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गोदान - मुंशी प्रेमचंद - Hindi novel Godan by Premchand | Grehlakshmi
godan by munshi premchand

मिर्ज़ा खुर्शेद का हाता क्लब भी है, कचहरी भी, अखाड़ा भी । दिन भर जमघट लगा रहता है । मुहल्ले में अखाड़े के लिए कहीं जगह नहीं मिलती थी । मिर्ज़ा ने एक छप्पर डलवाकर अखाड़ा बनवा दिया है; वहाँ नित्य सौ-पचास लड़न्तिये आ जुटते हैं । मिज़ाजी भी उनके साथ जोर करते हैं । मुहल्ले की पंचायतें भी यही होती हैं, मियाँ-बीवी और सास-बहू और भाई-भाई के झगड़े-टपके यही चुकाये जाते हैं । मुहल्ले के सामाजिक जीवन का यही केन्द्र है और राजनीतिक आन्दोलन का भी । आये दिन सभाएं होती रहती हैं । यही स्वयंसेवक टिकते हैं, यहीं उनके प्रोग्राम बनते हैं, यही से नगर का राजनीतिक संचालन होता है ।
गोबर को यहाँ रहते साल भर हो गया । अब यह सीधा-सादा ग्रामीण युवक नहीं है । उसने बहुत कुछ दुनिया देख ली और संसार का रंग-ढंग भी कुछ-कुछ समझने लगा है । मूल में वह अब भी देहाती है, पैसे को दाँत से पकड़ता है, स्वार्थ को कभी नहीं छोड़ता, और परिश्रम से जी नहीं चुराता, न कभी हिम्मत हारता है; लेकिन शहर की हवा उसे भी लग गयी है । उसने पहले महीने तो केवल मजूरी की और आधा पेट खाकर थोड़े से रुपये बचा लिये । फिर वह कचालू और मटर और दही-बड़े के खोंचे लगाने लगा । इधर ज्यादा लाभ देखा, तो नौकरी छोड़ दी । गर्मियों में शर्बत और बरफ की दूकान भी खोल दी । लेन-देन में खरा था इसलिये उसकी साख जम गयी । जाड़े आये, तो उसने शर्बत की दूकान उठा दी और गर्म चाय पिलाने लगा । अब उसकी रोजाना आमदनी ढाई-तीन रुपये से कम नहीं । उसने अंग्रेजी फैशन के बाल कटवा लिए हैं, महीन धोती और पम्पशू पहनता है । एक लाल ऊनी चादर खरीद ली और पान-सिगरेट का शौकीन हो गया है । सभाओं में आने-जाने से उसे कुछ राजनीतिक ज्ञान भी हो चला है । राष्ट्र और वर्ग का अर्थ समझने लगा है । सामाजिक रूढ़ियों की प्रतिष्ठा और लोक-निन्दा का भय अब उसमें बहुत कम रह गया है । आये दिन की पंचायतों ने उसे निस्संकोच बना दिया है । जिस बात के पीछे वह यहाँ घर से दूर, मुँह छिपाये पड़ा हुआ है, उसी तरह की. बल्कि उससे भी कहीं निन्दास्पद बातें यही नित्य हुआ करती हैं । और कोई भागता नहीं । फिर वही क्यों इतना डरे और मुँह चुराये!
इतने दिनों में उसने एक पैसा भी घर नहीं भेजा । वह माता-पिता को रुपये-पैसे के मामले में इतना चतुर नहीं समझता । वे लोग तो रुपये पाते ही आकाश में उड़ने लगेंगे । दादा को तुरन्त गया करने की और अम्मा को गहने बनवाने की धुन सवार हो जायेगी । ऐसे व्यर्थ के कामों के लिए उसके पास रुपये नहीं हैं । अब वह छोटा-मोटा महाजन है । पड़ोस के एक्केवालों, गाड़ीवानों और धोबियों को सूद पर रुपये उधार देता है । इस दस-ग्यारह महीने में ही उसने अपनी मेहनत और किफायत और पुरुषार्थ से अपना स्थान बना लिया है और अब झुनिया को यही लाकर रखने की बात सोच रहा है ।
तीसरे पहर का समय है । वह सड़क के नल पर नहाकर आया है और शाम के लिए आलू उबाल रहा है कि मिर्ज़ा खुर्शेद आकर द्वार पर खड़े हो गये । गोबर अब उनका नौकर नहीं है; पर अदब उसी तरह करता है और उसके लिए जान देने को तैयार रहता है । द्वार पर आकर पूछा-क्या हुक्म सरकार?
मिर्ज़ा ने खड़े-खड़े कहा-तुम्हारे पास कुछ रुपये हों, तो दे दो । आज तीन दिन से बोतल खाली पड़ी हुई है, जी बहुत बेचैन हो रहा है ।
गोबर ने इसके पहले भी दो-बार मिर्ज़ाजी को रुपये दिये थे; पर अब तक वसूल न कर सका । तकाजा करते डरता था और मिर्ज़ाजी रुपये लेकर देना न जानते थे । उनके हाथ में रुपये टिकते ही न थे । इधर आये उधर गायब । यह तो न कह सका, मैं रुपये न दूँगा या मेरे पास रुपये नहीं हैं, शराब की निन्दा करने लगा-आप इसे छोड़ क्यों नहीं देते सरकार? क्या इसके पीने से कुछ फायदा होता है?
मिज़ाजी ने कोठरी के अन्दर खाट पर बैठते हुए कहा-तुम समझते हो, मैं छोड़ना नहीं चाहता और शौक से पीता हूँ । मैं इसके बगैर जिन्दा नहीं रह सकता । तुम अपने रुपये के लिये न डरो, मैं एक-एक कौड़ी अदा कर दूंगा ।
गोबर अवचिलित रहा-मैं सच कहता हूँ मालिक! मेरे पास इस समय रुपये होते तो आपसे इनकार करता?
‘दो रुपये भी नहीं दे सकते?’
‘इस समय तो नहीं हैं ।’
‘मेरी अंगूठी गिरो रख लो ।’
गोबर का मन ललचा उठा; मगर बात कैसे बदले।
बोला-यह आप क्या कहते हैं मालिक, रुपये होते तो आपको दे देता, अँगूठी की कौन बात थी?
मिर्ज़ा ने अपने स्वर में बड़ा दीन आग्रह भरकर कहा- मैं फिर तुमसे कभी न मांगूँगा गोबर! मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा है । इस शराब की बदौलत मैंने लाखों की हैसियत बिगाड़ दी और भिखारी हो गया । अब मुझे भी जिद पड़ गयी है कि चाहे भीख ही माँगनी पड़े, इसे छोड़ेगा नहीं ।
जब गोबर ने अबकी बार इनकार किया, तो मिर्ज़ा साहब निराश होकर चले गये । शहर में उनके हज़ारों मिलनेवाले थे । कितने ही उनकी बदौलत बन गये थे । कितनों ही को गाढ़े समय पर मदद की थी; पर ऐसे से वह मिलना भी न पसन्द करते थे । उन्हें ऐसे हज़ारों लटके मालूम थे, जिससे वह समय-समय पर रुपयों के ढेर लगा देते थे; पर पैसे की उनकी निगाह में कोई कूद न थी । उनके हाथ में रुपये जैसे काटते थे । किसी-न-किसी बहाने उड़ाकर ही उनका चित्त शान्त होता था । गोबर आलू छीलने लगा । सालभर के अन्दर ही वह इतना काइयाँ हो गया था और पैसा जोड़ने में इतना कुशल कि अचरज होता था । जिस कोठरी में वह रहता है, वह मिर्ज़ा साहब ने दी है । इस कोठरी और बरामदे का किराया बड़ी आसानी से पाँच रुपया मिल सकता है । गोबर लगभग साल भर से उसमें रहता है; लेकिन मिर्ज़ा ने न कभी किराया माँगा न उसने दिया । उन्हें शायद ख्याल भी न था कि इस कोठरी का कुछ किराया भी मिल सकता है ।

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थोड़ी देर में एक इक्के वाला रुपये माँगने आया । अलादीन नाम था, सिर घुटा हुआ, खिचड़ी दाढ़ी, और काना । उसकी लड़की बिदा हो रही थी । पाँच रुपये की उसे बड़ी ज़रूरत थी । गोबर ने एक आना रुपया सूद पर रुपये दे दिये ।
अलादीन ने धन्यवाद देते हुए कहा-भैया, अब बाल-बच्चों को बुला लो । कब तक हाथ से ठोंकते रहोगे ।
गोबर ने शहर के खर्च का रोना रोया-थोड़ी आमदनी में गृहस्थी कैसे चलेगी?
अलादीन बीड़ी जलाता हुआ बोला-खरच अल्लाह देगा भैया! सोचो, कितना आराम मिलेगा । मैं तो कहता हूँ, जितना तुम अकेले खरच करते हो, उसी में गृहस्थी चल जायगी । औरत के हाथ में बड़ी बरक्कत होती है । खुदा कसम, जब मैं अकेला यही रहता था, तो चाहे कितना ही कमाऊँ खा-पी सब बराबर । बीड़ी-तमाखू को भी पैसा न रहता । उस पर हैरानी, थके-मांदे आओ. तो घोड़े को खिलाओ और टहला । फिर नानबाई की दूकान पर दौड़ो । नाक में दम आ गया । जब से घरवाली आ गयी है, उसी कमाई में उसकी रोटियाँ भी निकल आती हैं और आराम भी मिलता है । आखिर आदमी आराम के लिए ही तो कमाता है । जब जान खपाकर भी आराम न मिला, तो जिन्दगी ही गारत हो गयी । मैं तो कहता हूँ, तुम्हारी कमाई बढ़ जायेगी भैया! जितनी देर में आलू और मटर उबालते हो, उतनी देर में दो-चार प्याले चाय बेच लोगे । अब चाय बारहों मास चलती है । रात को लेटोगे तो घरवाली पांच दबायेगी । सारी थकान मिट जायेगी ।
यह बात गोबर के मन में बैठ गयी । जी उचाट हो गया । अब तो वह झुनिया को लाकर ही रहेगा । आलू चूल्हे पर चढ़े रह गये, और उसने घर चलने की तैयारी कर दी; मगर याद आया कि होली आ रही है, इसलिए होली का सामान भी लेता चले । कृपण लोगों में उत्सवों पर दिल खोलकर खर्च करने की जो एक प्रवृत्ति होती है, वह उसमें भी सजग हो गयी । आखिर इसी दिन के लिए कौड़ी-कौड़ी जोड़ रहा था । वह माँ, बहनों और झुनिया सबके लिए एक-एक जोड़ी साड़ी ले जायेगा । होरी के लिए एक धोती और एक चादर । सोना के लिए तेल की शीशी ले जायेगा, और एक जोड़ा चप्पल । रूपा के लिए जापानी चूड़ियाँ और झुनिया के लिए एक पिटारी, जिसमें तेल, सिन्दूर और आईना होगा । बच्चे के लिए टोप और फ्राक जो बाजार में बना-बनाया मिलता है । उसने रुपये निकाले और बाजार चला । दोपहर तक सारी चीज़ें आ गयी । बिस्तर भी बँध गया, मुहल्लेवालों को ख़बर हो गयी, गोबर घर जा रहा है । कई मर्द-औरतें उसे बिदा करने आये । गोबर ने उन्हें अपना घर सौंपते हुए कहा-तुम्हीं लोगों पर छोड़े जाता हूँ । भगवान ने चाहा तो होली के दूसरे दिन लौटूंगा ।

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एक युवती ने मुस्कुराकर कहा- मेहरिया को बिना लिये न आना, नहीं घर में न घुसने पाओगे ।
दूसरी प्रौढ़ा ने शिक्षा दी-ही और क्या, बहुत दिनों तक चूल्हा फूँक चुके । ठिकाने से रोटी तो मिलेगी!
गोबर ने सबको राम-राम किया । हिन्दू भी थे, मुसलमान भी थे, सभी में मित्रभाव था, सब एक-दूसरे के दुःख-दर्द के साथी । रोजा रखनेवाले रोजा रखते थे । एकादशी रखनेवाले एकादशी । कभी-कभी विनोद-भाव से एक-दूसरे पर छींटे भी उड़ा लेते थे । गोबर अलादीन की नमाज को उठा-बैठी कहता, अलादीन पीपल के नीचे स्थापित सैकड़ों छोटे-बड़े शिवलिंग को बटखरे बनाता, लेकिन साम्प्रदायिक द्वेष का नाम भी न था । गोबर घर जा रहा है । सब उसे हंसी-खुशी बिदा करना चाहते हैं ।
इतने में भूरे एक्का लेकर आ गया । अभी दिन भर का धावा मारकर आया था । ख़बर मिली, गोबर घर जा रहा है । वैसे ही एक्का इधर फेर दिया । घोड़े ने अपत्ति की । उसे कई चाबुक लगाये । गोबर ने एक्के पर सामान रक्खा, एक्का बढ़ा, पहुंचाने वाले गली के मोड़ तक पहुंचाने आये. तब गोबर ने सबको राम-राम किया और एक्के पर बैठ गया ।
सड़क पर एक्का सरपट दौड़ा जा रहा था । गोबर घर जाने की खुशी में मस्त था । भूरे उसे घर पहुँचाने की खुशी में मस्त था और घोड़ा था पानीदार, उड़ा चला जा रहा था । बात की बात में स्टेशन आ गया ।
गोबर ने प्रसन्न होकर एक रुपया कमर से निकाल कर भूरे की तरफ बढ़ाकर कहा-लो, घरवालों के लिए मिठाई लेते जाना ।

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भूरे ने कृतज्ञता-भरे तिरस्कार से उसकी ओर देखा-तुम मुझे गैर समझते हो भैया! एक दिन ज़रा एक्के पर बैठ गये तो मैं तुमसे इनाम लूँगा । जहाँ तुम्हारा पसीना गिरे, वही खून गिराने को तैयार हूँ । इतना छोटा दिल नहीं पाया है । और ले भी लूँ तो घरवाली मुझे जीता छोड़ेगी??
गोबर ने फिर कुछ न कहा । लज्जित होकर अपना असबाब उतारा और टिकट लेने चल दिया ।

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