ब्रह्मांड में स्थित नवग्रहों का जातक पर जीवन भर निरंतर प्रभाव पड़ता रहता है। जन्म समय के ग्रहों की अवस्था के अनुसार प्रत्येक जातक को सुख या दु:ख मिलता है। यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में अशुभ ग्रह की स्थिति हो, अशुभ ग्रहों की दशा-अंतर्दशा चल रही हो, तो निम्नलिखित विधि अनुसार उन ग्रहों की शांति और सुख-समृद्धि हेतु उपाय करने से कल्याण होगा।

मंत्र, तीर्थ, देवता, दैवज्ञ, औषधि और गुरु के प्रति मन में जैसी भावना होती है, वैसा ही फल मिलता है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं ‘शास्त्र सृचन्तिं पुनि पुनि देखीअ’ शास्त्र क्या है? शासनादि इति शास्त्रम् अर्थात् मानव जीवन को अनुशासित करने वाली विद्या, आदेश, व्यवस्था, निर्देश, सिद्धांत, क्रमवर्धमान ज्ञान अथवा विज्ञान, धार्मिक ग्रंथ आदि को शास्त्र कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र भी शास्त्रों का अभिन्न अंग है। मंत्र, तंत्र, रत्न, ग्रह-शांति, दान, औषधि, व्रत और स्नान से ग्रहों के शुभ प्रभाव में वृद्धि और अशुभ प्रभाव से छुटकारा पाने के मुख्य उपाय हैं। इनमें मंत्र, तंत्र, यंत्र और रत्न की महिमा और उनके प्रभाव को सर्वोपरि माना गया है।

ग्रह शांति ग्रहों के दुष्प्रभाव और दुर्भाग्य से मुक्ति के लिए ग्रहों की शांति कराई जाती है। ग्रह शांति जातक स्वयं कर सकता है अथवा किसी योग्य पंडित से करवा सकता है।

नवग्रह मंत्रम्

‘ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतोबुधश्च।

गुरुश्च शुक्र: शनिराहु केतव: सर्वे ग्रहा: शान्तकारा भवन्तु॥’

सूर्य-यह अग्नि तत्त्व है। सब ग्रहों का स्वामी होने से यह प्रशासक और बल है, जो दिशाओं में भ्रमण के कारण वातावरण में परिवर्तन करता है। यह वन और औषधि का कारक है।

चंद्रमा-यह जल तत्त्व है और खाद्य पदार्थ, फसलों, औषधि और वनस्पति का कारक है। यह शांत ग्रह है।

मंगल-यह अग्नि तत्त्व है। यह सेनापति, बल, शास्त्रास्त्र से संबंध रखता है। रक्त का कारक होने से यह दुर्घटनाएं भी देता है। युद्ध और यातायात भी यही देता है।

बुध-युवराज होने से क्षेत्र के बच्चों, खेल, व्यापार, वायु प्रदूषण, वस्तु विनिमय का प्रतिनिधित्व करता है। 

बृहस्पति-यह आकाश तत्त्व है। शिक्षक, समुदाय, पुरोहित वर्ग, राजस्व, बैंक आदि का कारक है।

शुक्र-यह जल तत्त्व है तथा महिलाओं का प्रतिनिधित्व करता है। नैतिकता, स्नेह व सौंदर्य आदि देता है।

शनि-यह वायु तत्त्व है तथा मजदूर वर्ग और निम्न जाति का प्रतिनिधित्व करता है। खनिज और कृषि उत्पादन एवं नगर निगम आदि संस्थाओं का कारक है। सड़ांध उत्पन्न करने से कृषि जन्य संक्रामक रोग भी इसी के कारण होते हैं। मजदूरों द्वारा उद्योगों से कमाने वाले उद्योगपति और गृह त्याग तथा कष्ट सहन के कारण संन्यासी और विरक्त भी इसी ग्रह से बनते हैं।

राहुछाया ग्रह होने से यह पाप ग्रह माना जाता है। अत: यह पृथकतावादी ग्रह है। यह एकदम हानि, लाभ, दुर्घटना आदि का कारक बनता है। पशु हानि में इसका योग रहता है।

केतु-यह राहु का ही प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन राहु से हमेशा सप्तम रहने के कारण उसका विपरीत फल भी देता है। यह पताका है, जिसका तात्पर्य है फल को अंतिम छोर तक पहुंचाना।

धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों में ग्रहों की शांति

दान-मनुष्य को उसके जन्म-जन्मांतर के अर्जित कर्मों के अनुसार अच्छे या बुरे फल मिलते हैं। अशुभ कर्मों के प्रायश्चित और शुभ कर्मों के पुण्य को बढ़ाने के लिए संबंद्ध ग्रहों के अनुरूप दान का विधान है। दान से ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मुक्ति मिलती है। कहा गया है कि दान से हाथ का सौंदर्य बढ़ता है और दान से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है।

रत्न-रत्न प्राचीन काल से ही धारण किए जाते रहे हैं। रत्न ग्रहों के अशुभ प्रभाव को कम कर उनके शुभ प्रभाव में वृद्धि कर देते हैं। शुद्ध और उपयुक्त रत्न धारण करने से दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदला जा सकता है। इसलिए रत्न किसी विद्वान ज्योतिष की सलाह लेकर ही धारण करना चाहिए। अलग-अलग ग्रहों के अलग-अलग रत्न होते हैं। जैसे सूर्य का माणिक्य, चंद्र का मोती, मंगल का मूंगा, गुरु का पुखराज, शनि का नीलम, शुक्र का हीरा, बुध का पन्ना, राहु का गोमेद और केतु का लहसुनिया। रत्न धारण के साथ-साथ स्तोत्रों का पाठ करने से विशेष लाभ मिलता है।

अथ नवग्रह शांति स्तोत्र

जगद्गुरुं नमस्कृत्यं, श्रुवा सद्गुरुभाषितम्।

ग्रहशांति प्रवचयामि, लोकानां सुखहेतवे॥

जिनेन्द्रा, खेचरा ज्ञेया, पूजनीया विधिक्रमात्।

पुष्पे-विर्लेपनै-धूर्पे-नैवेद्यै-स्तुष्टि हेतवे॥

पद्मप्रभस्य मार्तण्ड-श्चन्द्रश्चन्द्रप्रभस्य च।

वासुपूज्यस्य भूपुत्रो, बुधश्चाष्टजिनेशिनाम्॥

विमलानन्त धर्मेश, शांति कुन्थवरह नमि।

वर्द्धमानजिनेन्द्राणां, पादपद्मं बुधो नमेत्॥

ऋषभाजितसुपार्श्वा शाभिनन्दनशीतलौ।

सुमति सम्भवस्वामी, क्षेयांसेषु बृहस्पति॥

सुविधि कथित शुक्रे, सुव्रतश्च शनैश्चरे।

नेमिनाथो कथित शुक्रे, सुव्रतश्च शनैश्चरे।

जन्मलग्नं च राशि च, यदि पीड़यन्ति खेचरा:।

तदा संपूजयेद धीमान्-खेचरान सह तान तिनान्॥

आदित्य सोम मंगल, बुध गुरु शुक्रे शनि।

राहुकेतु मेरवाग्रे या, जिनपूजाविधायक:॥

जिनान नमोग्नतयो हि, ग्रहाणां तुष्टिहेतवे।

नमस्कारशतं भवत्या, जपेदष्टोतरं शतं॥

भद्रबाहुगुरुर्वाग्मी, पंचम: श्रुतकेवली।

विद्याप्रसाद पूर्ण ग्रहशांतिविधि: कृता॥

य: पठेत प्रातरूत्थाय, शुचिर्भूत्वा समाहित:।

विपत्तितो भवेच्छांति: क्षेमं तस्य पदे पदे॥

स्नान-हमारे देश में अनेक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान हैं जैसे प्रयाग, पुरी, काशी, हरिद्वार, गया, मथुरा, उज्जैन, रामेश्वरम आदि। पावन तीर्थ स्थान को स्वर्ग का प्रवेश द्वार कहा जाता है। महाकुंभ, अर्द्धकुंभ आदि मेलों में पावन तीर्थ स्थलों में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। यमुना नदी में स्नान करने से यमराज से भेंट नहीं होती। माघ सप्तमी में कोणार्क सागर में डुबकी मारने से लाखों जन्मों के पाप नष्ट होते हैं। गंगा नदी तो पापनाशिनी है ही। तीर्थ स्थानों पर औषधि युक्त जल से स्नान करने पर चमत्कारी फल मिलते हैं। ग्रहों के दुष्प्रभाव से बचने के लिए निर्दिष्ट औषधियों से स्नान करना चाहिए। पवित्र नदियों में स्नान कर मंदिरों में देवी-देवता के दर्शन करने से जातक को तत्काल फल प्राप्त होता है।

व्रत-जब लोग ग्रहों के अशुभ प्रभाव से पीड़ित होते हैं तो किसी ज्योतिषी के पास जाकर उससे मुक्ति का उपाय पूछते हैं। उनके लिए एकमात्र उपाय व्रत है। सोमवार को चंद्र का व्रत, मंगलवार को मंगल का, बुधवार को बुध का, गुरुवार को गुरु का, शुक्रवार को शुक्र का, शनिवार को शनि का और रविवार को सूर्य का व्रत रखने का विधान है। 

रंग-रंगों का हमारे जीवन पर गहरा असर पड़ता है। रंग का सही चयन व्यक्ति को लक्ष्य की ओर प्रेरित कर उसके कष्टों का निवारण करता है। वास्तुशास्त्र में रंग की विस्तृत मीमांसा है। वास्तु शास्त्री ग्रहों के अनुकूल रंगों का चयन करते हैं। सफेद रंग से मन की चंचलता समाप्त होती है और चंद्र के कुप्रभाव का शमन हो जाता है। लाल रंग सौभाग्य का प्रतीक है और मंगल ग्रह को अनुकूल बनाने में सहायक होता है। ग्रहों के अपने-अपने रंग होते हैं जैसे शुक्र का नीला, शनि का काला या आसमानी, बृहस्पति का पीला, बुध का गहरा पीला आदि। नारंगी रंग आर्थिक उन्नति प्रदान करता है। प्रत्येक रंग का अपना-अपना प्रभाव होता है। मुगल सम्राट अकबर के बारे में कहा जाता है कि वह सप्ताह के सातों दिन ग्रहों के रंग के अनुसार परिधान पहनता था।

मंत्र-मंत्रों में देवता वास करते हैं। मंत्र से व्यक्ति सुप्त या लुप्त शक्ति को जागृत कर महनीय और अलौकिक शक्तियों के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकता है। प्रतिकार एवं ग्रह शांति के लिए मंत्रों, दोहों, चौपाइयों, स्तोत्रों, कवच आदि का प्रयोग किया जा सकता है। मंत्र शुद्ध न बोल पाने वालों को मंत्र का फल कम मिलता है। अत: भाव ठीक होना चाहिए। लेकिन मंत्र का जप सटीक नहीं होने पर उसका उचित फल नहीं मिल पाता। मंत्र साधना में गलती होने पर कभी-कभी उल्टा असर भी पड़ता है। शास्त्रों में वर्णन आता है कि यदि जप मंदिर में, नदी अथवा समुद्र के तट पर या पर्वत पर किया जाए तो उत्तम होता है। किंतु गुरु के चरणों में बैठकर किया जाने वाला जप सर्वाधिक फलदायी होता है। मंत्र कष्टों से छुटकारा दिलाता है। 

यंत्र-ग्रहों की शांति, मनोकामनाओं की पूर्ति तथा सफलता की प्राप्ति में यंत्रों की भूमिका अहम होती है। वैदिक धर्मशास्त्रों के अतिरिक्त जैन शास्त्रों में भी यंत्रों का विशद उल्लेख मिलता है। यंत्रों की निष्ठापूर्वक पूजा-साधना से साधक का जीवन सुखमय होता है और प्रतिकूल परिस्थितियां भी अनुकूल हो जाती हैं। यंत्र कई प्रकार के होते हैं जैसे रोगनाशक यंत्र, श्री यंत्र, मंगल यंत्र, गणेश यंत्र, सरस्वती यंत्र, बाधा मुक्ति यंत्र, महामृत्युंजय यंत्र, संतान गोपाल यंत्र आदि। 

तंत्र-तंत्र भगवान शिव द्वारा रचित विज्ञान है। तंत्र का उपयोग आत्मज्ञान और आत्मरक्षा, ग्रहों के कुप्रभाव को दूर करने और जीवन को सुचारू रूप से चलाने हेतु करना चाहिए। तंत्र वह क्रिया है, जिसके द्वारा जीवन को सुव्यस्थित किया जा सकता है। तंत्र का विधान इस्लाम, बौद्ध और जैन धर्मों में भी है, किंतु इन धर्मों में उपयोग किए जाने वाले मंत्र अलग-अलग हैं। तंत्र के लिए दृढ़ निश्चय, आत्मविश्वास, गुरु कृपा और शिव भक्ति आवश्यक है। गुरु कृपा के बिना तंत्र सिद्ध नहीं हो सकता। जिस शास्त्र के पठन और अनुसरण से ज्ञान की वृद्धि होती है उसे तंत्र कहते हैं। ग्रहों के अनिष्ट फल से मुक्ति हेतु किसी योग्य पंडित या कर्मकाण्डी से अनुष्ठान कराना चाहिए। हमारे देश में अनेक तांत्रिक पीठ हैं जैसे असम का कामाख्या मंदिर, बंगाल का तारा पीठ, उड़ीसा का विमला मंदिर आदि। इन स्थानों पर तंत्र साधना करने से ग्रहों का अशुभ प्रभाव दूर हो जाता है। ग्रह दोष, पितृ दोष या पूर्व जन्मकृत दोष से मुक्ति हेतु की जाने वाली तंत्र साधना के लिए ग्रहण का समय सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है। चाहे मंत्र से संबंधित प्रयोग हों या तंत्र से संबंधित क्रियाएं, ‘ग्रहण काल’ में की गई साधना से सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है। मनोकामना की पूर्ति के लिए तांत्रिक वस्तुओं जैसे एकाक्षी नारियल, दक्षिणावर्ती शंख, श्वेेतार्क गणपति आदि का उपयोग किया जा सकता है। इनके अतिरिक्त आरोमा तेल, ग्रहों के तेल, चक्र के तेल (जिससे शरीर के सात चक्रों को संतुलित किया जाता है) आदि का उपयोग कर ग्रहों के दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है। 

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