India Divine Culture: देवभूमि कहलाने वाला भारत कहां स्वर्ग कहा जाता था, अब नर्क बनता जा रहा है। दिव्यगुणधारी देवी-देवताएं इसे आभामय बनाए रखते थे। भारतवासियों की आभामय स्थिति लुप्त हो गई तो अब इसे हिन्दुस्तान, इंडिया आदि कहा जाने लगा। भारत का अर्थ ही है
कि जहां के रहवासी आध्यात्मिक आभा से प्रकाशमान हों। आत्मिक वृत्ति द्वारा परमात्म स्मृति बनाने से ही जीवन आभामय बनता है। प्रश्न उठता है कि देवी-देवताएं थे कौन?
देवभूमि भारत के सतयुगी व त्रेतायुगी नर-नारी देवी-देवता कहलाते थे। आज तो लोग उन्हें आकाश के रहवासी मानते हैं। वास्तव में पुरुषोत्तम संगम युग पर जो राजयोगी आत्माएं परमधामवासी परमात्मा की लगन में मगन होकर कार्य-व्यवहार में आती हैं अर्थात् सूक्ष्म रूप से परमपिता परमात्मा के साथ के अनुभव में खोई रहती हैं, उन्हें ही लोग द्वापर-कलियुग में ऊपर वालों के रूप में याद करते हैं। वैकु ंठनाथ कहलाने वाले श्री कृष्ण, श्री राम व उनकी वंशावलियां जब भारत में ही थी, तो देवी-देवताओं को आसमान में क्यों ढूंढा जाए? सच में हम भारतवासियों के ही पूर्वज देवी और देवता थे।
कुछ ही सदी पहले डार्विन ने लिख दिया कि मनुष्य अमीबा में मेंढक, मेंढक से बन्दर और बन्दर से वनमानुष के क्रम में विकसित हुआ है। यदि मेंढ़क से आदमी विकसित होता तो हजारों सालों के
इतिहास में कोई न कोई मेंढक से बन्दर तो बन्दर से वनमानुष बनते हुए अवश्य दिखाई देता। डार्विन का विकासवादी सिद्धांत विदेशों में गलत माना जाता है
जबकि भारत में बच्चों को प्रारभिक क्लासों मे ही पढ़ा देने से लोग जीवन भर उसे ही सच मानते हैं। जैसे महात्मा गांधी के सुकर्मों की गाथाएं, चित्र व मूर्तियां उनकी विशेषताओं को दर्शाती हैं वैसे ही देवी-देवताओं के चित्र-चरित्रों और दिव्य कर्मों की घर-घर में यादगारेें हैं। उनके पदचिन्हों का वर्णन करने में लोग गर्व और गौरव का अनुभव करते हैं। वे कोई दूसरे नहीं, हमारे ही पूर्वज थे। हम
सभी उन्हीं की वंशावली हैं। हममें आज भी देवत्य छिपा हुआ है। ज्ञान-योग से हमारे अंदर छिपा देवत्व स्वत जागृत हो रहा है। सृष्टि के उत्थान पतन की स्पष्ट जानकारी पाकर हम आत्माएं बोध स्वरूप
बन रही हैं अर्थात् दिव्यगुणधारी, सोलह कला संपूर्ण बनती जा रही हैं।

दिव्यता धरती पर बहती सतत् धारा है। यही हमारी मूल संस्कृति और सयता है। यह के गंगा-जमुना-सरस्वती, सिन्धु ब्रह्मïपुत्र तटों पर प्रस्फुटित और पल्लवित होती हुई नर्मदा, कावेरी, दजला फरात, नील, यांग, टीसी क्यांग-वोल्गा के तट पर फैली हुई थी। देवत्व दुनिया की सरजमीं पर खिले हुए सुगंधित फूल के समान था। उसकी महक संपूर्ण एशिया ही नहीं, अफ्रीका अमेरिका व ऑस्ट्रेलियातक भी व्याप्त थी अर्थात्दै वी संस्कृति सतयुग में सूर्य के समान संपूर्ण सृष्टि को आलोकित करती थी।
आज तक भी अंश रूप में कहीं न कहीं उसके अवशेष व्याप्त हैं उसकी ही सत्यता की शक्ति और प्रेम-पवित्रता दयालुता के बल पर संसार टिका हुआ है अन्यथा आज का दानवी मानव विकारों के वशीभूत हो जीव व जड़ जगत को एक साथ तहस-नहस कर डालता।
भारत के ही ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग और श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ प्राचीन राजयोग की दिव्य ज्योति कुछ न कुछ सारे संसार को प्रकाशित किए हुए है। संसार के सभी धर्मों सप्रदायों और विचारधाराओं में उसके कुछ चिन्ह अभी भी है। भौतिकता और आध्यात्मिकता का संगम आज भी भारत भूमि पर उत्कृष्ट रूप में मिलेगा। देवत्व और दिव्यगुण भारत ही नहीं, आज सारी दुनिया की परम आवश्यकता है।
श्रीकृष्ण, श्रीराम, श्रीराधा, श्रीसीता, अहिंसा के पुजारी बापू गांधी, मूल्यों की माला पहनाने वाले ब्रह्मï-सरस्वती इसी दिव्य भूमि पर पैदा हुए। आज भी भारत, संसार की सभी विचारधारोओं को
समान देता हुआ राजयोग से देव पद पाने का संदेश ब्रह्मïकुमारीज के माध्यम से दे रहा है। हमारी मौलिक संस्कृति जाति-धर्मों के कट्टरवाद पर नहीं टिकी है। यह तो रंग-रूप, भेद-भाव, राग-द्वेष
से ऊपर उठकर विश्व बन्धुत्व का पाठ पढ़ाती है। यहां के आध्यात्मिक ज्ञान में सभी धर्मों का मूल समाया है। सर्व शास्त्रमयी शिरोमणि गीता का ही सत्य राज फिर से बताकर अब परमपिता सर्व
को मुक्ति, जीवन-मुक्ति का सर्वश्रेष्ठ ईश्वरीय जन्म सिद्ध अधिकार दे रहे हैं। पवित्रता-सुखशांति आनन्द का दिव्य पाठ पढ़ा रहे हैं। सत्यम्, शिव सुन्दरम द्वारा सिखाए राजयोग से ही राज पद प्राप्त होगा। हमारी प्राचीनतम संस्कृति की मधुर मिठास अवर्णनीय है। भारतीय दिव्यता खूंटे में बंधी विचारधारा नहीं है। यह तो ऐसे महासागर की तरह है जो सभी सयताओं को अपने में समा सके।
यहां का सच्चा गीता ज्ञान माता की तरह पालना देता तो परमपिता शिव की मीठी मीठी यादें परम संरक्षण का अनुभव कराती हैं। यहां देश, प्रान्त, जाति, धर्म का टकराव नहीं पर धरती सभी की माता
है और सभी उसी के पुत्र हैं। देव संस्कृति पूरी दरा के लिए थी। इसी सत्य धर्म से सभी पीर-पैगबर, फकीर मसीहा, सन्त-महन्त और परिव्राजक पैदा हुए हैं। द्वापर-कलियुग में भटकती
मानवता को सन्मार्ग पर लाने के लिए धर्म गुरुओं ने उपदेश दिए। उनके अनुभवों और विचारों ने ही कालान्तर में धर्म ग्रन्थो का रूप धारण कर लिया।
सच्चे गीता ज्ञान में सभी धर्मों की कुछ कुछ भावनाएं और अच्छाइयां समाई हुई हैं। लौकिक वेद, कुरान, बाइबिल, धमपद, गुरु ग्रंथ साहिब आदि में भी उसी सार तत्त्व का विश्लेषण है। हिन्दू मुस्लिम, यहूदी-ईसाई-पारसी, बौद्ध, जैन आदि सभी धर्म शाखाएं हैं तो आदि सनातन देवी-देवता धर्म उनका मूल तना है। सभी धर्मों शास्त्रों काव्यों का सार सुनाकर ब्रह्मï कुमारीज द्वारा स्वयं शिव भगवान सृष्टि का नव सृजन पुन कर रहे हैं। जहां एक धर्म, एक राज्य, एक भाषा और सभी की एक ही
संस्कृति होगी। निकट भविष्य में आने वाले सतयुग-त्रेता मे पूरी धरा पर अमन चैन की बंशी बजेगी। किसी को भी दुख, शोक-रोग नहीं होगा। सब में भाईचारा और आत्मीय सत्य संबंध होगा। उसी भारत को वैकुंठ या स्वर्णिम संसार कहा जाएगा।
