Aprajeeta hai Stree
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Hindi Women Poem: अपराजिता की बेल हूं मैं,कहां दफन हो पाती हूं?

चाहें कोई भी मौसम हो, हर हाल में मैं मुस्काती हूं।
चाहें कितने पतझड़ आयें,मैं फिर से खड़ी हो जाती हूं।

चाहें कितनी चलें आंधियां,चाहें कितने उठे तूफान,
अस्तित्व अपना स्वयं बनाती,स्वाभिमान से मैं भर जाती हूं।

बड़े-बड़े पौधे (सूरमा) भी मुझसे,प्रेरणा पाते जीवन की,
कितनी कठिन परिस्थिती हो फिर भी,लगन रहती आगे बढ़ने की।

चाहे कितने कीट पतंगे,करते मुझको हाल-बेहाल,
थोड़ा वक्त जरूर हूं थमती,फिर बढ़ती दुगनी रफ़्तार।

अपने जैसे कोमल पौधों को मै,निरंतर बढना सिखाती हूं,
डरो नहीं तुम, डटे रहो तुम,यही पाठ सिखलाती हूं।

नारी जीवन भी मुझ सा ही,डरे तो लाखों डरायेंगें,
बढोगी जो साहस से आगे,अच्छे-अच्छे भी झुक जाएंगे।

बनो अपराजिता हर बेटी तुम,हौसलों को अपने बुलंद करो,
ना सर है झुकाना, ना खुद को मिटाना,बस अपनी आवाज बुलंद करो।बेल बनाना तुम।

बने अपराजिता हर एक नारी,बिटिया को भी अपराजिता बनाओ तुम,
ना होना दफन, ना होना खत्म,बस अपनी राह बनाना तुम।

चाहे कितनी आऐं विपदा, चाहे कितने संकट हो,
हिम्मत का तश्कर पीठ पर रखकर,हर पल अब मुस्कुराना तुम।

अपराजिता की बेल हू मैं,कहां दफन हो पाती हूं?