दीपावली पर संपूर्ण देश में आतिशबाजी की जाती है। बच्चे, बूढ़े और जवां सभी पटाखे चलाकर अपनी खुशियों का इजहार करते हैं। जीत और जश्न का पर्याय बन चुकी आतिशबाजी का इतिहास बड़ा रोचक है। शायद आप नहीं जानते होंगे कि पटाखों काआविष्कार चीन में हुआ था। मसालेदार और लजीज़ खाना बनाते समय किसी रसोइए ने गलती से साल्टपीटर (पोटेशियम नाइट्रेट) आग पर डाल दिया था परिणाम स्वरूप आग से उठने वाली लपटें रंगीन हो गईं। इस रसोइए के प्रधान ने तो साल्टपीटर के साथ ही कोयले और सल्फर कामिश्रण कर उसे आग के हवाले कर दिया था जिससे यह काफी तेज आवाज के साथ जला। बस, यहीं से आतिशबाजी यानी पटाखों की शुरुआत हुई। 

वैसे पटाखों का पहला प्रमाण वर्ष 1040 में मिलता है, जब चीनियों ने इन तीनों चीजों के साथ कुछ और रसायन मिला कर कागज में लपेट कर फायर पिल बनाई थी, यहीं से पटाखे बनाने की यह कला पश्चिमी देशों में गई थी। पटाखे बनाने की कला भारत सहित अन्य पूर्वी देशों को भी आती थी। यूरोप में पटाखों का चलन सब से पहले वर्ष 1258 में हुआ था। 14वीं शताब्दी के शुरू होते ही तकरीबन सभी देशों में बम बनाने का काम शुरू कर दिया था। यूरोप में पटाखों का उत्पादन सब से पहले इटली ने किया था। इस मामले में यह देश पश्चिमी देशों का नेतृत्व करता था। जर्मनी के लोग युद्ध मैदानों में इन बमों का उपयोग करते थे। चीन के लोग समारोह आदि में इन बमों का उपयोग करते थे। इंग्लैंड में भी इनका उपयोग समारोहों में किया जाता था। 

अमेरिका में इनकी शुरुआत 16वीं शताब्दी में मिलिटरी ने की थी ।इसकी प्रतिक्रिया में पटाखे बनाने की कई कंपनियां खुलीं और सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला। बाद में पश्चिमी देशों में हाथ से फेंके जाने वाले बम बने। बंदूकें और तोप भी तभी बनी थीं। इंग्लैंड की राजशाही में भी इसका महत्व था।महाराजा चाल्र्स (पंचम) अपनी हर विजय का जश्न आतिशबाजी करके मनाते थे। वह बात दूसरी है कि आतिशबाजी के दौरान कई आतिशबाज़ घायल हुए तो कई मारे भी गए। वर्ष 1892 में अमेरिका में कोलंबस के आगमन की चौथी शताब्दी पर ब्रकलिन ब्रिज पर जम कर आतिशबाजी की गई थी। इसे करीब 10 लाख लोगों ने देखा था।