आतिशबाजी करते वक्त हर किसी के दिमाग में यह सवाल जरूर आता है कि आखिर इन खूबसूरत पटाखों को बनाया किसने, इसका प्रचलन कब और कैसे हुआ? आज विश्व का हर देश अपनी खुशी में पटाखों को शामिल कर चुका है। तीज-त्योहार से लेकर नव वर्ष के स्वागत भी आतिशबाजियों से ही करते हैं हम और इसका श्रेय जाता है चीन को।
चीन में हुआ था बारूद का आविष्कार
इतिहासकारों की मानें तो संभवत: ईसा के पूर्व काल में चीनियों को बारुद की जानकारी थी। चीनवासियों ने बम बनाया था। दसअसल इस काम में वो बांस को जलाते थे। चूंकि बांस खोखला होता है और उसके बीच-बीच में गांठे भी होती हैं, आग लगने पर बीच के खोखले हिस्से में मौजूद हवा गर्मी से फैलता और एक भयानक आवाज गूंंजता, जिससे जानवर भी डरकर भाग जाते थे। आगे चलकर इसका स्वरूप बदलने लगा। बांस की जगह बारूद ने ले लिया। बारुद का आविष्कार चीन में हुआ था। कई इतिहासकारों का मत है कि बम पटाखों को चीनियों ने भूतों को भगाने के लिए बनाया था। बारुद पर 13वीं सदी तक चीन का ही एकछत्र अधिकार रहा। साल्टपीटर (पोटेशियम नाइट्रेट) कोयले और गंधक के मिश्रण से बारूद बनता है। इसकी मात्रा क्रमश: 75 प्रतिशत से 15 प्रतिशत तथा 10 प्रतिशत होती है।
‘ए हिस्ट्री ऑफ फायर वर्क्स’ के लेखक एलन ब्राफ ने लिखा है कि पटाखों का मसाला लोगों ने अनजाने में ही खोजा होगा। आग के आविष्कार के बाद भोजन का स्वाद बढ़ाने के लिए समुद्री तटों से दूर बसे लोगों ने नमक के स्थान पर गलती से साल्टपीटर अर्थात पोटेशियम नाइट्रेट डाल दिया। आग में गिर जाने से सितारों जैसे झिलमिला उठते हैं ये। किसी आदि मानव से थोड़ा पोटेशियम नाइट्रेट आग में गिरा होगा तो उसने पहली बार देखी होगी झिलमिल सितारों की चमक। निश्चित रूप से उसे यह इतना लुभाया होगा कि उसने अन्य लोगों से इसकी चर्चा की होगी।
अरबी लेखक अनुमुहम्मद अब्दुल्ला-बिन अहमद अनालिकी ने एक पुस्तक लिखी जिसमें उसने ‘फूंग फू’ नामक एक लड़ाई में प्रयोग किए गए अग्नि बाणों और बमों का वर्णन किया। लेखक ने उसे ‘बारूद’ कहा है। 14वीं शताब्दी में वर्थहोल्ट खार्ज ने बारूद से चलने वाली बन्दूक बना डाली।
आतिशबाजी का प्राचीन विवरण चीन के ग्रन्थों में
आतिशबाजी के प्रचलन का सबसे प्राचीन विवरण चीन के ग्रन्थों में मिलता है। प्रोफेसर कैरिग्टन गुडरिच की पुस्तक ‘शार्ट हिस्ट्री ऑफ द चायनीज पीपुल’ में सन् 960-1275 के काल में हुए युद्धों में बारूद के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। दरअसल चीन में सातवीं सदी तक कीमियागिरी का काफी विकास हो चुका था। शोरे और गन्धक जैसे तत्वों का महत्त्व चीन के रसायनज्ञ जान चुके थे। थाई राजवंश का सुन नामक रसायनज्ञ शोरे, गन्धक और कोयले को मिलाकर अग्निचूर्ण बनाया करता था। जिसका प्रयोग वह राजवंश के विशिष्ट पुरुषों के मनोरंजन हेतु करता था। सन् 618-906 ईसवी के एक उल्लेख से पता चलता है कि इस काल में अग्निचूर्ण की सहायता से धूमबाण, सर्पबाण आदि पटाखे मनोरंजन के लिए बनाए जाते थे। सन् 1221 में किन-तातीरों ने चीन के एक नगर पर तीह-हो-पाओ द्वारा आक्रमण किया। यह तुम्बी के आकार का एक लोहे का गोला हुआ करता था जिसमें अग्निचूर्ण भरा रहता था।
चीन में है सबसे प्राचीन तोप
प्रारम्भिक अवस्था में चीन में बांस के खोल में बारूदों को भरकर दागा जाता था। यह एक मनोरंजक प्रयोग था, किन्तु बाद में इसका प्रयोग युद्ध में होने लगा। तब इसे और शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता महसूस हुई। फलत: चीन के कीमायागारों में लोहे, कांसे की नलिकाएं बनाना प्रारम्भ किया। इन नलिकाओं में बारूद का गोला भरकर अग्निसंयोग द्वारा लक्ष्य तक फेंका जाता था। शुगों और मंगोलों से युद्ध के समय इस विधि का खूब प्रयोग हुआ था। सम्भवत: चीन ही पहला देश है, जिसने युद्ध में तोप का प्रयोग किया। चीन में प्राप्त सबसे प्राचीन तोप सन् 1332 में ढाली गई थी।
गुप्त रखा चीन ने आतिशबाजी विद्या को
चीन ने अपनी विद्या को काफी दिनों तक गुप्त रखा, किन्तु मंगोलों से युद्धों के बाद यह विद्या गुप्त न रह सकी और यूरोप तक पहुंच गयी। सम्भवत: रोजर बेकन ही वह पहला यूरोपियन था जिसने इस विषय पर कार्य किया।
इटली-फ्रांस ने भरा पटाखों में रंग
चीन के अविष्कार को आगे बढ़ाया इटली और फ्रांस ने। माना जाता है कि इटली निवासी मार्को पोलो 13वीं सदी में चीन से पटाखों के कुछ नमूने अपने साथ लेकर लौटे, जहां कुछ नवीन प्रयोग किए। फिर फ्रांस ने भी पटाखे बनाने की कला में अपना कौशल दिखाया।
विविध रंगों से सजी आतिशबाजी
आतिशबाजी के प्रति विशेष आकर्षण होता है। इसके विविध रंग होते हैं। इन रंगों को बनाने के लिए विभिन्न रसायनों का प्रयोग किया जाता है। आरसेनिक लवण या एन्टीमनी से सफेद रंग, स्ट्रांशियम नाइट्रेट के लवण से लाल रंग, बेरियम नाइट्रेट के लवण से हरा रंग, सोडियम कार्बोनेट से पीला रंग, तांबे के कार्बोनेट से नीला रंग आतिशबाजी में दिखाई देता है। चमक के लिए मैग्नीशियम या एल्यूमीनियम का चूर्ण मिलाया जाता है।
दुनिया की अब तक की सबसे बड़ी आतिशबाजी 22 अक्टूबर 1977 को टाईटसविल फ्लोरिडा के निकट छोड़ी गई थी। इसका वजन 326.5 किलोग्राम था। इसके खोल का व्यास 40 इंच था।
भारत में आतिशबाजी का प्रचलन
भारत में सबसे ज्यादा पटाखे तमिलनाडु के शिव-कासी शहर में बनाए जाते हैं। भारत में इसका प्रचलन कब से प्रारम्भ हुआ, यह ठीक से ज्ञात नहीं किन्तु 1400 ईस्वी के आस-पास के ग्रन्थों में आतिशबाजी का उल्लेख मिलता है। कबीर के ग्रन्थों से बन्दूख, तोपखाना, गोला-बारूद आदि शब्द मिलते हैं। इससे पता चलता है कि कबीर के काल में अर्थात् चौदहवीं शताब्दी तक बन्दूक और गोला-बारूद का प्रचार हो चुका था।
उड़ीसा नरेश प्रताप रुद्रदेव द्वारा रचित पुस्तक कौतुक चिन्तामणि तथा दक्षिण के ही बोगर द्वारा रचित ‘बाणशास्त्रम्’ एवं ‘गोगर सूत्रम्’ में अग्निचूर्ण बनाने के विभिन्न सूत्र दिए गए हैं। बोगर सूत्रम् में तो विभिन्न रसायन सूत्रों द्वारा बीस प्रकार के पटाखों के निर्माण की विधि बताई गई है।
एल.डी. वारथीमा की यात्राओं के विवरण में सन् 1443 में विजय नगर में हुई आतिशबाजी का उल्लेख मिलता है। वारथीमा के अनुसार विजय नगर में आतिशबाजी का प्रचलन कश्मीर से होता आया है। किन्तु कुछ विद्वानों का मत है कि यह कला विजयनगरवासियों ने पुर्तगाली सैनिकों से सीखा है। विजयनगर से ही आतिशबाजी की कला का प्रचार समस्त दक्षिण भारत में हुआ है। दक्षिण भारत में यह कला आज भी जीवित है।

सोलहवीं शताब्दी में आतिशबाजी का उल्लेख
शुक्र नीति जो सम्भवत: सोलहवीं शताब्दी में रचित ग्रन्थ है, में नालिका (बन्दूक) द्रावचूर्ण (बारूद) का वर्णन मिलता है। इस ग्रन्थ में द्रावचूर्ण बनाने के लिए पांच पत्र शोरा, एक पत्र गन्धक, अन्तर्धूम से पके अर्क, स्नुहीका कोयला की आवश्यकता बताई गई। इन सबको अलग-अलग पीस लिया जाता है, फिर इसमें केले के रस की भावना देते थे और धूप में सुखा लेते थे। यह अग्निचूर्ण पिसने पर चीनी की भांति हो जाता था।
बारूद तैयार करने के लिए अंगार (कोयला) गन्धक, सुवर्चि लवण (शोरा) मन:शिला, हरताल, सीस-किट्ट, हिंगुल, कांतलौहकी रज, खपरिया, जतु (लाख), नील्थ सरल निर्यास (रोजिन) आदि द्रव्यों को बराबर भाग में पीसकर मिलाया जाता था। अच्छी तरह मिलाकर इन्हें गोले के आकार का बनाया जाता था। इन्हें काफी ऊंचाई से फेंके जाने पर ये विस्फोट करते थे। इस विस्फोट से भयंकर ज्वाला उत्पन्न होती थी, जो विभिन्न रंगों की होती थी।
तंजौर पुस्तकालय में सुरक्षित ‘आकाश-भैरव कल्प’ नामक पुस्तक में बन्दूकों और अग्निक्रीड़ाओं का उल्लेख है। उस पुस्तक में बाण-वृक्षों का उल्लेख है, जो बांस के बने पिंजरे होते थे, जिन पर अग्निबाण अन्तरिक्ष में छोड़े जाते थे। ये अग्निबाण काफी समय तक आकाश में घूमते रहते थे और तरह-तरह के रंगीन प्रकाश उत्पन्न करते थे।
मुगलकालीन ग्रन्थों में भी उल्लेख
आईन-ए-अकबरी में विभिन्न किस्म की तोपों का विवरण प्राप्त होता है। इसी प्रकार हैदर अली और टीपू सुल्तान के काल में विभिन्न किस्म की तोपों का उल्लेख मिलता है। टीपू सुल्तान की सेना में तो इस कार्य में दक्ष लोगों का पूरा एक दल था जो तोप संचालन में प्रवीण था। अठारहवीं सदी के अन्त में टीपू ने अंग्रेजों के विरुद्ध राकेटों का प्रयोग भी किया था जिसकी तकनीक के बारे में अंग्रेज कुछ भी नहीं जानते थे।
सत्रहवीं शताब्दी के बाद बढ़ा आतिशबाजी का प्रचार-प्रसार
यूरोप में सत्रहवीं शताब्दी के बाद से आतिशबाजी का प्रचार-प्रसार बढ़ा। इसमें आतिशबाजी के दो प्रमुख केन्द्र न्यूरेमबर्ग और इटली थे। सन् 1707 और 1747 में डो फेजियरने आतिशबाजी से सम्बन्धित दो पुस्तकें लिखीं। इन पुस्तकों में उसने रंग-बिरंगी आतिशबाजी का उल्लेख किया है। सन् 1788 में पोटेशियम कोरेट एवं 1865 में मैग्नीशियम का आविष्कार हुआ। सन् 1894 में अल्यूमिनियम धातुओं का आविष्कार हुआ। इन तीनों आविष्कारों ने आतिशबाजी को एक नया रूप ही दे डाला। आज आतिशबाजी हमारी हर खुशी हर त्योहार का अहम् हिस्सा बन गई है, चाहे कोई तीज त्योहार हो, या फिर कोई जीत या जश्न, रंग-बिरंगी आतिशबाजी हमारी खुशियों को संपूर्ण कर देती है।
यह भी पढ़ें –इच्छा पूर्ति यंत्र-पिरामिड विश बॉक्स
