The invisible source of the visible world
The invisible source of the visible world

Invisible source of World: जब कभी आप किसी भौतिक वस्तु से मोहित हो जाएं, तो अपनी आंखों को बन्द करें, अन्तर में देखें, और इसके स्रोत का चिन्तन करें। आप कुछ नहीं देख पाते, और न ही कुछ अनुभव कर पाते हैं। फिर भी समस्त दृश्यमान वस्तुएं उस अदृश्य से प्रकट हुई हैं।

काश दो भागों अथवा रूपों में विभाजित है। एक तरफ सृष्टिï है तथा दूसरी ओर केवल ईश्वर हैं, सृष्टिï का पूर्णरूप से अभाव है। यही ‘अन्धकार रहित अन्धकार’ और ‘प्रकाश रहित प्रकाश’ का संसार है। गीता में भगवान कहते हैं: ‘जहां न कोई सूर्य, न चन्द्रमा और न अग्नि प्रकाशित है, वही मेरा परमधाम है…’
मानव चेतना के लिए भी यही द्वैत भाव सत्य है। आपके अस्तित्व के दो पहलू हैं- एक दृश्यमान और दूसरा अदृश्य। खुले नेत्रों से आप इसमें स्वयं को और वस्तुगत सृष्टिï को देखते हैं। बन्द नेत्रों से आप कुछ नहीं देख पाते, केवल अन्धकारमय शून्य, फिर भी आपकी चेतना, शरीर से अलग रहते हुए भी, पूर्णरूपेण सजग और क्रियाशील रहती है। यदि गहन ध्यान में आप बन्द नेत्रों के पीछे अन्धकार को भेद दें, तो आप वह प्रकाश देखेंगे जिससे सृष्टिï प्रकट होती है। गहनतर समाधि के द्वारा, आपकी अनुभूति उस प्रकाश से भी परे चली जाती है और परमानन्द चेतना में प्रवेश करती है- जो सभी रूपों से परे है, फिर भी किसी भी इन्द्रिय अथवा अतीन्द्रिय बोध से अनंतरूप से अधिक वास्तविक, प्रत्यक्ष, और आनन्ददायक होती है।

ईश्वर ने आपको अपनी चेतना में उन्हीं नियमों के संचालन का अनुपालन करने का अवसर दिया है जो सृष्टिï का संचालन करते हैं। रूप रहित चेतना की अवस्था जिसकी अनुभूति बन्द नेत्रों के साथ होती है की तुलना, ‘अन्धकार रहित अन्धकार’ और ‘प्रकाश रहित प्रकाश’ के असीम क्षेत्र के साथ की जा सकती है, जहां ईश्वर बिना रूप गुण और द्वैत के वास करते हैं, जो उनकी भौतिक सृष्टिï के विशेष लक्षण हैं। सृष्टिï के परे अनंतता के इस असीम विस्तार में, ईश्वर अकेले सत्ï-चित्ï-आनन्द की निर्गुण चेतना में रहते हैं। अनंत के उस क्षेत्र में जहां परब्रह्मï के रूप में वे शासन करते हैं, उनकी चेतना में कोई भी जगत या कोई अन्य सृष्टï वस्तु नहीं रहती। परंतु अन्तरिक्ष के दूसरी ओर वे अपने में समस्त दृष्टि की प्रत्येक वस्तु के प्रति सजग हैं।
अदृश्य में विश्व की निर्माणशाला है। आइंसटाइन ने कहा था कि अन्तरिक्ष बहुत संदेहजनक दिखाई देता है, क्योंकि प्रत्येक वस्तु उसमें से प्रकट होती है और प्रत्येक वस्तु उसी में लुप्त हो जाती है। इलेक्ट्रॉन्सï और सम्पूर्ण जगत कहां विलीन हो जाते हैं?
जब कभी आप किसी भौतिक वस्तु से मोहित हो जाएं, तो अपनी आंखों को बन्द करें, अन्तर में देखें, और इसके स्रोत का चिन्तन करें। आप कुछ नहीं देख पाते, और न ही कुछ अनुभव कर पाते हैं। फिर भी समस्त दृश्यमान वस्तुएं उस अदृश्य से प्रकट हुई हैं। ‘अन्धेरे में प्रकाश चमकता है।Ó यदि आप अंधेरे में दृष्टिï लगाए रखेंगे, तो आप उस महान प्रकाश को देखेंगे। अन्धकार के पीछे कूटस्थ चैतन्य (क्राइस्ट-चेतना) है। अन्धकार के पीछे दूसरे जीवन से भरे जगत हैं। ‘मेरे परम पिता के साम्राज्य में अनेक महल हैं।’

अन्तरिक्ष के ठीक पीछे प्रज्ञा है और आपके ठीक पीछे ईश्वर हैं। उनकी विद्यमानता के अज्ञान में अब और मत रहें। अपने ध्यान के द्वारा अन्धकार को मथ डालें। जब तक आप उन्हें पा न लें, रुकें नहीं। जानने के लिए बहुत कुछ है! अन्तर में देखने के लिए बहुत कुछ है! प्रत्येक समस्या के उत्तर आपके पास सीधे अनंत से आ जाएंगे। ध्यान के द्वारा अन्तर में, जिन सत्यों का बोध मुझे होता है, वे भौतिक नियमों के आधार को प्रकट करते हैं जिनको विज्ञान अन्य विधियों द्वारा खोज रहा है। जब मैं अपने नेत्रों को बन्द करता हूं, तो मैं अपने शरीर में बहती सूक्ष्म जीवन-शक्ति की धाराओं को देख सकता हंू।
जब आपकी आंखें बन्द होती हैं, तो उस शान्ति में जिसे आप अनुभव करते हैं, आप यह अनुभव न करें कि आप अकेले हैं। ईश्वर आपके साथ हैं। आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि वे नहीं हैं? आकाश संगीत से भरा हुआ है जिसे रेडियो पकड़ता है-अन्यथा उस संगीत के विषय में आप कुछ न जान पाते और ऐसा ही ईश्वर के साथ है। वे आपके अस्तित्व के प्रत्येक क्षण में आपके साथ हैं परंतु इसकी अनुभूति के लिए एक मात्र रास्ता है, ध्यान।