बच्चों को खाना खिलाने के लिए ये गलतियां न करें
आदतें पेरेंट्स बिगाड़ रहे हैं और फिर डॉक्टरों से पूछते हैं कि मेरा बच्चा खाता क्यों नहीं है?
Eating Habits: आपने अपने बड़े-बुजुर्गों को हमेशा ये कहते हुए सुना होगा कि उन्हें अपने बच्चों के खाने पीने से जुड़ी कोई परेशानी नहीं हुई। उनके सभी बच्चे अपने-अपने हिसाब से सेहतमंद हैं। वाकई यह सोचने में आता है कि दादा-दादी ने आज के पेरेंट्स की तुलना में, बच्चों के खानपान से जुड़ी कम समस्याओं का सामना किया था। इसके पीछे दो कारण है। पहला कारण है कि पहले के समय में टीवी, वीडियो गेम और मोबाइल जैसे मनोरंजन के इतने साधन नहीं थे।
पहले की पीढ़ी के बच्चों के लिए मनोरंजन के लिए शारीरिक गतिविधियां ही थीं। इससे उन्हें अच्छी भूख लगती थी और सेहत भी ठीक रहती थी। वहीं इसका दूसरा कारण पेरेंट्स से जुड़ा है। पहले मां को कई बच्चे संभालने पड़ते थे और घर के ढेर सापे काम निपटाने पड़ते थे। संयुक्त परिवार था तो हर बच्चे पर व्यक्तिगत ध्यान नहीं दे सकती थी। आज के समय में घर के कामकाज को लेकर कई तरह की सुविधा है और बच्चे भी कम होने से पूरा ध्यान उन पर दे पाती हैं। कामकाजी मां भी ज़्यादा समय और दुलार देती है और वह प्यार निकलता है बच्चों के भोजन के रूप में।

आज की माँ बच्चों के खानपान से जुड़ी कई गलतियां कर देती हैं, जिससे बच्चों की खानपान को लेकर आदत बिगड़ती जा रही है। आदतें पेरेंट्स बिगाड़ रहे हैं और फिर डॉक्टरों से पूछते हैं कि मेरा बच्चा खाता क्यों नहीं है?
टीवी, मोबाइल दिखाते हुए खिलाना
माँ टीवी पर नज़रें गड़ाएं बैठे बच्चो के मुंह में कौर देती रहती है। बच्चा दो-चार कौर खाकर आनाकानी करता है। टीवी और मोबाइल देखकर भी थोड़ा बहुत खा लेता है, तो इसमें खुश होने जैसा कुछ नहीं है। आपने उसका ध्यान भटका कर उसे भोजन का निवाला दिया है और इस तरह से उसके खानपान की गलत आदत विकसित हो रही है। अगर आपको सही खानपान की आदत डालनी है, तो वह इस गलती को सुधारें और भूख लगने पर ही उन्हें खिलाएं। अगर आप भूख लगने से पहले ही खाना लेकर उन्हें टीवी, मोबाइल दिखाकर खिलाने लगेंगी तो ऐसा ही होगा।

लालच देना बंद करें
अगर इनमें से कोई भी बात आप अपने बच्चे को कह रही हैं, तो आज ही बोलना बंद कर दें। ये आपके लिए भी मुश्किल है, लेकिन लालच देकर आप बच्चों के लिए परेशानी खड़ी कर रही है। ये सब अगर कह रह हैं ‘अच्छा रो मत, जो कहेगा दिला दूंगी’, थोड़ा और खा लो, थोड़ा और खा लो..बस एक चम्मच-तुम्हें खाना ही पड़ेगा-प्लीज़ खा लो’, ‘अच्छा अभी ये खाना खा लो, फिर चॉकलेट दिला दूँगी’। ये सब बोलना बंद करें।

बच्चे को रोता हुआ न देख पाना
पेरेंट्स अति उत्सुकता में बच्चे के 2-3 घंटे भूखे रहने पर ही चिंतित हो जाते हैं। बच्चे की रोनी सूरत बनती ही मुंह में दूध की बोतल लगा देते हैं। लेकिन यह पेरेंट्स नहीं समझते हैं कि अपने शरीर की मांगों के हिसाब से चलने की प्रक्रिया में बच्चे कई बार घंटों तक दूध नहीं पीते हैं। उस समय उन्हें जबरन दूध पीना बिलकुल नहीं भाता है। अगर आपका जी मचलाए और कोई जबरन मुंह में मिठाई ठूँसे तो शायद आप भी वही महसूस करेंगे।

तिल का ताड़ तो नहीं बना रहे हैं आप?
आपको यह समझना होगा कि दूसरी बातों की तरह खानपान भी एक आदत है। बच्चा अपने शरीर की मांग और ज़रूरत के हिसाब से ही खाता है, लेकिन पेरेंट्स इसे तिल का ताड़ बना देते हैं। पेरेंट्स के बच्चों को हमेशा कुछ खिलाने की प्रवृत्ति उनके लिए दुखदायी हो सकती है। यहीं से भोजन के प्रति उनकी नापसंदगी शुरू होती है।

बार-बार दोहराना – कुछ खाता ही नहीं है
अगर आप एक झूठ हजार बार बोलेंगे तो सच लगने लगेगा। जी हाँ, बच्चे के साथ भी ऐसा ही है। उसके बारे में सोचकर बोलें। वह वही बनेगा, जो आप उसके बारे में कहेंगे, वह नहीं जो आप उसे बनाना चाहते हैं। अगर आप उसके सामने बार-बार दोहराएंगे कि मेरा बच्चा कुछ खाता ही नहीं है, तो इस नकारात्मक दोहराव को आप पक्का कर देते हैं। उसके सामने वहीं कहें और तारीफ करें जो आप चाहते हैं कि वह करे। वह शिकायत को हकीकत मानने लगता है। अपने खानपान की क्षमता के बारे में नेगेटिव सेल्फ इमेज क्रिएट होने लगेगी। इससे उसे भूख लगनी बंद हो जाएगी और पाचन क्षमता घट जाएगी।
