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Benefits meditation: ध्यान क्या है? इसे क्यो और कैसे करे ?
Benefits meditation

Benefits Meditation: भागदौड़ भरी जीवनशैली ने लोगों को इतना व्यस्त कर दिया है कि उन्हें स्वयं का ख्याल नहीं है कि मैं कौन हूं? मेरा उद्देश्य क्या है? मैं इस धरती पर किसलिये आया? मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? इन अनेक प्रश्नों का समाधान अपने अंदर ही खोजना और स्वयं को पहचानना ही ध्यान है। मन को साधने की सरल-सहज एवं वैज्ञानिक विधि है ध्यान। परमपिता परमात्मा से अपनी आत्मा का संबंध जोड़ने का साधन है ध्यान। एक बार महात्मा बुद्ध से किसी ने पूछा कि आपकी समाधि लगी और आपने समाधि का आनन्द भी लिया तो बताइए आपने क्या पाया। तब भगवान बुद्ध कहते हैं कि पाया कुछ नहीं और खोया बहुत है। उस व्यक्ति ने पूछा महाराज जी! ध्यान में आप अपना क्या खो बैठे हैं? महात्मा बुद्ध ने कहा- जो भी मेरा फालतूपन था वह सब मैंने गवां दिया। ध्यान में अन्दर जाते ही जो मेरे अन्दर का फालतू कचरा था, वह सब छीन लिया गया और जो शुद्धता है वह बची रह गई।

इसलिए जब भी आप ध्यान की गहराई में उतरेंगे आप अपने ही अन्दर प्रवेश कर जाएंगे तो फिर वहां आप ही आप होंगे। जो फालतूपन है वह सब छंट जाएगा और आपका जो कीमती रूप है, वही शेष रह जाएगा। आप निखर आएंगे। बुद्धि के अन्दर वाला जो कचरा है, वह खत्म हो जाएगा। जब क्रूरता छीन ली जाती है तो सौम्यता, सुन्दरता जीवन में अपने आप प्रकट हो जाती है। मूर्खता छीन ली जाए तो बुद्धिमत्ता अपने आप प्रकट हो जाती है। दुख छीन लिया जाए तो सुख आपके सामने आ जाते हैं। निर्बलता छीन ली जाए तो सबलता की शक्ति अपने आप आ जाती है। इसी तरह से ध्यान से अशुद्धता
छिनती है और शुद्धता आती है। ध्यान, नींद जैसी एक सरल एवं स्वाभाविक घटना है जो अपने आप घटती है। जैसे नींद कैसे ली जाती है यह किसी को सिखाया नहीं जाता है। नींद के लिए बस आराम से बिस्तर पर शिथिल होकर आपको लेटना है और मस्तिष्क को खाली कर लेना है। जब तक मस्तिष्क में कोई भी बात सोचेंगे तो नींद नहीं आएगी। जैसे ही सोचना बंद होगा, नींद आ जाएगी। नींद एक घटना की तरह घटती है, जैसे एकाएक आंख के ऊपर जादू का दिया गया हो। आपके मस्तिष्क में धुआं सा छा जाता है। नींद में जाने के लिये नींद की तरफ से ध्यान हटा लेना, बस शांत होते जाना और विचार शून्य होते जाना, मन का दबाव हटाते जाना, नींद अपने आप आ जाएगी।

आप सो रहे हैं और आपकी आत्मा ने स्वप्न देखा और उस स्वप्न की याद भी बची रह गई। परंतु जिस समय आप ध्यान में होते हैं, उस समय बस आपको इतनी याद रहती है कि हम शांति में थे, आनन्द
की अनुभूति में थे बाकी कुछ भी याद नहीं रहेगा। जैसे ही आप अपने आप में खो जाएंगे, आपका ध्यान टिक जाएगा। अन्दर केवल शांति की अनुभूति होगी। जैसे ही आप ध्यान की गहराई में उतरते हैं वैसे ही अन्दर की अतृप्त इच्छाएं जो कुछ हैं उनकी तृप्ति हो जाती है। ध्यान में इच्छाओं की तृप्ति इस तरह से होती है कि मान लीजिए अगर किसी आदमी को कुछ सुन्दर देखने की इच्छा है तो उसकी यह इच्छा जैसे भगवान का सौन्दर्य या संसार के किसी पदार्थ के सौन्दर्य के रूप में सामने आता है। ऐसा महसूस होता है कि बहुत सुन्दर फूल खिले हुए हैं। सौन्दर्य से भरपूर फूल, इंद्रधनुषी रंग, चमकता हुआ चांद और सूरज बहुत सारे सितारे तरह-तरह की रंग बिरंगी तितलियां आदि सुन्दर दृश्य एकदम सामने आएंगे।

यह दृश्य ऐसे मनमोहक लगेंगे कि जैसे संसार में पहले आपने ऐसा कहीं नहीं देखा होगा और मन यही कहेगा कि परमात्मा तेरी महिमा, तेरी लीला देख रहा हूं। तू कितना सुन्दर है, तेरा संसार कितना
सुन्दर है। किसी को यदि सुगंध लेने की इच्छा है तो उसे तरह-तरह की सुगंध महसूस होने लगेगी। और उस समय जैसे किसी को लगता है कि अब मैं चिन्तामुक्त हो गया हूं तो उसे वैसे ही अनुभूतियां
महसूस होंगी। किसी को यह महसूस होगा कि उसे संसार के सारे स्वादिष्टï पदार्थ जो आज तक नहीं खा पाए थे उपलब्ध हो गए हैं। वहां जिह्वा को स्वाद की अनुभूति होगी। किसी को भोग वासनाओं की तृप्ति महसूस होती है। इसके बाद की अनुभूतियों में यह सारी चीजें खो जाती हैं। अन्दर एक ऐसी
असीम शान्ति महसूस होती है कि जिसके आनन्द में डूबा हुआ इंसान हिलना भी नहीं चाहता। ध्यान में साधक की वही स्थिति होती है जिस प्रकार कोई बहुत स्वादिष्ट चीज मुख में आ जाए तो आदमी मुख बंद कर लेता है, बहुत सुन्दर मन पसंद चीज मिल जाए तो आदमी आंखें बन्द करके उसे अन्दर ही अन्दर महसूस करता है, मानो परम सुख की उपलब्धि मिल गई। यह परम सुख और आनंद की अनुभूति ही ध्यान है।

क्यों करें ध्यान?

अंधेरे में इतना खो गया है कि उसका दिन का चैन और रात की नींद गायब हो गई है। लोगों के जीवन में सुख के साधन तो बहुत है लेकिन मन में शांति नहीं है। आज व्यक्ति तन से कम मन से ज्यादा बीमार है। लोगों के जीवन में आधी से अधिक बिमारियां मन की होती हैं। इसलिए कहा जाता है कि मन ठीक तो तन ठीक। मन को ठीक रखने के लिये ध्यान मनुष्य के लिये अति उपयोगी है। मन का सन्तुलन बना है तो व्यक्ति के जीवन में सन्तुलन कायम है। मन शक्तिशाली है तो दुनिया की हर चीज अच्छी लगेगी, नहीं तो सुख के साधन भी खुशियां नहीं देते। मन सन्तुष्टï न हो तो अमीरी में रहते हुए भी भिखमंगों जैसा हाल बना रहता है। मन में किसी के प्रति कोई बात बैठ जाए तो सामने वाला ठीक भी हो तो भी उसके प्रति मन में आशंका आएगी। मन अशान्त, भयभीत रहने लग जाए तो मानसिक बिमारियां इतनी शुरू हो जाती हैं जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। मनुष्य का स्वभाव सरल, सहज, पवित्र, निर्मल, ईमानदार, शालीन एवं प्रसन्न रहना है। प्रकृति ने उसे शान्ति, प्रेमपूर्ण और निर्मल वृत्तियां दी हैं, किन्तु क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, मोह और लालच आदि बुरी वृत्तियों से उसका स्वभाव प्रभावित होता है और वह अशान्त हो जाता है। इस दौड़ती-भागती जिंदगी में आज हर व्यक्ति बेवजह हताश-निराश और तनावयुक्त है। यदि आप चाहते हैं कि जीवन में आशा-उत्साह का संचार हो
और तनाव से मुक्ति मिले तो ध्यान करें।

Benefits meditation: ध्यान क्या है? इसे क्यो और कैसे करे ?
Why meditate?

कैसे करें ध्यान?

ध्यान करने के लिये सबसे पहले अपने मन को तैयार करें। प्रात:काल उठकर परम ऊर्जा, परम शक्ति, सर्वोच्च सत्ता का ध्यान करने से पूर्व प्राणायाम अवश्य करें, प्राणायाम करने से मन एकाग्र होता है। प्रथम नाड़ीशोधन प्राणायाम करें, फिर भस्त्रिका प्राणायाम करें, फिर कपालभाति प्राणायाम करें, अनुलोम विलोम प्राणायाम भी अवश्य करें, अपने श्वासों को सबल बनाएं, आन्तरिक निर्मलता के लिए प्राणायाम बहुत आवश्यक माने गए हैं, प्राणायाम निरन्तर करने से जवानी शक्ति बढ़ती है।
शरीर की तन्त्रिकाओं का शोधन करें, शरीर की विद्युत शक्ति ठीक करें, ऑक्सीजन की मात्रा शरीर में उचित होनी चाहिए। रक्त संचार ठीक तरह से होना चाहिए। हार्मोन्स ठीक से काम कर रहे हों। दायां-बायां और लघु मस्तिष्क सक्रिय हो जाएं। स्वर सम भाव में हो, ध्यान करते समय स्थान की पवित्रता का ध्यान रखें, हवा आती-जाती हो, आसन स्वच्छ हो, ध्यान में उतरते समय कुछ घटनाएं जो प्रत्यक्ष सामने होती हैं, उनसे घबराना नहीं चाहिए। एकाएक कई बार प्रकम्पन शुरू हो जाता है, कभी-कभी रंगीन नजारे सामने आते हैं, कभी आपको लगेगा कि आप प्रकाश में उड़ रहे हैं। इन सब दृश्यों को आप देखते रहिए और निरन्तरता बनाए रखिए, नियमित ध्यान करते रहिए। ध्यान में एक लंबे अभ्यास के बाद आपको तेजपुंज का दर्शन होगा, प्रकाशपुंज दिखाई देगा, वहां से ऊर्जा प्राप्त कीजिए। ऐसा महसूस कीजिए कि आप ऊर्जावान हो रहे हैं, ऊर्जा आपके अंदर प्रवेश कर रही है, आपके अन्दर दिव्यता आ रही है, आप शक्तियों के स्वामी बन रहे हैं। आप अब सहनशील हो गए हैं, आप अब निर्णय लेने वाले बन रहे हैं, अब आप मान-अपमान की स्थिति में ऊपर उठने लगे हैं। आपके अन्दर अद्ïभुत
शान्ति आ रही है, आप आनन्दमग्न हो रहे हैं, अब प्रेमपूर्ण हो रहे हैं, आप आत्म दर्शन की ओर बढ़ रहे हैं।

ध्यान की विधि और सावधानियां

अनंत शक्ति सम्पन्न मन को ध्यान के माध्यम से नियंत्रण में करके एक साधारण व्यक्ति भी असाधारण और महान बन सकता है। लेकिन ध्यान करने से पूर्व किसी योग्य सद्गुरु के मार्गदर्शन में कुछ विधियों और सावधानियों का पालन करना जरूरी है। ध्यान में सफलता प्राप्ति के लिये यहां कुछ विधियां और सावधानियां बताई जा रही हैं, जिनका पालन करने से ध्यान में प्रवेश करना
आसान होगा।

स्थिरता

आसनों से शरीर शुद्ध होता है। प्राणायाम से मन की चंचलता कम होती है। ध्यान से मन स्थिर होता है। बर्तन के जल को स्थिर करने के लिए बर्तन को भी स्थिर करना पड़ता है। उसके स्थिर होते ही जल भी धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है। ठीक यही संबंध हमारे शरीर रूपी बर्तन का मनरूपी जल से है। केवल जल के स्थिर होने से ही काम नहीं चलता। इसके मुख्यत: तीन दोष जब तक समाप्त न होंगे तब तक बर्तन का धरातल देखने में कठिनाई होगी। जैसे-जैसे पानी का गंदापन दूर होता है वैसे ही मन की मैल हटे। इसकी तरंगें समाप्त हों उसी तरह मन की विचार तरंगें शांत हों। यदि कोई
आवरण हो, वह हटे अर्थात्ï मन का आवरण दूर हो। इसलिए आसनों के द्वारा शरीर को स्थिर किया जाना चाहिए। फिर प्राणायाम व ध्यान के द्वारा मन की स्थिरता लाएं।

श्रद्धा और विश्वास

श्रद्धा एक दिव्यगुण है, जो सांसारिक जीवन में तो रस लाती ही है, परमार्थी जीवन में भी इसकी अधिक आवश्यकता है। अत: अपनी इस ध्यान-साधना का श्रीगणेश श्रद्धा-विश्वास तथा उत्साह से भरपूर होकर करना चाहिए। ध्यानसाधना में जितनी श्रद्धा होगी उतनी ही ज्यादा सफलता मिलेगी।

समर्पण

ध्यान तर्क-कुतर्क से नहीं समर्पण से फलदायी होता है। यदि साधक प्रारम्भ में ही शिक्षक से पूछता है कि यह क्यों है? तो वह ज्ञान ग्रहण करने में असमर्थ होगा। अत: प्रारम्भ में उसे जैसा कहा जाये, जैसा कराया जाये वैसा ही समर्पण भाव से करते रहने से ग्रहणशीलता बढ़ेगी और पूर्णत: सफलता भी मिलेगी।

मन की तटस्थता

साधना के आरम्भ से लेकर अंत तक साधक को डगमगाना नहीं चाहिए व मन में संशयवृत्ति नहीं होनी चाहिए। यदि नियमित ध्यान होगा तो मन भागेगा नहीं। मन से मन की साधना करने में ही
तटस्थता का भाव आता है।

निरन्तरता

ध्यान साधना नित्य और निरन्तर होनी चाहिए। इससे सफलता मिलती है और उत्साह बढ़ता है। अपनी साधना का आत्म-विश्लेषण करने से भी नियमित साधना करने की प्रेरणा मिलती है। कुछ करोगे तो कुछ मिलेगा। तैलधारावत्क रोगे तो सुनिश्चित सफलता मिलेगी। ध्यान में एक दिन भी विराम होने से अरुचि पेदा होने का डर उत्पन्न हो जाता है। साधना के प्रारम्भिक काल में कुछ और भी नियम हैं, जिनसे ध्यान-साधना बहुत शीघ्र फलित होती है।

एक समय

ऐसा न हो कि आपके ध्यान करने का समय कभी तो प्रात: 5 बजे तो कभी प्रात: 7 बजे हो। कभी प्रात:, दुपहरी या सायंकाल हो अथवा रात्रिकाल हो, ऐसा नहीं होना चाहिए जो समय एक बार तय कर लें उसे ही अपनाएं। वैसे तो ध्यान का सबसे अच्छा समय प्रात: 3 बजे से 6 बजे तक है। रात को सोने से पूर्व मुंहहाथ धोकर कुछ देर ध्यान करना बहुत लाभदायक है।
एक स्थान- स्थान को बार-बार बदलने से मन को एकाग्र करने में कठिनाई होगी। इसलिए एक ही स्थान पर तथा एक ही समय में ध्यान करने में सफलता मिलेगी। इसके अतिरिक्त स्थान पवित्र, शुद्ध, वायु से परिपूर्ण, शांत एवं निर्विघ्न हो।
एक आसन- ध्यान-साधना के लिए आपका अपना स्वयं का आसन होना चाहिए। बिछाने वाला आसन भी बारबार बदलना साधना में आक्षेप लाता है। इसलिए एक ही आसन का उपयोग करना अत्यन्त आवश्यक है और आसन साफ-सुथरा भी हो।
एक इष्ट- आपका जो भी इष्ट हो उसे बदलें नहीं। उस पर नित्य ध्यान लगाने से निश्चित रूप से तथा कम समय में सफलता मिलेगी।
एक मंत्र- जब भी जो मंत्र मिला उसका जप शुरू कर देना ठीक नहीं है। साधना का निश्चय करने से पहले एक मंत्र का चुनाव करें। या जिसे आप मानते हों, जिस गुरु पर आपका विश्वास हो उनसे मंत्र व उसकी विधि पूछ लें।

ध्यान की सावधानियां

  • ध्यान के अभ्यासी को जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। ध्यान में जितनी भी देर बैठें उतनी ही देर निश्चिंत होकर बैठें। शीघ्र सफलता की बेचैनी को दूर ही रखना चाहिए। धैर्यपूर्वक स्वाभाविक परिणाम की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
  • कुछ साधक अनुभूतियों को अधिक महत्त्व देते हैं और नित्य की साधना को कम। नियमित होने वाली विधिवत्ïसाधना यदि सही भावना व उत्साह से होती रहेगी तो अनुभूतियां स्वत: होंगी। अनुभूतियों का चिंतन अनावश्यक है।
  • द्य शीघ्र सफलता के लिए अपनी दिनचर्या और विचार को ठीक करना आवश्यक है। कुछ लोग ध्यान में बैठने का नाटक तो करते हैं, लेकिन उनके आचारविचार निर्मल नहीं होते, इससे ध्यान लगने में बाधा आती है। सारा समय चित्त के विकार ही दिखाई देंगे और कुछ नहीं। ध्यान से चित्त की शुद्धि जितनी होती है, उससे अधिक मल चित्त में दिनभर की असंगत क्रियाओं से जमा हो जाता है। फलत: प्रगति की संभावना कम हो जाती है।
  • कार्य की अधिकता व तनाव की स्थिति में भी ध्यान ठीक से नहीं लगता। अत: उनका निदान करें। ध्यान में बैठने से पूर्व सभी तरह की भय, चिंता को मन से निकाल दें।
  • वैसे तो योगी मिताहारी (कम भोजन करने वाला) होता है, परंतु ध्यान साधना करने वाले को अपने ध्यान के बारे में अधिक सतर्क रहना चाहिए। भोजन में दूध और फल को अधिक मात्रा में शामिल करना चाहिए। शाम का आहार हल्का हो तो उत्तम है।
  • ध्यान के तुरंत बाद उठना नहीं चाहिए। कभी ऐसी भी परिस्थिति हो सकती है कि उठना पड़े तो शांत भाव को बराबर बनाए रखें और उत्तेजना से सदैव बचें।

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