Hindi Kahani: दरवाजे पर कोई लगातार आवाज दे रहा था। थोड़ी देर सुन कर भी अनसुना करती रही थी प्रिया। उसे लग रहा था कोई ना कोई नीचे आवाज सुनकर दरवाजा खोल ही देगा।
जब प्रिया से रहा न गया तो वो हाथ में वायपर लिए हुए ही बॉलकनी में आकर देखने लगी कि नीचे कौन है? देखा तो सब्जी वाला और दूध वाला दोनों खड़े थे।
प्रिया उस समय घर की साफ सफाई कर रही थी। संयुक्त परिवार में रहने के जहां फायदे होते हैं वहां तकलीफें भी कम नहीं होती। थोड़ी देर पहले ही तो वो नीचे किचन का काम खत्म कर ऊपर अपना बैडरूम और बच्चों के कमरे की सफाई करने आई थी। उसने झांक कर देखा आंगन में उसकी सास अकेले कुर्सी पर बैठी हुई थी। वो उठकर दरवाजा खोल नहीं पाती। वो अपने पैर और शरीर से लाचार जो थीं।
भाग्य श्री निवास की मालकिन भाग्यश्री जी जिनसे पूरे परिवार के साथ साथ गली मोहल्ले वाले भी खौफ खाते थे। वो कब किस पर क्यों बरस जाएं यह कोई जान नही पाता था। शरीर में फुर्ती तो गजब हुआ करती थी कुछ साल पहले तक। पर पिछले चार-पांच साल से धीरे धीरे उनका शरीर कमजोर होता गया और बिमारियों ने उनके शरीर में डेरा बसा लिया। बिमारियों को उनकी डांट डपट ताने उल्हाने का कोई डर नहीं था । वो अपने डर धीरे कब परिवार के सभी सदस्यों के मन से हटता गया ये तो वो भी ना जाने सकीं। अब तो उल्टा ही है उन्हें ही परिवार वालों से डर कर रहना पड़ता है। उनके ही घर से कब उन्हें निकाल कर वृद्धाश्रम या किसी सरकारी अस्पताल में हमेशा के लिए छोड़ आएं उसकी अपनी ही संतानें।
प्रिया ने हाथ में पकड़ा वायपर एक तरह रखा और साड़ी का पल्लू ठीक कर नीचे गेट खोलने आ गई।
“बहु रानी कब से आवाज लगा रहे थे। कोई गेट खोलने आया ही नहीं। अब आपके घर में पहले वाली बात ही नहीं रही।पहले तो एक बार से दूसरी बार गेट खटखटाते हुए भी डर लगता था।” दूध वाले ने कहा तो प्रिया ने हाथ जोड़ लिए।
“माफ कीजिएगा काका।”
प्रिया ने सब्जी वाले से सब्जी और दूध वाले से दूध लेकर दोनों को विदा किया और गेट बंद कर दिया। वो सामान रखने किचन में जा ही रही थी कि तभी उसकी सास ने इधर उधर देखते हुए उसे इशारे से अपने पास बुलाया।
“जी मां जी कैसी है अब आपकी तबियत ?”
“क्या बताऊं कनिया? रात में कई बार उलटी हुई और इस जोड़ो के दर्द से पूरी रात नींद भी नहीं आई। इन लोगों ने मेरी सारी दवाई बंद कर दी है। बिना दवा दिए ये मुझे मार डालना चाहते हैं।” उनकी आवाज में दर्द भरा हुआ था।
“मां आपने सुबह गैस की और बीपी की दवा ले ली थी।”
“नहीं कहां ली कोई दवा। कोई ला ही नहीं देते। कितने दिनों से सबको बोल रहीं हूं पर अब कोई मेरी सुनता ही कहां है।मेरी सारी दवाई तेरी जेठानी ने छुपा ली। कहती है अब आपको दवाओं की कोई जरूरत नहीं है। आपकी दवा पर फिजूल के पैसे बर्बाद करने को नहीं हैं। मेरे ही बेटे को मेरे खिलाफ भड़काती रहती है। तेरे ससुर जी के जाने के बाद मैंने अकेले ही कैसे बच्चों को पाला पोसा पढ़ाया लिखाया। अच्छी नौकरी मिली तो शादी करवाई और अब उनकी पत्नियां मेरा जीना हराम करके रख दिया है।”
“मां आपने पहले क्यों नहीं बताया मैं इनसे कहती तो यह ला देते या मैं खुद ही ला देती।”
“बड़का ने मेरे छोटका को भी तो धमका कर रखा है। मां के लिए कोई दवाई नहीं लाना डॉक्टर ने मना किया है। अब मुझे नारियल पानी भी तो नहीं लाकर देते। कहते हैं केरल और
कई राज्यों में नारियल पानी बूढ़े लोगों को इसलिए पिलाते हैं जिससे वो जल्दी मर जाएं। फिर मुझे क्यों नहीं लाकर देते अंगर ये लोग मुझसे छुटकारा ही पाना चाहते हैं। तुमको तो पता है ना तुम तो पढ़ी लिखी हो। मुझे डॉक्टर ने ही कहा था ना कि मां जी आपको सोडियम की कमी हो जाती है बार बार इसलिए रोज एक गिलास नारियल पानी जरूर पीना है।” भाग्य श्री ने प्रिया के हाथ पकड़ कर रोते हुए कहा।
अब वो बोलते वक्त अक्सर रोने लगीं थीं।
प्रिया को समझ ही नहीं आ रहा था कि वो क्या बोले। बहुत रुलाया था उन्होंने उसकी जेठानियों को और उसे भी। अब वही बहुएं गिन गिन कर बदला ले रहीं हैं बस प्रिया पुरानी सारी बातें भूलकर अपनी सास की बात सुनती थी उनकी सेवा करती थीं तो वो भी उसकी जेठानियों को फूटी आंख ना सुहाता था।
“सुन ना कनिया तू ही मेरे लिए दवा और नारियल पानी ला देगी। गला बहुत सूख रहा है। बार बार उलटी होने से शरीर में पानी की कमी हो गई है। बड़ी कमजोरी लग रही है।”
“मां जी आपने पहले क्यों नहीं बताया। मैं अभी ला देती हूं। पहले आपके लिए खिचड़ी बना देती हूं।”
“अरे! क्या बताती तुमको। तुम तो खुद ही अपने काम में व्यस्त रहती हो। दिन भर घर का काम करके थक जाती होगी। अब तो मैं घर के किसी काम में मदद भी नहीं कर पाती हूं। ऐसे में रात को भी तुमको तंग करूं ये सही तो नहीं। फिर तेरी जेठानी मुझे तुझसे बात करता देख तुझसे भी बेमतलब का लड़ेगी। देख मुझे कैसा धक्का दिया था कुछ दिन पहले। अभी तक सिर में चोट है और हाथ भी सूज गया है।”
प्रिया को अपनी सास की तकलीफ़ देखकर बहुत दुख हो रहा था। तभी उसकी नज़र अपने दाएं हाथ पर गई जिसमें सालों पहले गर्म तेल डलने से जो फफोले हुए उसका दाग अभी भी था। वो दिन उसकी आंखों में घूम गया। घर में मेहमान आए थे और वो पूरियां तल रही थी। सासूमां ने बाकी दोनों बहुओं और अपनी बेटियों को रसोईघर में आने और प्रिया की मदद करने से मना कर दिया था।
एक साथ खाने की टेबल पर छह लोग बैठे थे और पूरी बेलने तलने का काम अकेले प्रिया ही कर रही थी। सबको गर्म गर्म फूली फूली पूरी चाहिए थी। प्रिया मशीन की तरह अपने हाथ चला रही थी फिर भी इतनी जल्दी नहीं बन पा रहीं थीं पूरियां जितनी जल्दी सबकी थालियां खाली हो रही थी।
भाग्यश्री सबके सामने प्रिया पर चिल्लाते हुए किचन में आ
गई।
“जल्दी जल्दी हाथ चला। हाथों में मेंहदी लगा रखी है या टूट गए हैं तेरे हाथ।” गुस्से में आग बबूला होते हुए भाग्यश्री ने उसके हाथ पर गर्म तेल डाल दिया था और बाल खींचते हुए उसे वहां से जाने को कहा।
“तू भी जा और अपनी जेठानियों की तरह आराम फरमा। मैं अकेले ही किचन का सारा काम निपटा लूंगी।”
हाथों की जलन से छटपटाती हुई प्रिया अपने कमरे में आकर बहुत देर तक रोती रही थी।
पति ने जब पूछा तो उसने अपनी ही ग़लती बताई कि पूरी तलते वक्त गलती से उसके हाथ पर गर्म तेल गिर गया। उसने उनकी मां का नाम नहीं लिया।
दवाओं से जलन और घाव तो समय के साथ ठीक हो गए पर निशान बांकी रह गए। जो अभी भी पुरानी यादों के साथ ताजा हो जाते हैं।
प्रिया देख रही थी कि उसकी सास की आंखों से आंसू अभी भी गिर रहे हैं और कुछ बूंदें उसके हाथों पर भी पड़ रहीं हैं।सालों बाद उसकी आंसूओं की कीमत भाग्य श्री को अपने आंसुओं के साथ देनी पड़ रही थी।
प्रिया सोच रही थी कि उसके पिता ठीक ही कहते थे कर्मा लौटकर आता है । उसकी सास ने जो अपने स्वभाव से बुरे कर्म किए थे उसी कारण तो उसकी आज यह स्थिति हो गई थी। तीन बेटे बहूओं और दो बेटियों के होते हुए भी वो हर चीज के लिए तरसती थीं। कोई उनके पास दो मिनट बैठकर उनका सुख दुख साझा करने के लिए तैयार नहीं था।
उनकी बेटियां अपने ससुराल में खुश थीं। कभी कभार आतीं भी तो मां से ज्यादा समय अपनी भाभियों के पास ही बितातीं। जानती थीं कि मां तो सिर्फ अपनी बहुओं की बुराईयों का पिटारा खोल कर बैठ जाएंगी।
प्रिया की नजर अपनी बड़ी जेठानी पर पड़ी जो काफी देर से उसे घूरे जा रही थी। उसकी दोनों जेठानियों को यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि वो सास की सेवा करें उनसे बात करे।
“जा बहू सामान रख आ रसोई में। तेरा हाथ दुखने लगा होगा।”
इसी हाथ को कई बार मोड़ा था उन्होंने और आज उन्हें अपनी बहू की चिंता सता रही थी।
“जी मां जी। मैं बस थोड़ी देर में आपकी दवाईयां ला दूंगी।”
प्रिया रसोई में आई तो दोनों जेठानी उस पर बरस पड़ीं।
“भूल गई तू सब कुछ… कितनी तकलीफ़ दी है उन्होंने हम तीनों को। हम दोनों से ज्यादा तो तेरे साथ बुरा व्यवहार किया था। फिर भी तू मांजी की सेवा करती है।”
“दीदी उन्हें उनके कर्मों की सजा मिल रही है। आज वो तकलीफ में हैं तो अपने कर्मों की वजह से ही। ऐसे में उनको कष्ट देकर और उनके साथ वैसा ही व्यवहार करके हम अपने कर्म क्यों बुरे करें?”
“हम तो नहीं भूल सकते उनके अत्याचार को तू पता नहीं कैसे भूल जाती है।” बड़ी जेठानी बोली तो मझली भी उसकी हां में हां मिलाई।
“दीदी आप बिल्कुल ठीक कह रही हो। हमसे तो ना होगा अब उनकी सेवा करना। जैसा उन्होंने हमारे साथ किया हम तो खुश हैं उनको तकलीफ में देखकर।”
” मंझली दीदी ये आप क्या बोल रहीं हैं? आज हम अपनी सास के साथ जैसा व्यवहार करेंगे वैसा ही तो हमारी बहुएं भी हमारे साथ करेंगी तो हम क्या करेंगे?
मांजी की सास ने उनके साथ बुरा व्यवहार किया तो उन्होंने उसका बदला हमारे साथ लिया। इस चेन को तोड़ना होगा। हम अपनी बहुओं को बेटी की तरह रखेंगे तो वो हमें अपनी मां जैसा मानेंगी।”
“प्रिया तुम्हारी बात बिल्कुल सही है। हम बेकार में उनसे बदला ले रहें हैं।”
“हां दीदी ऊपर वाला सब देखता है। जो जैसा करेगा उसे वैसा ही फल मिलेगा। अच्छा तो दीदी आप मां के लिए खिचड़ी चढ़ा दीजिए मैं जल्दी से काम पूरा करके मांजी की दवाई ले आती हूं।”
प्रिया की बात उसकी दोनों जेठानियों को भी समझ आ गई थीं। वो दोनों अपना कर्मा सुधारने की कोशिश में लग गईं और ठान लिया कि अब वो अपनी सास के साथ बुरा व्यवहार नहीं करेंगी।
