googlenews
दीयों के निर्माण का मुख्यालय है-कुंभारवाडा: Kumbharwada for diya
Kumbharwada for diya

Kumbharwada for diya: दीये निर्माण की यह अद्भुत कला सदियों पुरानी है। देश के विभिन्न राज्यों में आपको कुम्हारों की विभिन्न जातियां मिल जाएंगी, जो इस परंपरा को बचाए हुए हैं। ऐसे ही एक जगह है ‘कुंभारवाडा।Ó कुंभारवाडा को दियों का मुख्यालय भी कहा जाता है, क्यों कहा जाता है? आइए जानते हैं लेख से विस्तारपूर्वक।

भारत के अन्य प्रांतों की तरह महाराष्ट्र में भी कुंभार समाज का बहुत महत्त्व है। इस समाज के लोगों का मुख्य व्यवसाय मिट्टी के बर्तन बनाने का है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में भी कुंभार समाज के लोगों की संख्या अच्छी खासी है। जिस जगह इस समाज के लोग रहते हैं, उसे कुंभारवाडा कहा जाता है। इसी कुंभारवाडा में कुंभार प्रकाश पर्व पर जगमगाने वाले दीयों का निर्माण होता है, इसलिए अगर कुंभारवाडा को दीयों के निर्माण का मुख्यालय कहा जाए, तो इसमें कुछ गलत नहीं होगा। मराठी भाषा में बर्तन के लिए भांडे शब्द का प्रयोग किया जाता है। वैदिक भगवान प्रजापति के नाम का उपयोग करते हुए हिन्दू कुम्हारों का एक वर्ग खुद को प्रजापति कहता है। कहते हैं कि भगवान प्रजापति ने ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना की थी।

कुम्हारों के कई समूह हैं, जैसे कि गुजराती कुम्हार, राणा कुम्हार, लाद, तेलंगी इत्यादि। यह विभिन्न नाम भाषा या सांस्कृतिक क्षेत्रों पर आधारित नाम है और इन सभी को सम्मिलित रूप से कुंभार जाति कहा जाता है। कुम्हार मिट्टी के बर्तन एवं खिलौना बनाने वाली एक जाति होती है जो भारत के सभी प्रांतों में पाई जाती है। इस जाति के लोगों का विश्वास है कि उनके आदि पुरुष महर्षि अगस्त्य हैं। यह भी समझा जाता है कि यंत्रों में कुम्हार के चाक का सबसे पहले आविष्कार हुआ। लोगों ने सबसे पहले चाक घुमाकर मिट्टी के बर्तन बनाने का आविष्कार किया। इस प्रकार कुम्हार अपने को आदि यंत्र कला का प्रवर्तक कहते हैं, जिसके कारण अनेक स्थान के कुम्हार अपने को प्रजापति कहते हैं। कुंभारवाडा के लोगों की जीवनशैली को देखकर यह पता चलता है कि कम जगह का ज्यादा से ज्यादा उपयोग कैसे किया जा सकता है। कुंभारवाडा में पांच गलियां हैं। हर गली में लगभग 20 भट्टियां हैं। इस हिसाब से पूरे कुंभारवाडा में 100 भट्टियां हैं, जिनमें चाक पर बने दीयों को पकाया जाता है। भट्टियों के आसपास बच्चों को खेलते, महिलाओं को घर का काम करते हुए देखकर यह लगता है कि हम किसी गांव में आ गए हैं।

दीयों के निर्माण का मुख्यालय है-कुंभारवाडा:  Kumbharwada for diya
Kumbharwada for diya

कुंभार समाज महाराष्ट्र की बात करें तो इस राज्य में मुंबई के अलावा सतारा, कोल्हापुर, सांगली, सोलापुर तथा पुणे क्षेत्रों में कुंभारवाडी है, जहां वर्षभर इस समाज के लोग मिट्टी के दीये बनाते हैं। वे आपस में मराठी भाषा बोलते हैं परन्तु बाहरी लोगों से मराठी और हिन्दी दोनों भाषाओं में बात करते हैं। कुम्हार हिन्दू वर्ण व्यवस्था में विश्वास करते हैं और खुद को शूद्र वर्ण में मानते हैं। कुंभारवाडा में रहने वाले लोग मुंबई के धारावी क्षेत्र में रहते हैं। कुंभार समाज के लोग अपनी कला का उपयोग करके अपनी जीविका सदियों से चला रहे हैं। कुंभारवाडा में आदिशक्ति मां जगदंबे की विशेष आराधना के पर्व पर पूजा के उपयोग में आने वाले कलश का निर्माण भी होता है।
दीपावली का पर्व जैसे ही आंखों के सामने आता है, मिट्टी के दीयों की याद आ जाती है। मुंबई के धारावी में हजारों ऐसे कुंभार परिवार हैं, जो दीपावली में जगमगाने वाले दीये बनाते हैं। दीपावली के दो माह पहले से ही हर घर के हर हाथ में बस एक ही काम होता है और वह होता है दीये बनाना। गुजरात राज्य से वर्षों पहले महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में आकर अपनी जीविका चलाने वाले कुंभार समाज के लोगों द्वारा हाथों से बनाए जाने वाले दीये दीपावली के दिन राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन जाते हैं। कुंभारवाडा में दीये बनाने का काम 100 भट्टियों में किया जाता है। गुजरात के बेरावल से धारावी में आकर दीये बनाने का काम करने वाले लोगों का कहना है कि ‘हम लोगों को इस बात की बड़ी प्रसन्नता है कि अपना राज्य छोड़ने के बाद भी हमारी कला आज भी जीवित है। इस क्षेत्र में रहने वाले हरिभाई वाडेल ने बताया कि ‘मैंने अपने पिता नारायण वाडेल से दीये बनाने की कला सीखी है। वाडेल ने बताया कि मैं पिछले 42 वर्षों से मिट्टी के दीये बना रहा हूं।Ó हरिभाई वाडेल ने बताया कि ‘मैं और मेरा पूरा परिवार दीये बनाने का काम कर रहे हैं। मैं शुरुआत में केवल सादे दीये बनाता था लेकिन बदलते दौर में मांग के अनुरूप जिस तरह के दीये की जरूरत थी, उसे पूरा किया गया। कुंभारवाडा में बनाये जाने वाले दीयों के उपयोग में लायी जाने वाली मिट्टी पनवेल से लायी जाती है।
दीये बनाने के लिए पहले मिट्टी को अच्छी तरह से तैयार किया जाता है। पनवेल से मिट्टी लाकर उसे सीधे भट्टी में नहीं डाला जाता। इस मिट्टी में धान सा भूसा, कपड़ों की कतरन मिलाकर उसे तैयार किया जाता है। यह मिट्टी बहुत मंहगी होती है। हरी भाई बताते हैं कि ‘उन्होंने 12 वर्ष की आयु में पहली बार मिट्टी की भट्टी में दीये बनाना सीखा था और उसके बाद फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। प्रति कुंतल 8 हजार रूपए के भाव से मिलने वाली मिट्टी के अलग-अलग आकार प्रकार के दीये बनाए जाते हैं। पांच दीयों वाले दीये को पंचवटी कहा जाता है। इसके अलावा कई डिजाइन के दीये धारावी में बनाए जाते हैं। 2 रूपए, से लेकर 3000 रूपए के दीये के खरीददार भी अलग-अलग होते हैं।
धारावी में रहने वाली हीराबेन ने बताया कि ‘साल दर साल काम तो बढ़ रहा है लेकिन वर्षों पुरानी परंपरा को जीवित रखना बड़ा मुश्किल हो रहा है। कुंभारवाडा में बनने वाले दीयों के मुंबई का हर घर जगमगा उठता है। लेकिन इस कार्य से जुड़े लोगों का कहना है कि उनके हाथ जिस काम को करने में जुटे हैं, वह कार्य बहुत अच्छा है, लेकिन उसे बचाने के लिए सभी को आगे आना होगा। आज की पीढ़ी के युवकों, युवतियों में मिट्टी की कला को विकसित करने में रूचि नहीं है, बावजूद इसके यहां के मिट्टी के बर्तन, कलश तथा दीये बनाने वाले पेशेवर करीगरों को इस बात का पूरा भरोसा है कि हर दौर में यह कला जीवित रहेगी। दीपावली के मौके पर पूरी मुंबई में सजने वाले दीये हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी सजेंगे।
हर राज्य में अलग-अलग नाम उत्तर प्रदेश में कुम्हारों की उपजाति कनौजिया, हथेलिया, सुवारिया, बर्धिया, गदहिया, कस्तूर और चौहानी हैं। इन उपजातियों के नामकरण के संबंध में स्पष्ट रूप से कुछ भी ज्ञात नहीं है किंतु जो कुम्हार बैलों पर मिट्टी लाद कर लाते हैं वे बर्धिया और जो गधों पर लाते हैं, वे गदहिया कहलाते हैं। इसी प्रकार बंगाल में इनकी उपजातियों की संख्या बीस के लगभग हैं, जिनमें बड़भागिया और छोटभागिया मुख्य हैं, बड़भागिया काले रंग के और छोट भागिया लाल रंग के बर्तन बनाते हैं। इसी प्रकार दक्षिण भारत में भी कुम्हारों में अनेक भेद हैं। कर्नाटक के कुम्हार अपने को अन्य प्रदेशों के कुम्हारों से श्रेष्ठ मानते हैं।

Leave a comment