीं आने दूंगी’, महंगाई की इस जिद का भी मुफ्तखोरी पर कोई असर नहीं दिखता।
