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Sun in Astrology: सूर्य ग्रह और ज्योतिष
Importance of Sun in Astrology

Sun in Astrology: जितने भी ग्रह-नक्षत्र, करण, योग, राशियां, आदित्य, गण, वसुगण, रुद्र, अश्विनी, कुमार, वायु, अग्नि, शुक्र, प्रजापति, समस्त, भूर्भुव, स्व, आदि लोक, संपूर्ण, नग, पर्वत, नाग, नदियां, समुद्र तथा समस्त भूतों का समुदाय है, इन सभी के हेतु दिवाकर ही हैं। ज्योतिष शास्त्र में इसे ‘कालपुरुष की आत्मा एवं नवग्रहों में ‘सम्राट कहा गया हैं। जन्मांक में सूर्य द्वारा जातक की आरोग्यता, राज्य पद, जीवन-शक्ति, कर्म, अधिकार, महत्त्वाकांक्षा, सामर्थ्य, वैभव, यश, स्पष्टता, उग्रता, उत्तेजना, सिर, उदर, अस्ति एवं शरीर रचना, नेत्र, सिर, पिता तथा आत्म ज्ञान आदि का विचार किया जाता है। जातक का दिन में जन्म सूर्य द्वारा पिता का तथा रात्रि में जन्म सूर्य द्वारा चाचा एवं दाए नैत्र का कारक कहा गया हैं। यात्रा प्रभाव व उपासना आदि के विचार में भी सूर्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। कुछ ज्योतिर्विद सूर्य को उग्र व क्रूर होने के कारण पापग्रह भी मानते हैं। किन्तु कालपुरुष की आत्मा एवं सर्वग्रहों में प्रधान होने के कारण ऐसा मानना तर्कसंगत नहीं हैं।

ज्योतिष में सूर्य का महत्त्व

नवग्रहों में सर्वप्रथम ग्रह सूर्य हैं जिसे पिता के भाव कर्म का स्वामी माना गया है। ग्रह देवता के साथ साथ सृष्टि के जीवनयापन में सूर्य का महत्त्वपूर्ण योगदान होने से इनकी मान्यता पूरे विश्व में हैं। नेत्र सिर, दांत, नाक, कान, रक्तचाप, अस्थिरोग, नाखून, हृदय पर सूर्य का प्रभाव होता हैं। ये तकलीफें व्यक्ति को सूर्य के अनिष्टकारी होने के साथ-साथ तब भी होती हैं जब सूर्य जन्मपत्रिका में प्रथम, द्वितीय, पंचम, सप्तम या अष्टम भाव पर विराजमान रहता है तब व्यक्ति को इसकी शांति उपाय से सूर्य चिकित्सा करनी चाहिये। जिन्हें संतान नहीं होती उन्हें सूर्य साधना से लाभ होता है। पिता-पुत्र के संबंधों में विशेष लाभ के लिए सूर्य साधना पुत्र को करनी चाहिए। यदि कोई सूर्य का जाप मंत्र पाठ प्रति रविवार को 11 बार कर ले तो व्यक्ति यशस्वी होता है। प्रत्येक कार्य में उसे सफलता मिलती है।
सूर्य की पूजा-उपासना यदि सूर्य के नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा एवं कृतिका में की जाये तो बहुत लाभ होता है। सूर्य के इन नक्षत्रों में ही सूर्य के लिए दान-पुण्य करना चाहिए। संक्रांति का दिन सूर्य साधना के लिए सूर्य की प्रसन्नता में दान-पुण्य देने के लिए सर्वोत्तम है। गीता में स्वयं भगवान
श्रीकृष्ण ने उत्तरायण के सूर्य को मोक्षदाता बताया है। इसी कारण महाभारत के युद्ध में अर्जुन के बाणों से घायल भीष्म पितामह ने कई दिनों तक शरशैया की पीड़ा सहन करते हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की और जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करके उत्तरायण हो गए, तभी भीष्म ने अपने प्राण त्यागे। वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान और दक्षिणायन को पितृयान कहा जाता था। मान्यता है कि इस दिन पुण्य आत्माएं ही स्वर्ग में प्रवेश करती हैं इसलिए यह आलोक का पर्व है।

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