सरल शब्दों में साढ़ेसाती का अर्थ है साढ़े सात साल अर्थात जन्म चंद्र से एक भाव पहले चंद्र राशि व चंद्र राशि से एक भाव आगे तक के शनि के भ्रमण में पूरे साढ़े सात साल का समय लगता है क्योंकि शनि एक राशि में ढ़ाई साल तक रहता है। इस प्रकार से 3 राशियों में शनि के कुल निवास को साढ़ेसाती कहते हैं यानी ये साढ़े सात वर्ष काफी तकलीफ आफत और मुसीबतों का समय होता है। किंवदंती के अनुसार वीर राजा विक्रमादित्य भी शनि की साढ़ेसाती के प्रभाव में आए थे और तभी उनका राजपाट सब छिन गया था। साढ़ेसाती के दौरान शनि व्यक्ति के पिछले किये गये कर्मों का हिसाब उसी प्रकार से लेता है, जैसे एक घर की पूरी जिम्मेदारी संभालने वाले से कुछ समय बाद हिसाब मांगा जाता है और हिसाब में भूल होने पर या गलती करने पर जिस प्रकार से सजा मिलती है। ठीक उसी प्रकार से शनि देव भी हर प्राणी को सज़ा देते हैं। ऐसा नहीं है कि साढ़ेसाती सिर्फ कष्ट या दुख ही लाती है बल्कि जिन लोगों ने अच्छे कर्म किये होते हैं तो उनको ये पुरस्कार भी प्रदान करती है। अब जैसे साढ़ेसाती से ग्रस्त व्यक्ति को नगर, ग्राम या राज्य का मुखिया बना दिया जाना। 
इन बातों का रखें ध्यान
कहते हैं साढ़े साती में कभी भूलकर भी नीलम रत्न नहीं धारण करना चाहिये। वरना बजाय लाभ के हानि होने की पूरी सम्भावना होती है। 
कोई नया काम, नया उद्योग, भूल कर भी साढे़साती में नही करना चाहिये। किसी भी काम को करने से पहले किसी जानकार ज्योतिषी से जानकारी अवश्य कर लेनी चाहिये। 
यहां तक कि वाहन को भी भूलकर इस समय में नही खरीदना चाहिये। अन्यथा वह वाहन सुख का वाहन न होकर दुखों का वाहन हो जायेगा। 
यह भी देखा गया है कि शनि जब भी चार, छ, आठ और बारहवें भाव मे विचरण करेगा, तो व्यक्ति का मूल धन तो नष्ट हो जायेगा। इसलिए शनि के इस समय का विचार पहले से कर लिया जाना चाहिए ताकि धन की रक्षा हो सके। 
जब शनि किसी जातक की जन्मराशि से द्वादश अथवा प्रथम या द्वितीय स्थान में हों तो यह स्थिति शनि की साढ़ेसाती कहलाती है। ऐसा होने पर जातक को मानसिक संताप, शारीरिक कष्ट, कलह.क्लेश, अधिक खर्च का सामना करना पड़ता है। शनि एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक गतिशील रहते हैं। इसका प्रभाव एक राशि पहले से एक राशि बाद तक पड़ता है। यही स्थिति साढ़ेसाती कहलाती है। जब गोचर में शनि किसी राशि से चतुर्थ व अष्टम भाव में होता है तो यह स्थिति ढैय्या कहलाती है।
उपाय
शनि की साढ़ेसाती अथवा ढ़ैय़्या में जीवन में बदलाव अवश्य आता है और यह बदलाव अच्छा होगा या बुरा होगा ये आपकी जन्म कुंडली तय करेगी क्योंकि अच्छी दशा के साथ शनि की ढैय्या अथवा साढ़ेसाती बुरी साबित नहीं होती है लेकिन यदि अशुभ भाव अथवा अशुभ ग्रह की दशा चल रही है तब काफी कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
दान, मंत्र जाप, पूजन 
परेशानियों से बचने के लिए शनि महाराज को प्रसन्न रखना चाहिए जिससे जीवन सरलता से चल सकें। इस समय शनि का दान, मंत्र जाप, पूजन आदि करने से काफी राहत मिलती हैं। शास्त्रों में शनि की औषधि स्नान आदि के बारे में भी कहा गया है।
बीज मंत्र 
शनि को शांत रखने के लिए शनि के बीज मंत्र की कम से कम तीन मालाएँ अवश्य करनी चाहिए और मंत्र जाप से पूर्व संकल्प करना जरुरी है। बीज मंत्र के बाद शनि स्तोत्र का पाठ करना लाभदायक होगा।
बीज मंत्र  ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स, शनये नम
शनि स्तोत्र
जब किसी शनिवार के दिन श्रवण नक्षत्र पड़ रहा हो तब शमी की जड़ को काले धागे में बाँध कर अभिमंत्रित कर के धारण करने से भी लाभ मिलता है। शनि से संबंधित वस्तुएँ जैसे तेल, लोहा, काली मसूर, काले जूते, काले तिल, कस्तूरी आदि का दान करने से भी राहत मिलती है। किसी भी शनिवार से आरंभ कर के लगातार 43 दिन तक हनुमान जी के मंदिर में सिंदूर, चमेली का तेल, लड्डू और एक नारियल चढ़ाना चाहिए। सुंदरकांड का पाठ करने के बाद हनुमान चालीसा और श्रीहनुमाष्टक का पाठ करने से भी शनि से मिलने वाले कष्ट कम होते हैं।
साढ़े साती किस उम्र में होगी यह व्यक्ति विशेष की कुंडली पर निर्भर करता है। जब शनि किसी के लग्न से बारहवीं राशि में प्रवेश करता है तो उस विशेष राशि से अगली दो राशि में गुजरते हुए वह अपना समय चक्र पूरा करता है। यह समय चक्र साढ़े सात वर्ष का होता है और यही ज्योतिष शास्त्र में साढ़े साती कहलाता है। मंद गति के कारण एक राशि को पार करने में शनि को ढ़ाई वर्ष का समय लगता है इसलिए किस उम्र में किसे साढे साती से गुजरना है यह किसी की कुंडली में शनि की स्थिति देखकर ही बताई जा सकती है। अलग.अलग उम्र में पड़ने वाली साढ़े साती के अलग.अलग प्रभाव होते हैं। आइए जानते हैं कि किस उम्र में साढ़े साती पड़ने पर क्या प्रभाव पड़ता है।
साढ़े साती चार चक्र या चरणों में बांटा गया है, जो इस प्रकार हैं।
पहला चक्र 28 साल से पहले पड़ने वाली साढ़े साती
दूसरा चक्र 28 से बाद और 46 साल के पहले पड़ने वाली साढ़े साती
तीसरा चक्र 46 की उम्र के बाद और 82 की उम्र से पहले पड़ने वाली साढ़े साती
चौथा चक्र 82 की उम्र के बाद और 116 की उम्र के पहले
28 की उम्र से पहले पड़ने वाली साढ़े साती भावनात्मक प्रभाव
इसमें साढ़े साती से गुजरने वाले व्यक्ति से ज्यादा उसके करीबियों पर असर पड़ता है। इस तरह इस चक्र में भावनात्मक चोट की स्थिति बनती है। कई बार किसी करीबी की मौत या किसी अन्य बेहद करीबी से दूरी या विश्वासघात जैसी घटनाएं हो सकती हैं।
28 के बाद और 46 साल के पहले पड़ने वाली साढ़े साती ;सामाजिक प्रभाव
सामाजिक मान.सम्मान के क्षेत्र में साढ़े साती का यह चक्र मारक हो सकता है। व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता है। पारिवारिक स्तर पर क्षति होती है, हालांकि इसमें भी अलग.अलग व्यक्तियों पर दशाओं के अनुसार अलग.अलग प्रभाव होते हैं।
46 की उम्र के बाद और 82 की उम्र से पहले की साढ़े साती शारीरिक प्रभाव
इस चक्र में व्यक्ति मुख्यत शारीरिक रूप से प्रभावित होता है। परिवार को नुकसान या स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं आदि हो सकती हैं। यहां तक कि इसमें व्यक्ति की मौत भी हो सकती है।
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