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draupadi vyatha

नवजीवन के स्वप्न आंखों में

संजोये अर्जुन की नववधू बन

तेरे द्वार पे आई

बांट दिया अज्ञानवश मुझको पांचों पांडवो में और जीवन पर्यन्त

‘पांचाली’ मैं कहलाई

तब हे! हस्तिनापुर तू बता कि

माता कुंती की उस भूल में

भला मेरा कसूर क्या था?

सत्तामोह के वशीभूत कौरवों ने

युद्धभूमि में षड्यंत्र रचाया

पांडवों से प्रतिशोध की

खातिर अश्वत्थामा ने

मेरे सपूतों का रक्त बहाया

खो दिए सब लाल अपने

और निपूती मैं ही कहाई

तब हे! हस्तिनापुर तू बता कि

महाभारत के उस युद्ध में

भला मेरा कसूर क्या था?

कोख मेरी उजड़ी, हुई मैं कलंकित

निर्लज्जों ने परिहास बनाया

निरपराध बनीं अपराधी

युद्ध का दोषी भी मुझे ही ठहराया

नियति का ये खेल निराला

मुझको तनिक समझ न आया

स्वामियों संग इस अंतिम यात्रा पर

क्यूं पापिन जान,

धर्मराज ने भी ठुकराया

अब हे! हस्तिनापुर तू बता कि

ईश्वर की रची इस लीला में

भला मेरा कसूर क्या था?

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