एक महात्मा जी के विषय को मैंने सुना वह माइयों की ओर देखते नहीं। बोले-ब्रह्मचारी जी हैं। आंख बन्द करके कथा करते हैं, क्योंकि आंख खोलेंगे तो सामने औरतें भी बैठी होंगी तो…। वह औरत को नहीं देखना चाहिए, ऐसा उनका संकल्प है। नाम नहीं लूंगी मैं, महात्मा का। इलाके का नाम ले लिया समझने वाले सब समझेंगे। मुझे किसी ने बताया। मैंने कहा-बहुत अच्छी बात है। एक महीना कथा हुई। एक महीने की कथा के बाद यह बाल ब्रह्मचारी जी महाराज भी गायब और उस मन्दिर के एक भक्त की पत्नी भी गायब।
नामदेव जी कहते आंख बंद मत कर दुनिया को देख कर। देख दुनिया को, पर हृदय में विचार करके। श्रीकृष्ण ने ‘मुर’ नामी एक राक्षस का उद्धार किया था। तो नाम इनका मुरारी पड़ा था। हर अन्त:करण में अहंकार रूपी मुर है। हर दिल में अज्ञान रूपी मुर है। इस राक्षस को जो मार देवे वही मुरारी। तो कौन मारेगा? बोले, सद्गुरु का ज्ञान मारेगा। इसलिए सद्गुरु का दिया ज्ञान भी मुरारी ही हुआ फिर। और देने वाला भी मुरारी हुआ फिर। और सुनने वाला समझ ले तो फिर वह भी मुरारी है। जिसने मुर नामी राक्षस का संहार किया, उद्धार किया उस कृष्ण का नाम पड़ा मुरारी। और नाम मुरारी जन्म से नहीं है कृष्ण महाराज का। कब पड़ा? जब उन्होंने इस मुर नामी राक्षस को मारा तब मुरारी। मुर की हत्या करने वाला। मुर का अरि। अरि मायने दुश्मन। मुर का अरि-मुरारी।
ऐसे ही मेरे दिल में जो अज्ञान, अहंकार, राग, द्वेष इत्यादि मुर है, राक्षस हैं इनका अरि कौन होगा? इनका दुश्मन कौन होगा? संत से सुना ज्ञान। ज्ञान को ठीक से श्रवण कर लिया तो तुम्हारे मन में बैठे इन राक्षसों की हत्या की जाएगी तो फिर संत भी कौन हो गया? मुरारी। क्योंकि तुम्हारे अन्दर वाले मुर को उसने मारा। अच्छा, संत ही मुरारी नहीं। जिस शिष्य ने अपने अन्दर के इस अहंकार रूपी मुर को मार दिया और जहां अहंकार रूपी मुर मरा वहां अन्तर्रात्मा परमात्मा की एकता समझ लगी। दो से एक हो गए तो भक्त भी भगवान हो गया तो भक्त का भी नाम क्या हो गया फिर? मुरारी!
नामदेव कहते हैं- मैं जहां देखता हूं, वहीं मुझे मुरारी ही नजर आता है।
सब गोबिंद है, सब गोबिंद है गोबिंद बिन नहीं कोई।
एक अनेक व्यापक पूरक जित देख्यो तत सोई।
बाबा नामदेव के आज के इस भजन को, आज के दिए इस साखी को बाद में भी गुनगुनाना। समझने की चेष्टï करना। दुनिया न बदलने की कोशिश करना। दुनिया को आज तक कोई नहीं बदल सका और तो और कृष्ण महाराज, दुर्योधन का मन नहीं बदल सके। बदल सके क्या? एक दुर्योधन का मन बदल जाता तो कुरुक्षेत्र का युद्ध न होता। तो दुनिया को क्या बदलेगा कोई? बदल सको तो अपने मन को बदलो। बदल सको तो अपने दृष्टि को बदल लो। तो ‘जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि’
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