Summary: मोबाइल के जादू से बाहर निकालिए बच्चों को — छोटे कदम जो बड़ा फर्क लाएँगे
मोबाइल और टैबलेट के ज़रिए बच्चे मनोरंजन तो पा रहे हैं, लेकिन उनकी रचनात्मकता और सामाजिक जुड़ाव घट रहा है। इस लेख में जानिए कैसे पैरेंट्स बच्चों को धीरे-धीरे स्क्रीन से दूर कर असली दुनिया के रंगों से जोड़ सकते हैं।
Reduce Kids Screen Time: आज का बचपन टैबलेट, स्मार्टफोन और टीवी के दायरे में सिमटता जा रहा है। स्कूल की ऑनलाइन क्लास से लेकर कार्टून, गेम्स और सोशल मीडिया तक, हर चीज़ स्क्रीन पर ही उपलब्ध है। शुरू में यह आसान लगता है बच्चे व्यस्त रहते हैं, शांति रहती है लेकिन धीरे-धीरे यह आदत उनके व्यवहार, नींद और रचनात्मकता पर असर डालने लगती है। कई बच्चे बाहर खेलने से झिझकते हैं, उन्हें किताबों या दोस्तों के साथ वक्त बिताना “बोरिंग” लगने लगता है।
खेल की कमी, कल्पना की कमी
स्क्रीन का जादू बच्चों की कल्पनाशक्ति को सीमित कर देता है। जब हर कहानी, हर रंग और हर मूवमेंट स्क्रीन तय कर देती है, तो बच्चों के दिमाग में खुद से कुछ बनाने की चाह कम हो जाती है। मिट्टी में खेलने, चीज़ों को जोड़ने या घर के सामान से नई चीज़ें बनाने जैसी गतिविधियाँ उनके दिमाग को एक्टिव रखती हैं, लेकिन आज के डिजिटल माहौल में ये गतिविधियाँ पीछे छूट रही हैं। बच्चे “देखने” में ज़्यादा और “करने” में कम समय बिताने लगे हैं।
स्क्रीन से नहीं, संवाद से जोड़ें

बच्चों की स्क्रीन हैबिट्स पर कंट्रोल सिर्फ़ टाइम लिमिट से नहीं आता, बल्कि उस समय को अर्थपूर्ण बनाने से आता है। माता-पिता अगर बच्चों से बात करें कि वे क्या देख रहे हैं, क्या सीख रहे हैं — तो बच्चा समझता है कि उसका अनुभव साझा करने लायक है। इसी तरह, जब पैरेंट खुद स्क्रीन से थोड़ा दूर होकर बच्चों के साथ खेलें चाहे बोर्ड गेम, ड्रॉइंग या कहानी सुनाना तो वह “रिप्लेसमेंट” नहीं, बल्कि “कनेक्शन” बन जाता है। बच्चे तब स्क्रीन से दूरी को कमी नहीं, एक रिश्ते की गर्माहट के रूप में महसूस करते हैं।
असली खेल की ताकत
फिजिकल एक्टिविटीज़ जैसे साइकिल चलाना, पार्क में दौड़ना या क्रिकेट-बैडमिंटन खेलना बच्चों के शरीर और दिमाग दोनों को एक्टिव रखती हैं। खेलों से वे टीमवर्क, हार-जीत का सम्मान, धैर्य और रिस्क लेना सीखते हैं। इसके अलावा, नेचर से जुड़ना जैसे गार्डनिंग करना या बारिश में कागज़ की नाव चलाना बच्चों में संवेदनशीलता और कृतज्ञता की भावना जगाता है। ये अनुभव किसी भी वीडियो या गेम से ज़्यादा गहरे और यादगार होते हैं।
स्क्रीन से धीरे-धीरे दूरी बनाना

स्क्रीन को अचानक बंद कर देना बच्चों के लिए झटका हो सकता है। इसलिए इसे धीरे-धीरे और सकारात्मक तरीके से कम करना ज़रूरी है। शुरुआत करें “नो स्क्रीन ज़ोन” बनाकर जैसे डाइनिंग टेबल या बेडरूम में फोन, टीवी या टैबलेट ना रखें। “फैमिली गेम नाइट” या “स्टोरी टाइम” जैसी नई आदतें जोड़ें ताकि स्क्रीन टाइम की जगह क्वालिटी टाइम ले सके। अगर बच्चा किसी खास शो या गेम से जुड़ा है, तो उसके बारे में बात करें और तय करें कि उसे कब और कितनी देर देखना है। इससे बच्चा खुद अपनी सीमाएँ पहचानना सीखता है।
जिज्ञासा को फिर से जगाइए
हर बच्चा स्वाभाविक रूप से जिज्ञासु होता है बस जरूरत है उसे दोबारा जगाने की। बच्चे को किसी चीज़ के “क्यों” और “कैसे” पूछने दें, भले ही आपके पास जवाब न हो। साथ में रिसर्च करें, घर में छोटे-छोटे साइंस एक्सपेरिमेंट करें, या किसी नई कला को सीखें। बच्चे को विकल्प दें जैसे किताब पढ़ना, संगीत सुनना, या कुछ बनाना ताकि वह खुद डिसाइड करे कि स्क्रीन के अलावा भी दुनिया कितनी रोचक है।

स्क्रीन से दूरी सिर्फ़ नियंत्रण की बात नहीं है, यह उस बचपन को लौटाने की कोशिश है जो हाथों से मिट्टी गूंथता था, जो सवाल पूछता था और जो दुनिया को देखकर हैरान होता था। अगर हम पैरेंट्स यह तय कर लें कि बच्चों की जिज्ञासा, रचनात्मकता और खेल की आज़ादी को फिर से प्राथमिकता देनी है, तो स्क्रीन टाइम अपने आप बैकग्राउंड में चला जाएगा। आखिरकार, बच्चों को दुनिया देखने की सबसे सुंदर स्क्रीन हमेशा उनकी अपनी आँखें होती हैं।
