Overview: रहमत, मगफिरत और निजात रमजान के ये 3 अशरे क्या हैं? जानें
रमजान का पाक महीना भारत में 19 फरवरी से शुरू हो चुका है। यह महीना रहमत, मगफिरत और निजात के तीन अशरों में बंटा है, जिनका इस्लाम में खास महत्व है।
Ramadan 2026 Ashra: इस्लाम धर्म में रमजान का महीना बेहद पाक और बरकत वाला माना जाता है। हर मुसलमान के लिए रमजान के 29 से 30 दिन खास होते हैं, जिसमें रोजा रखना अनिवार्य होता है। यह महीना रोजा, नमाज, दुआ, इबादत, जकात आदि के जरिए आत्मिक शुद्धि और अल्लाह की रहमत पाने का महत्वपूर्ण समय होता है। साल 2026 में रमजान की शुरुआत खाड़ी देशों जैसे सऊदी अरब में 18 फरवरी जबकि भारत में 19 फरवरी 2026 से हो चुकी है। उम्मीद है कि, भारत में 19 या 20 मार्च 2026 को ईद-उल-फितर मनाई जाए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि, रमजान के 30 दिनों का रोजा 10-10 दिनों में तीन अशरों में बंटा है। ये तीन अशरा हैं- रहमत, मगफिरत और निजात। इस्लाम में हर अशरे का विशेष आध्यात्मिक महत्व भी बताया गया है।
पहला अशरा (रहमत)

रमजान के शुरुआती दस दिन वाले रोज रहमत के माने जाते हैं। रमजान के पहले 10 दिन दया और बरकत का समय होता है। इस दौरान मुसलमान अल्लाह की दया और बरकत पाने के लिए अधिक से अधिक समय इबादत में बिताते हैं। माना जाता है कि इन दिनों में यदि नेक नीयत काम किया जाए तो उसका सवाब कई गुना बढ़ जाता है। पहले अशरे में रोजेदार नमाज, कुरान की तिलावत, दान-पुण्य और जरूरतमंदों की मदद पर जैसे खास कामों पर जो देते हैं।
दूसरा अशरा (मगफिरत)
रमजान महीने के 11 से 20 दिनों के समय को मगफित यानी माफी का समय माना जाता है। दूसरा अशरा मगफिरत यानी गुनाहों की माफी के होते हैं। इस दौरान मुसलमान अल्लाह से अपने पिछले गुनाहों के लिए माफी मांगते हैं और गुनाहों से तौबा करते हैं। इस्लामी मान्यता के अनुसार, सच्चे दिल से माफी मांगने पर अल्लाह इंसान के गुनाह माफ कर देता है। इन दिनों में रोजेदार खास दुआएं पढ़ते हैं, ज्यादा नमाज अदा करते हैं और आत्मचिंतन में समय बिताते हैं। माना जाता है कि यह समय इंसान को अपनी गलतियों को सुधारने और बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
तीसरा अशरा: निजात (जहन्नुम से मुक्ति)

रमजान का आखिरी और तीसरा अशरा निजात यानी जहन्नुम से छुटकारे का माना जाता है। यह 21वें रोजे से शुरू होकर आखिरी रोजे तक का होता है। यह रमजान का सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है, जिसमें शबे कद्र जैसी पवित्र रातें भी आती हैं। इस्लाम में इन रातों को हजार महीनों से बेहतर बताया गया है। इस अशरे में इबादत, दुआ और जकात (दान) का महत्व बढ़ जाता है।
रोजेदारों के लिए रोजे का धार्मिक महत्व

इस्लामिक परंपरा के अनुसार पैगंबर मोहम्मद साहब ने रमजान को केवल भूखा रहना नहीं बल्कि सब्र, त्याग और इंसानियत का महीना भी बताया है। इसलिए कहा जाता है कि, रोजा केवल भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि बुरी आदतों से तौबा करने, गलत विचारों पर संयम रखने और दूसरों की मदद करने का संदेश देता है। रमजान में रोजा रखने से आत्मसंयम बढ़ता है, जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशीलता आती है और आध्यात्मिक उन्नति होती है। यही कारण है कि रोजा को इस्लाम के पांच स्तंभों में एक माना जाता है।
