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क्या है ओशो की मृत्यु का रहस्य?: Osho Death
Osho Death Reason

Osho Death: ओशो की मृत्यु को लेकर शक या सवाल ओशो के पुराने संन्यासियों में हमेशा से रहा है। सच तो यह है कि ओशो की मृत्यु को लेकर संन्यासी भी एक मत नहीं हैं, उस पर 11 अगस्त 2016 को ए.बी.पी न्यूज पर प्रसारित रिपोर्ट ‘ओशो को किसने मारा?’ ने इस विषय को और हवा दे दी, और लोगों को बातें बनाने का मौका मिल गया। क्या था उस रिपोर्ट में और क्या कहना है उसके पक्ष-विपक्ष में ओशो के वरिष्ठï संन्यासियों का आइए जानते हैं।

यदि ओशो की मृत्यु की बात करें तो इस बात पर चर्चा करना बेइमानी सा लगता है क्योंकि बुद्धों की पहचान उनकी चेतना से होती है, उनके योगदान से होती है। उनके शरीर पर बात करना और वह भी उसके विदा हो जाने के बाद कोई अर्थ नहीं रखती। ओशो के संन्यासियों एवं प्रेमियों का यदि एक समूह ऐसा है जिन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि ओशो की मृत्यु कैसे और क्यों हुई तो एक समूह एवं आम जनता इस बात को जानने में उत्सुक रहती है कि ओशो की मृत्यु कैसे हुई। अपने-अपने तल के अनुसार दोनों ही समूह अपनी जगह ठीक हैं। माना कि इस तफ्तीश से कुछ हासिल नहीं होने वाला, सत्य, सत्य रहेगा और जाने वाला कभी लौट कर नहीं आएगा परंतु जो लोग ओशो के साथ हृदय से जुड़े हंै या जिन्हें लगता है उनके गुरु के साथ गलत हुआ उनके लिए यह बात बहुत मायने रखती है। साथ ही वह आम जनता जो वजह-बेवजह, आधी-अधूरी जानकारी के कारण गलतफहमियों का शिकार होती है और अपने अधूरे ज्ञान को आगे हस्तांतरित करती है उन सब के लिए बहुत जरूरी हो जाता है।
इससे पहले हम इस विषय से संबंधित अन्य संन्यासियों के विचारों को जानें प्रस्तुत है वह तथाकथित रिपोर्ट जिसने इस विषय को हवा दी। प्रसारित रिपोर्ट के अनुसार-
ओशो की मौत के 25 साल बाद डॉक्टर गोकाणी ने अदालत में एक हलफनामा दाखिल किया है। उनका कहना है कि मौत के दिन दोपहर 1 बजे से लेकर शाम के 5 बजे तक ओशो के आश्रम में जो कुछ घटा वो रहस्यमयी था जिसके वो अहम गवाह हैैं। 80 साल के डॉक्टर गोकाणी 19 जनवरी 1990 को पुणे के आश्रम में ही मौजूद थे जब आश्रम के लाओत्से हाउस के नए बेडरूम में ओशो ने देह का त्याग किया था।
डॉक्टर गोकाणी ने हलफनामे में कहा है कि 19 जनवरी 1990 के दिन दोपहर 1 बजे जब वो ओशो आश्रम के पास अपने घर में आराम कर रहे थे तब उन्हें आश्रम से ओशो के करीबी स्वामी जयेश उर्फ ‘माइकल ओब्रायन’ के निजी सचिव स्वामी चितिन लेने आए थे। चितिन ने कहा कि ‘लेटरहेड के साथ अपनी इमरजेंसी मेडिकल बैग ले लीजिए।’ आपको स्वामी जयेश ने बुलाया है।
करीब दोपहर डेढ़ बजे चितिन मुझे आश्रम में कृष्णा हाउस के जयेश के रूम में ले गए। तब जयेश ने मुझे कहा कि डॉक्टर अमृतो ऊर्फ डॉक्टर जॉन एड्रंयू ऊर्फ डॉक्टर डॉर्ज मेरीडिथ आपके पास आएंगे और आपको बात समझाएंगे। पांच मिनट बाद अमृतो आए और बिना प्रस्तावना बांधे ही मुझसे कहा कि वो मर रहे हैं। मैंने उनसे पूछा ‘कौन’? उन्होंने कहा ओशो।
मुझे गले से लगा लिया। मैं रो पड़ा। उन्होंने कहा कि क्या आप इस तरह से अपने गुरु को विदाई देंगे। आप अपने आपको संभालो और अपने आश्रम की जिम्मेदारियों को निभाओ।
डॉक्टर गोकाणी के हलफनामें के मुताबिक शाम पांच बजे उन्हें अपने मेडिकल बैग समेत ओशो के कमरे में बुलाया गया। कमरे में जयेश और डॉक्टर अमृतो दोनों मौजूद थे। अमृतो ने कहा ‘उन्होंने कुछ देर पहले शरीर त्याग दिया है और आपको डेथ सर्टिफिकेट लिखना है ताकि उनका अंतिम संस्कार किया जाए।’ मैंने मौत की वजह पूछी क्योंकि मैंने उन्हें मरते हुए नहीं देखा था।
डॉक्टर गोकाणी ने आगे बताया कि मेरे मन में ये विचार भी आया कि मैं तो आश्रम में ही था फिर मुझे उनकी मौत से पहले क्यों नहीं बुलाया? उनके मरने का इंतजार क्यों किया गया। डॉक्टर गोकाणी ने कहा, मुझे ये भी समझ नहीं आया कि अमृतो और जयेश से परिचित बहुत सारे भारतीय और पश्चिमी डॉक्टर मौजूद थे तो फिर मुझे ही क्यों बुलाया’।
डॉक्टर गोकाणी ने कहा कि, ‘मैंने अमृतो से कहा कि डेथ सर्टिफिकेट बनाने के लिए मुझे ओशो का पासपोर्ट चाहिए ताकि मैं पासपोर्ट के मुताबिक उनका नाम लिख सकूं। उन्होंने कहा कि पासपोर्ट एक्सपायर हो चुका है। तब मैंने कहा कोई बात नहीं पुराने से भी काम चल जाएगा। पासपोर्ट को देखकर मैंने डिटेल भरी। और फिर मैंने आग्रह किया कि डेथ सर्टिफिकेट के लिए ओशो के शरीर पर पहचान के तीन निशान चाहिए। जिसके लिए मुझे उनका शरीर देखना पड़ेगा। फिर मैंने ओशो के शरीर पर तीन निशान पहचाने।’
डॉक्टर गोकाणी की तरह ही मा नीलम भी ओशो की मौत के दिन आश्रम में ही मौजूद थीं। मा नीलम भारत में ओशो की निजी सचिव थीं और करीब 35 साल तक ओशो के साथ रही हैं। मा नीलम (ओशो की अनुयायी) ने कहा, ‘मैं आश्रम में थी, पांच बजे बताया गया कि ओशो नहीं रहे।’ खास बात ये है कि मा नीलम उन 21 लोगों में शामिल रहीं हैं जो ओशो के इनर सर्किल में शामिल थे। ओशो का इनर सर्किल ही ओशो के आश्रम का मैनेजमेंट संभालता था।
ओशो की मौत के दिन स्वामी तथागत और स्वामी चैतन्य कीर्ति भी आश्रम में ही मौजूद थे। स्वामी कीर्ति आश्रम के एक प्रवक्ता थे उनका कहना है कि शाम साढ़े पांच बजे उन्हें बताया गया कि वो प्रवक्ता की हैसियत से प्रेस को बता दें कि ओशो नहीं रहे। डॉक्टर गोकुल गोकाणी के हलफनामें से पहले ओशो की अनुयायी और विवादों में रहीं मा आनंद शीला ने अपने मेमॉयर ‘डोन्ट किल हिम’ में ओशो की मौत को लेकर सवाल खड़े किए थे।
मा आनंद शीला का कहना है कि, ‘ओशो की मौत को लेकर जो शक मुझे हमेशा से रहा वो डॉक्टर गोकाणी के हलफनामें के बाद अब यकीन में बदल गया है कि उनकी मौत कुदरती नहीं थी उन्हें मारा गया था। डॉक्टर गोकाणी ने अपने हलफनामे में ओशो की मौत के दिन का जो घटनाक्रम बयान किया है उसके बाद से ओशो की मौत को लेकर रहस्य गहरा गया है।’
डॉक्टर गोकाणी ने हलफनामें में लिखा है कि, ‘मैंने हाथ से लिखा हुआ डेथ सर्टिफिकेट जयेश को दिया, जिसे जयेश मेरे ही लेटर हेड पर टाइप करा कर लाया था। जिसमें गलतिया थीं और मैंने कहा कि इसको दोबारा टाइप करना पड़ेगा तो उन्होंने कहा कि इसको आप हाथ से सुधार दो। मैंने देखा कि डेथ सर्टिफिकेट पर छपे मेरे पते का हिस्सा जयेश ने हाथों से फाड़ दिया।
डॉक्टर गोकाणी अदालत को दिए हलफनामें में आगे कहते हैं कि, ‘उसके बाद जयेश ने पुणे के सासोन सरकारी अस्पताल में जाकर सरकारी कार्यवाही करके अंतिम संस्कार के लिए कानूनी पेपर बनाकर लाने का मुझे आदेश दिया। मेरे साथ स्वामी ध्यानेश उर्फ धनेश जोशी को भेजा गया था। मैंने पूछा कि क्या मैं अपनी पत्नी और बेटी को लाने घर जा सकता हूं। क्योंकि मैं अपने गुरु की मौत के जश्न में उनको शामिल करवाना चाहता था। तो जयेश ने कहा वो किसी और को उन्हें लाने भेजेंगे। ओशो की मौत की बातें किसी को ना बताने का आग्रह मुझसे बार-बार किया गया।’
अपने हलफनामें में डॉक्टर गोकाणी का कहना है कि, ‘ओशो की मौत के विवाद को दबाए रखने के लिए मैंने ये बात बाहर नहीं लाई थी। लेकिन पिछले कुछ सालों में अमृतो और जयेश ने ओशो की मौत पर जो बयान दिए उनमें कई संगीन विसंगतियां है। जैसे कि ओशो की मौत का समय, मैं ओशो की मौत की बात किसी को ना बताऊं इसलिए कमरे में मुझे कैद रखा गया। मुझे सिर्फ डेथ सर्टिफिकेट देने के लिए ही बुलाया गया। मुझे मौत की असली वजह भी नहीं बताई गई। 19 जनवरी 1990 के दिन आश्रम में कई डॉक्टर मौजूद थे। फिर भी अमृतो और जयेश ने किसी की मदद लेना या उन्हें अस्पताल ले जाना जरूरी नहीं समझा। और सबसे अचरज की बात तो ये है कि ओशो की मौत के पब्लिक अनाउंसमेंट के 60 मिनट बाद ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। ये सारी बातें संदेह के घेरे में आती हैं।’
डॉक्टर गोकुल गोकाणी का कहना है कि वो अपने गुरु की मौत के रहस्य को अपने सीने में दबाकर मरना नहीं चाहते हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं उम्र दराज हूं, बीमार हूं। जीवन का कोई भरोसा नहीं है तो मेरे जीवन का ये सबसे गहरा सच अदालत के सामने लाना चाहता हूं।

ओशो के निधन में कोई रहस्य नहीं-अगेह भारती

Osho Death by Ageh
Ageh Bharti

उपर्युक्त रोशनी में देखे जब उन्हें डॉ. गोकाणी को बुलाकर कहा गया कि ओशो देह छोड़ रहे हैं तो वे रो पड़े और ओशो के निजी चिकित्सक डॉ. अमृतो ने उन्हें रोने से मना किया। डॉ. गोकाणी के स्वयं के उक्त कथन से सिद्ध हो जाता है कि वे ओशो के निकट होने के योग्य नहीं थे। वहां जाने मिलता तो वे और भी चिल्लाकर रो सकते थे और इससे ओशो की आत्मा को कितनी पीड़ा होती। उन्होंने मृत्यु पर सदा ही उत्सव मनाने को कहा है। इसी से उनकी इस बात का भी जवाब मिल जाता है कि दिन के 1 बजे से 5 बजे तक माता जी (ओशो की) को सूचित क्यों नहीं किया गया। मां की ममता अपार होती है। वे तो और भी छाती पीटकर रोतीं और उनका रोना ओशो को कितनी पीड़ा पहुंचाता इसका अनुमान सहज ही लग जाता है। मैं अमृतो व जयेश की प्रशंसा करता हूं कि उन्होंने योग्य शिष्य की भांति ओशो को ऐसे भावावेगों से बचाया।
डॉ. अमृतो व जयेश ने ओशो के देह छोड़ते वक्त जिस योग्यता का परिचय दिया वह प्रशंसनीय है।
क्योंकि डॉ. गोकाणी को उस वक्त ओशो के पास नहीं जाने दिया गया जिस वक्त ओशो देह त्याग कर रहे थे, तो उनके अहंकार को चोट लगी जिसका बदला वह अब 26 साल बाद ले रहे हैं।
ओशो को अमरीकी जेल में स्लो पोइजन दिया गया और रेडिएशन से गुजारा गया, इससे ही उनका शरीर जर्जर हुआ। ओशो ने समझ लिया था कि जोड़ों में दर्द अब जाने वाला नहीं है। अब यह देह रहने के योग्य नहीं रह गयी है, तभी तो उन्होंने महीनों पहले पूरे आश्रम की इमारतों को काले रंग से पुतवाया। तथा स्वयं अपनी समाधि बनवाई यह कह कर कि च्वांगत्सू में एक बेड बनवाया जाये वे वहां सोयेंगे।
देह छोड़ते वक्त अमृतो को कहा की च्वांगत्सू वाले बेड के नीचे फूल रख देना, समाधि के लिए वही ठीक रहेगा।
गोकाणी जी का कहना है कि ओशो कि देह को बर्निंग घाट पर जल्दी क्यों ले जाया गया? ओशो ने डॉ. अमृतो को ऐसा निर्देश दिया था और इसके पीछे उनका जीवन दर्शन था। जीवन भर वे अपने को साधारण आदमी कहते रहे। उन्होंने उसके अनुसार ही आचरण किया। उन्होंने पूर्व में निधन को प्राप्त शिष्यों की तरह ही अपना भी अंतिम संस्कार करवाया। यानी 10 मिनट को देह बुद्ध सभागार में रखवाना और उसके बाद नाचते गाते पूरे उत्सव के साथ बर्निंग घाट ले जाना और जला देना, फिर फूला (राख) च्वान्गत्सू में बने बेड, जिसे उन्होंने ही साल भर पूर्व बनवाया था, में रख देना।
देह जल्दी जलवा देने में ओशो की एक और दूर दृष्टि का कमाल है जो गोकाणी जैसों के समझ सकने के बाहर है। वह यह कि ओशो जब देह में थे तो सामान्य दशा में भी कोरेगांव पार्क व आस-पास के होटल, अपार्टमेंट्स सब ओशो के लोगों से भरे रहते थे। रुकने के लिए जगह मिलने में कठिनायी होती थी। यदि ओशो की देह को डॉक्टर एक दिन के लिए रोक लेते तो लोगों को रुकने की जगह न मिलती। बीवी-बच्चों के साथ सड़कों पर भी रुकना पड़ सकता था। और तब महिला संन्यासियों के साथ पूना के कुछ लफंगे किस्म के लोग दुर्व्यवहार भी कर सकते थे, और मार-पीट की नौबत की सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। अतीत में इस तरह की हरकतें हुई हैं। और ऐसे में सरकारी अधिकारियों की नाराजगी का कारण व्यर्थ ही बनते। उन सब दुखद संभावनाओं को निरस्त करते ओशो ने जो निर्देश दिया वह सही था। जब देह ही जला दिया तो आने की अर्जेंसी न रही।
वरना प्रेमी ही नहीं, पूना के तो जिन्हें प्रेम नहीं था वो भी ओशो की देह के दर्शनार्थ टूट पड़ते। और उस भीड़ को सम्हालना प्रशासन को मुश्किल होता। उस रोज पूना में 500 रुपये का एक गुलाब का फूल बिका है।
डॉ. गोकाणी का कहना है कि ओशो जब निर्देश दे रहे थे तो उसे रिकॉर्ड क्यों नहीं किया गया। यह और भी मूर्खता की बात कह रहे हैं गोकाणी जी। इतनी बड़ी घटना घट रही थी उस वक्त, वहां चुपचाप ही रहा जाना चाहिए था। यदि अमृतो व जयेश को रिकॉर्डिंग का ख्याल आता तो वे केवल अयोग्य शिष्य साबित होते। वह मौका गहनता से चुप रह जाने का ही था। बहुत बड़ी घटना घट रही थी। एक सद्ïगुरु देह छोड़ रहा था। उस घटना को चुपचाप पी जाने की जरूरत थी। यदि देखने की आंख हो तो डॉ. अमृतो जिस तरह 20 जनवरी को बुद्ध सभागार में ओशो के देह त्याग की घटना का संन्यासियों के बीच वर्णन कर रहे थे, उस दौरान एक क्षण आता है जब डॉ. अमृतो की सांस फूल जाती है और आंखों में आंसू छलछला आते हैं और वे कुछ बोल नहीं पाते, वही क्षण है जब ओशो ने देह त्यागी।
ओशो जब 17 जनवरी को डॉ. के मना करने के बावजूद अपने प्यारे शिष्यों को लास्ट नमस्ते करने आये और लगभग 19 मिनट तक दोनों हाथ जोड़े हर तरफ घूम-घूम कर एक-एक की आंखों में प्यार से विदा की नजरों से देखा, वह क्या था? कमजोरी इतनी थी कि वे ठीक से खड़े न हो पा रहे थे। एक बार तो लड़खड़ा भी गये। उस दिन बहुतों को आभास हो गया कि ओशो विदा हो रहे हैं। कई लोगों ने यह बात मुझे बताई कि उस दिन उन्हें पता चल गया कि ओशो विदा ले रहे हैं। दो लोगों के नाम अभी भी मुझे याद हैं जिन्होंने बताया कि ओशो से जब नजरे मिलीं तो उन्होंने जैसे साफ ही बॉय कहा और यह इतना साफ था कि मेरे मुंह से भी निकल गया ओके ओशो, बॉय!! वे थे एक तो स्वामी योग प्रताप भारती, और दुसरी थीं कनाडा की मा जीवन मृदा। 18 को ओशो नहीं आये और 19 को पांच बजे शाम देह छोड़ी? तो उनकी तैयारियां तो सालों से चल रही थीं। ‘दि लास्ट नमस्ते’ विडियो देखें तो पता चल जायेगा कि ओशो लास्ट नमस्ते ही करने आये थे, अर्थात विदा लेने ही आये थे। डॉ. गोकाणी एक अभागा शिष्य है जो केवल अपनी दूकान चलाता रहा और ऐसे अनूठे शिष्यों पर ऊंगली उठा रहा है जो अपना घर द्वार, अपना देश, अपना प्रतिष्ठित कारोबार छोड़कर तन मन धन से पूर्ण समर्पण के साथ ओशो की सेवा में लगे रहे। जो ओशो के साथ हथकड़ी पहने और जेल गये। जिन्होंने ओशो को जेल से छुड़ाया। जो विश्व यात्रा में न केवल साथ में रहे वरन उन्होंने ही विश्व यात्रा की सारी व्यवस्था की। उन्हें ही अंतिम क्षण ओशो ने पास रखना पसंद किया।
रहा सवाल कि मा योग नीलम ने जब माता जी को बताया कि ‘ओशो ने शरीर छोड़ दिया है’ तो उनके मुख से निकला, ‘उन्होंने मार डाला’ माता जी ने ठीक ही तो कहा। उन्होंने अमरीकी सरकार को कही यह बात, क्योंकि वह ओशो के प्रवचन सुनती थीं जिसमें ओशो ने बताया है कि उन्हें अमरीकी जेल में स्लो पोइजन दिया गया व रेडीएशन से गुजारा। उन्हें पता था सब। और वे अमृतो व जयेश आदि के प्रति बड़ा स्नेह भाव रखती थी जो ओशो की इतनी केयर लेते हैं। यदि माता जी को भरोसा न होता वो कह सकती थीं, मां थीं वो तो।
ओशो के निधन में कहीं कोई रहस्य नहीं है। बात सीधी साफ है। पूछिये डॉ. गोकाणी से कि ओशो ने डेढ़ दो साल पहले सारी इमारतों को काले रंग में क्यों पुतवाया था? और च्वांगत्सु में समाधि क्यों बनवाई थी? और 17 जनवरी को आने के लायक स्वास्थ्य न होने के बावजूद लास्ट नमस्ते करने क्यों आये थे? और लगभग 19 मिनट तक खड़े रहकर, एक-एक संन्यासी को विदाई की नजर से क्यों देखा था?

ओशो कालजयी हैं उन्हें कौन मार पाएगा?-संजय भारती

उनकी देह छोड़ने की घटना को देखें तो एक महा-छंद उभरता है, जिससे अभिभूत न हों तो क्या हों। ओशो ने अपना शरीर 19 जनवरी 1990 को छोड़ा। उसके तीन वर्ष पूर्व से ही ओशो ने कहना शुरू कर दिया था कि 1985 में जब बारह दिन तक उन्हें अमरीकी जेलों में रखा गया, वहां उन्हें थेलियम नाम का धीमा विष दिया गया था। अपने प्रवचनों में उन्होंने कई बार उस दिन की घटनाओं का जिक्र किया जिस दिन उन्हें विष दिया गया। लेकिन प्रवचनों में ही ओशो ने कहा कि वे तब तक शरीर नहीं छोड़ेंगे जब तक वे अपना काम पूरा नहीं कर लेते, और उनकी बगिया उस स्थिति में नहीं आ जाती जहां उनकी शारीरिक उपस्थिति के बिना भी वह पुष्पित-पल्लवित होती रहे।
इन घोषणाओं के बाद ओशो ने स्पष्टï कर दिया कि अब वे केवल झेन पर ही बोलेंगे-डेढ़ साल तक ओशो झेन पर बोले, और केवल बोले ही नहीं, बल्कि अपने कम्यून को पूरा झेन संसार बना दिया इन्हीं डेढ़ वर्ष में ओशो ने मिस्टिक रोज, नो माइंड और बॉर्न अगेन जैसी शक्तिशाली मेडिटेशन थेरेपीज की रचना की। अब ओशो ने रोज रात प्रवचन के बाद ध्यान का प्रयोग करवाना भी शुरू कर दिया। प्रवचन जो पहले डेढ़ घंटे के हुआ करते थे, अब चार-चार घंटे तक भी पहुंचने लगे, जैसे कि वे स्वयं को पूरा उलीच रहे हों।
19 अप्रैल 1989 को ओशो ने अपने प्रवचन के अंत में किए गए ध्यान से सबको बाहर लाते हुए कहा, ‘इस धरती पर बुद्ध के अंतिम शब्द थे- सम्मासति-स्मरण रखो कि तुम भी एक बुद्ध हो।’ सम्मासति। यह ओशो का अंतिम प्रवचन था, और इस धरती पर सार्वजनिक रूप से कहे गए उनके अंतिम शब्द। 19 अप्रैल से 19 जनवरी तक ठीक नौ महीने! नौ महीने गर्भ में देह बनने की तैयारी और ठीक नौ महीने की तैयारी देह के विसर्जित होने की!
इस अंतिम प्रवचन के बाद ओशो तीन महीने बाहर नहीं आए। फिर 19 जुलाई 1989 को जब वे बाहर आए तो रोज सबके साथ नाचते, दस मिनट मौन में बैठते और चले जाते। ऐसे ईवनिंग मीटिंग की शुरुआत हुई। ईवनिंग मीटिंग्स में ओशो जब आते तो जो लोग भी वहां मौजूद थे, उन्होंने देखा कि रोज उनकी देह क्षीण हो रही है। लेकिन उसी अनुपात में उनके चारों ओर एक प्रकाशपुंज फैलता जा रहा है। उनका सौंदर्य अपनी पराकाष्ठïा रोज पार कर रहा था- व्यक्ति कम, प्रकाश ज्यादा। उधर ओशो रोज संदेश भिजवा रहे थे कि हमारा उत्सव और गहन हो ताकि मौन और गहन हो सके। संगीतज्ञ भी ईवनिंग मीटिंग में संगीत कैसे बजाएं, इसके लिए भी उनके निर्देश रोज आते।
17 जनवरी 1990 को ओशो अपने नियत समय सांय 7 बजे सभागार में आए, लेकिन बैठे नहीं। आधा घंटा, खड़े हुए सबको नमस्ते करते रहे। इससे पूर्व कभी इतनी देर तक उन्होंने नमस्ते नहीं की थी। 18 जनवरी को वे बाहर नहीं आए और 19 जनवरी को उन्होंने शरीर छोड़ दिया। 16 जनवरी को ही सभागार से लौटते हुए उन्होंने मुस्कुराते हुए आनंदो से कहा था, ‘अब मेरे लोगों का मौन इतना गहरा गया है कि नये लोग आएंगे तो वे सहज ही इस मौन में डूब जाएंगे।’ बगिया तैयार थी और माली निश्चिंत।
इस जीवंत कविता के गिर्द सनसनी बनाना तो बनाने वाले की झोली का ही दुर्भाग्य कहा जायेगा। ओशो तो कालजयी हैं, उन्हें कौन मार पाएगाï?

बहुत कुछ अस्पष्ट है-स्वामी चैतन्य कीर्ति

Osho Death by Swami Chetnay
Swami Chaitanya Kirti

ओशो की मृत्यु को लेकर बात करें तो इसमें दो तरह के चिन्तन के ढंग हैं। एक तो वो जो ओशो का प्रेमी है चीजों को गहराई से समझने वाला है। वो यही कहेगा कि अस्तित्व ने जो चाहा वो हुआ। और ओशो अस्तित्व के साथ हैं। अगर किसी ने ओशो को मारा या किसी ने उनके साथ ऐसे किया तो वो अस्तित्व की मर्जी है। ऐसे अस्तित्व के तल पर जीने वाले व्यक्ति यही कहते हैं कि ‘उनकी अपनी कोई मर्जी नहीं होती कि मैं कितना शरीर में रहूं।’
ओशो ने कहा भी है इस बारे में- ‘मैं शरीर कब छोडूं न छोडूं यह अस्तित्व पर ही छोड़ा हुआ है। मैं निर्णय नहीं करने वाला हूं अस्तित्व निर्णय करेगा।’
लेकिन जो सांसारिक तल पर सोचते हैं जो ऊंची उड़ान नहीं ले पाते उनके लिए समय, शरीर छोड़ना यह सब मायने रखता है, और यह बड़ा वर्ग है जो ऐसा सोचता है। 99 प्रतिशत लोग तो कहेंगे किसी पर अन्याय नहीं होना चाहिए था किसी ने कुछ किया तो यह क्यों हुआ आदि वो प्रश्न उठाएगा।
रहा सवाल ओशो की मृत्यु को लेकर शक क्यों होता है, इसके कई कारण हैं, एक है ओशो की मृत्यु के समय को लेकर अस्पष्टïीकरण। हमें बताया गया कि ओशो की मृत्यु शाम पांच बजे हुई थी, जो कि गलत है।
ब्रिटिश नागरिक शिवम्ï सुवर्णा ने अपने एक लेख में, इस बात का जिक्र किया है जिसमें उन्होंने लिखा है कि जब वो सुबह 8-9 बजे स्कूल में झाडू लगा रही थी तब उन्हें पूना से फोन आया था कि ओशो नहीं रहे।
अब अगर इंगलैंड वालों को सुबह 9-10 बजे पता चल गया इसका मतलब भारत में तो वो 2-2:30 तक शरीर छोड़ चुके होंगे। इस तरह की चीजों से शक तो होता है। दूसरा डॉ. गोकाणी के सारे बयान भी शक पैदा करते हैं। और जो शक जाता है वो यह कि उन दिनों जो ओशो की देख-रेख करने वाले थे, उन हफ्तों में, वो सिर्फ अमृतो थे और कोई उनसे मिल भी नहीं सकता था। जयेश कभी-कभी अमृतो के माध्यम से मिलने चला जाता था। बाकी सभी दिन अमृतो ही जाता था अब वो ओशो को क्या दवा दे रहा है, क्या इलाज कर रहा है? किसी को कुछ नहीं पता था। जो कि अपने आप में रहस्य है।

ओशो की मृत्यु रहस्य तो है-मा नीलम

Osho Death by Maa Nilam
Maa Nilam

ओशो की मृत्यु एक रहस्य तो है। सच्चाई तो यह है कि हमें भी कुछ नहीं पता। जो कुछ हकीकत है वह अमृतो और जयेश को पता है। हां, ओशो की मृत्यु पर शक सभी को हुआ है। उस समय मा लक्ष्मी को भी शक हुआ था जो कि उनकी पहली सेक्रेटरी थीं। जब ओशो की मृत्यु के बारे में ओशो की माता जी को बताया तो उनका कहना भी यही था ‘कि उन्होंने मार डाला।’ जबकि वो समय ऐसा समय नहीं था, न ही हमारी मन:स्थिति ऐसी थी कि हम इस बारे में सोचें कि, सब क्यों और कैसे हुआ। तब तो बस ऐसा लग रहा था कि हम एक हो जाएं, सिमट जाएं। हमने सोचा यह वक्त अपनी ऊर्जा को बाहर बेकार करने का नहीं, संग्रहीत कर भीतर लाने का है। ओशो के विजन को फैलाने का है।
सच कहूं तो अभी भी हमें कुछ नहीं पता। धीरे-धीरे नई-नई बातें सामने आ रही थीं। कभी कोई छह महीने बाद आया तो उसने कहा कि ‘मैं तो जर्मनी में थी, और हमें तो भारत के समय के हिसाब से दोपहर तीन बजे ही पता चल गया था कि ओशो ने शरीर छोड़ दिया और आप लोग कहते है हमें पांच बजे बताया है।’

शक के कई कारण हैं-ओशो शैलेंद्र

Osho Death reason by osho shelendra
Osho Shelendra

ओशो की मृत्यु के बारे में बहुत से लोगों के मन में संदेह हैं। बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनको लेकर मन में सवाल पैदा होते हैं।
1 पहली बात, ओशो इतने कमजोर हो गए थे, इतने बीमार थे तो उनके हेल्थ के इन्वेस्टीगेशन के लिए उनको किसी हॅास्पिटल में भर्ती क्यों नहीं कराया गया? कम्यून में तो ऐसे मेडिकल चेकप की पूरी उपलब्धता संभव नहीं है। देश और विदेश में उनके काफी संन्यासी विशेषज्ञ डॅाक्टर्स भी थे। उन्हें सूचित क्यों नहीं किया गया, उन सब की राय क्यों नहीं ली गयी?
2 उनकी बीमारी की जानकारी उनकी देखभाल करने वाले एकमात्र डॅाक्टर अमृतो ही रखते थे। यह तो संभव नहीं कि वह सभी बातों के विशेषज्ञ हों। अन्य डॅाक्टरों की टीम क्यों नहीं बनायीं गयी?
3 उनकी मृत्यु के उपरांत डेथ सर्टिफिकेट, जांच-पड़ताल के बिना कैसे लिया अथवा दिया गया?

मृत्यु नहीं, स्पष्ट रूप से हत्या है-स्वामी आनंद अरुण

Osho Death Reason
Swami Anand Arun

यह स्वाभाविक मृत्यु नहीं है, स्पष्टï रूप से हत्या है। मैं पहले दिन से कह रहा हूं। मैं और मा योग लक्ष्मी ओशो के जीवनकाल में भी कह रहे थे कि भगवान हमें शक हो रहा है कि जिस प्रकार लोग आपके पास इकट्ïठे हो रहे हैं कहीं वो ही आपकी हत्या न कर दें।
अगर ओशो बीमार थे, उनकी तबियत खराब हो रही थी, 12 बजे से ही उनकी हालत सही नहीं थी, तो उन्हें अस्पताल लेकर जाना चाहिए था, एक्सपर्ट डॉक्टर को दिखाना था। पूना में इतने अच्छे अस्पताल थे, मान लीजिए अगर तबीयत ही खराब थी, उन्हें मरने के लिए नहीं छोड़ना था। लेकिन कुछ नहीं किया गया। कहा गया कि हार्टअटैक से उनकी मौत हुई, तो हार्ट पेशंट के लिए बहुत सुविधाएं मौजूद हैं। उनको कमरे में बंद करके रखा गया। 12 बजे से कह रहे थे कि मर रहे हैं तो उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए था। जब मर गए उसके बाद सारे स्टेटमेंट टाइप हैं कि किसको क्या बोलना है। ओशो के दुनिया भर में करोड़ों भक्त थे अगर चार दिन उनका शरीर वो रखते तो बहुत लोग उनके दर्शन पर पाते, पर नहीं उन्हें इतनी जल्दी थी कि उन्होंने शरीर को ज्यादा देर तक रखना मुनासिब नहीं समझा उन्हें जला दिया।
ओशो ने 1974 में पूना में अपने प्रवचन ‘एण्ड दि फ्लावर्स शॉवर्ड’ में कहा था कि ‘जब मैं मर जाऊं तो मेरे शरीर को जलाना मत क्योंकि मेरे शरीर से लाखों लोग जुड़े हुए हैं।
मेरे जाने के बाद भी बहुत बरसों तक उन्हें मेरे शरीर से ऊर्जा मिलती रहेगी, मैं उनसे जुड़ा रहूंगा। एक ऊर्जा का रिश्ता हमारे बीच रहेगा। मेरा शरीर उनके लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा, इसलिए मेरे शरीर को सुरक्षित रखना मेरे शरीर को दफनाना भी मत और जलाना भी नहीं। यह ओशो के शब्द थे।’
इस बात से भी शक पैदा होता है कि इतनी जल्दबाजी क्या थी उनके शरीर को जलाने की? क्योंकि उनको डर था कि कहीं कोई जांच न हो जाए, कोई सबूत न मिल जाए, पोस्टमार्टम न हो जाए, इसलिए शरीर छोड़ने के थोड़ी देर बाद ही उनको जला दिया।
डॉक्टर गोकाणी ने कहा भी है कि उनके शरीर पर मिट्ïटी का तेल भी डाला ताकि उनका शरीर जल्दी जल जाए। दरअसल वो सबूत को जल्दी से जल्दी मिटाना चाहते थे।

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