विवाह के उपरांत राजा पांडु विशाल सेना लेकर विजय-अभियान पर निकले। उन्होंने आस-पास के सभी प्रदेशों को जीत लिया, जिससे उनका यश चारों ओर फैल गया। तत्पश्चात् अधीनस्थ शासकों से अपार धन एकत्रित कर वे हस्तिनापुर लौट आए।
एक बार राजा पांडु के मन में वन-विहार की इच्छा जागृत हुई। तब वे हस्तिनापुर का राजकाज बड़े भाई धृतराष्ट्र को सौंपकर हिमालय के दक्षिणी भाग में स्थित मनोहारी प्रदेशों में घूमने के लिए चले गए। उनके साथ उनकी रानियां कुंती और माद्री भी थीं।
एक दिन राजा पांडु शिकार पर निकले। एक स्थान पर झाड़ियों के झुरमुट में उन्हें मृग-मृगी का एक जोड़ा दिखाई दिया, जो प्रेम-क्रीड़ा में लिप्त था। पांडु ने शीघ्र धनुष पर बाण चढ़ाया और उन पर छोड़ दिया। बाण मृगी के शरीर को भेदता हुआ मृग को जा लगा।
वास्तव में वे किन्दम मुनि थे, जो अपनी पत्नी के साथ रमण कर रहे थे। बाण लगते ही वे अपने वास्तविक रूप में आ गए। किन्दम मुनि ने मरते समय पांडु को शाप दिया‒”राजन! तुमसे घोर पाप हो गया। ऐसी अवस्था में कोई व्याध भी किसी पशु का वध नहीं करता। हमारा वध करने से पूर्व तुम्हें हमारे निवृत्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी। तुमने प्रेम-क्रीड़ा में मग्न दम्पति का वध किया है, इसलिए मैं तुम्हें शाप देता हूं कि जिस क्षण तुम अपनी पत्नी के साथ प्रेम-क्रीड़ा में रत होंगे, उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे।”
अनजाने में किए गए इस कृत्य से पांडु अत्यंत दुःखी हुए। उन्होंने उसी समय सिंहासन का त्याग कर दिया और वन में रहते हुए तपस्या करने लगे। उन्होंने कुंती और माद्री को हस्तिनापुर लौट जाने के लिए कहा, परंतु वे दोनों भी वहीं रहकर उनकी सेवा करने लगीं।
शाप के कारण पांडु अपनी पत्नियों से दूर रहते थे, परंतु उन्हें संतान का अभाव दिन-रात परेशान करता था।
एक दिन पांडु को शोकमग्न देखकर कुंती ने कारण पूछा। पांडु को संतानहीन होने का दुःख था। तब कुंती ने दुर्वासा मुनि द्वारा दिए गए वरदान की बात पांडु को बताई और कहा‒”राजन! यदि इस मंत्र से मैं किसी देवता को आमंत्रित करूं तो वे तुरंत मेरे सामने आ जाएंगे और मेरा मनोरथ पूर्ण करेंगे।”
यह बात सुनकर पांडु बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उसी समय कुंती को मंत्र का प्रयोग करके तीन पुत्रों को जन्म देने के लिए प्रेरित किया।
पति की आज्ञा का पालन करते हुए कुंती ने तीन बार दिव्य मंत्र का आह्वान किया, जिसके प्रभाव से सर्वप्रथम धर्मराज प्रकट हुए। उनकी कृपा से कुंती के प्रथम पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर की उत्पत्ति हुई। वायुदेव की कृपा से भीम की और देवराज इन्द्र की कृपा से अर्जुन का जन्म हुआ। कुंती ने माद्री को भी इस मंत्र के प्रयोग की विधि बता दी। इसके फलस्वरूप माद्री के नकुल और सहदेव नामक दो पुत्र हुए, जो अश्विनी कुमारों की कृपा का प्रसाद थे। इस प्रकार पांडु के ये पांचों पुत्र ‘क्षेत्रज पुत्र’ कहलाए, जो ‘पांडव’ नाम से प्रसिद्ध हुए।
एक दिन आश्रम सुनसान था। माद्री को देखकर दैववश राजा पांडु के मन में काम का संचार हो गया। मृत्यु उनके सिर पर नाच उठी। फिर उन्होंने जैसे ही माद्री के साथ रमण करने का प्रयास किया, मुनि के शाप के कारण उनकी तत्काल मृत्यु हो गई। आश्रम में ही राजा पांडु का अंतिम संस्कार किया गया। रानी माद्री राजा पांडु की मृत्यु का कारण स्वयं को मानती थी। अतः उसने अपने पुत्रों को कुंती को सौंपा और पति के साथ अग्नि-समाधि ले ली। दुःखी कुंती अपने पांचों पुत्रों के साथ हस्तिनापुर लौट गई।
