गृहलक्ष्मी की कविता

गृहलक्ष्मी की कविता:

चूर हो गया दर्पण मेरा, अनेकों चेहरे उसमें मेरे नज़र आए
हर टुकड़े में चेहरे के मेरे अलग-अलग कई रूप नज़र आए,

कोई रोता, कोई हंसता था, ईर्ष्या से भरा हुआ कोई दिखता था,
कोई अपमान किसी का करता कोई स्वयं अपमानित लगता था,

कोई दयालु था, कोई क्रूर था और कोई स्वयं में ही मगरूर था,
कोई लोभ में था, कोई मोह में, कोई छल में था कोई हठ में था,

कोई अहंकार में कोई तनाव में, नफरत में तो कोई घृणा में था,
किये हुए अपराधों के बोध से, एक चेहरा मेरा पश्चाताप में था,

नहीं था मालूम मुझे एक चेहरे के पीछे इतने सारे विभिन्न रूप हैं,
और यह सारे मेरे गुण और अवगुण से भरे हुए सत्य के स्वरूप हैं,

जो चेहरे मुझे पसंद ना आए उन सभी को मैंने चकनाचूर किया,
जो टुकड़े मेरे मन को भाए उन टुकड़ों को मैंने फ़िर एकत्र किया,

और हटा कर सारे दुर्गुणों को एक नये चेहरे को मैंने जन्म दिया,
अब इसी चेहरे के साथ रहूंगी, मैंने मन ही मन यह संकल्प लिया

कोशिश है यही मेरी केवल उसी चेहरे को अपने साथ मैं रख पाऊं,
पुराने चेहरे बार-बार पीछे आते हैं, पीछा कैसे उनसे मैं छुड़ा पाऊं,

चाह कर भी उन अप्रिय चेहरों से, मैं कभी जीत क्यों नहीं पाती हूं,
समझ गई मैं इंसान हूं, इंसान के चोले से बाहर निकल ना पाती हूं।

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