Overview:
पेरेंटिंग एक ऐसी पाठशाला है जिसमें बच्चा और पेरेंट्स दोनों ही स्टूडेंट्स होते हैं। इस सफर में हर माता-पिता को बहुत कुछ सीखना पड़ता है। क्योंकि सही पेरेंटिंग स्टाइल बच्चे का भविष्य संवार सकती है।
Dolphin Parenting Style: भारत में स्टूडेंट सुसाइड के लगातार सामने आ रहे मामले एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है। एजुकेशन सिस्टम के साथ ही इसे काफी हद तक सुलझा सकती है सही पेरेंटिंग। पेरेंटिंग एक ऐसी पाठशाला है जिसमें बच्चा और पेरेंट्स दोनों ही स्टूडेंट्स होते हैं। इस सफर में हर माता-पिता को बहुत कुछ सीखना पड़ता है। क्योंकि सही पेरेंटिंग स्टाइल बच्चे का भविष्य संवार सकती है। वहीं कुछ गलतियां इसे बिगाड़ भी देती हैं। ऐसे में अगर आप एक सफल और सुरक्षित पेरेंटिंग पैटर्न अपनाना चाहते हैं तो वो है डॉल्फिन पेरेंटिंग। इस पेरेंटिंग के ढेरों फायदे हैं। आइए जानते हैं क्या है डॉल्फिन पेरेंटिंग।
कॉन्फिडेंस का दूसरा नाम है यह पेरेंटिंग

डॉल्फिन पेरेंटिंग में आप बच्चे को आत्मनिर्भर, स्वतंत्र और सफल बनाने पर फोकस करते हैं। इस पेरेंटिंग को अपनाने वाले माता-पिता अपने बच्चों के लिए नियम तो बनाते हैं, लेकिन इस दौरान बच्चे की इच्छाओं, रुचियों, क्षमताओं और क्रिएटिविटी का भी ध्यान रखते हैं। इससे बच्चों की जीवन में बैलेंस बनता है। बच्चे अपनी क्षमताओं को पूरी रुचि के साथ विकसित कर पाते हैं। वे अपना निर्णय खुद लेना सीखते हैं। साथ ही अपनी समस्याओं को अपने स्तर पर सुलझाने की कोशिश भी करते हैं।
माता-पिता फॉलो करते हैं ये बातें
डॉल्फिन पेरेंटिंग दुनियाभर में अपनाई जाने वाली मशहूर पेरेंटिंग स्टाइल है। इसमें माता-पिता हर तरह से अपने बच्चे को मजबूत बनाने पर ध्यान देते हैं। इसके लिए वे कुछ बातों को अपनाते हैं।
1. सुनते हैं बच्चों के दिल बात
डॉल्फिन पेरेंटिंग में माता-पिता कई बातों को अपनाते हैं। वे बच्चों को हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार करते हैं। उन्हें इतना मजबूत बनाते हैं कि वे परेशानियों से विचलित नहीं होते हैं। पढ़ाई के साथ ही वे बच्चों की एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज पर भी पूरा फोकस करते हैं और इन्हें बच्चों की पसंद के अनुसार ही चुनते हैं।
2. सजा नहीं, समझाइश पर जोर
एक समय था जब गलती करने पर बच्चों को कठोर सजा देना सही माना जाता है। लेकिन आज के बच्चे इन सजाओं से सुधरने की जगह टूट सकते हैं। डॉल्फिन पेरेंटिंग इसमें बीच का रास्ता अपनाती है। यानी इसमें पेरेंट्स बच्चों को गलतियों पर सजा तो देते हैं, लेकिन वो बहुत कठोर नहीं होती। वे सजा के साथ बच्चे को समझाते हैं। साथ ही उन्हें इन गलतियों से सीखने का मौका देते हैं।
3. बहुत ज्यादा निर्देश न देना
डॉल्फिन पेरेंटिंग में बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया जाता है। इसमें पेरेंट्स बच्चों को सलाह तो देते हैं, लेकिन उन पर अपनी मर्जी थोपते नहीं हैं। वह उन्हें बहुत ज्यादा निर्देश नहीं देते। कोशिश करते हैं कि बच्चे अपने फैसले खुद लें। ऐसे बच्चे बड़े होने पर भी सही फैसला कर पाते हैं।
4. संतुलित रहने की सीख
डॉल्फिन पेरेंटिंग का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि पेरेंट्स बच्चों को एकदम आजाद छोड़ देते हैं और सिर्फ उनकी इच्छा पर ही ध्यान देते हैं। बल्कि इसमें पेरेंट्स संतुलित रास्ता अपनाते हैं। वे बच्चों के मार्गदर्शक तो बनते हैं, लेकिन उन्हें अपनी राह चुनने की आजादी देते हैं। वे बच्चों की जरूरतों को समझते हैं, लेकिन गलत बातों को नहीं मानते।
इसलिए जरूरी है डॉल्फिन पेरेंटिंग

आज के समय में जब हर बच्चा दुनिया घर से बाहर निकलकर नहीं बल्कि मोबाइल की नजरों से देख रहा है, डॉल्फिन पेरेंटिंग बेस्ट कही जा सकती है। इससे बच्चों पर पॉजिटिव असर पड़ता है। बच्चे खुलकर जीना सीखते हैं और उन्हें यह पता चलता है कि आखिर दुनिया में हो क्या रहा है। इस पेरेंटिंग से माता-पिता और बच्चों के बीच अच्छी बॉन्डिंग बनती है, जो जिंदगी भर का सहारा होती है। ऐसे में बच्चे मानसिक और भावनात्मक रूप से ज्यादा स्ट्रांग होते हैं। इस पेरेंटिंग पैटर्न से बड़े हुए बच्चों में आत्मविश्वास ज्यादा होता है। उनमें जिम्मेदारी की भावना भी ज्यादा होती है और वे अपने पेरेंट्स का सम्मान ज्यादा करते हैं।
