यह एक विचित्र तथ्य है कि बहुत से महान व्यक्तियों में भी निराशा के भाव विद्यमान थे, और इसी निराशा की काली रेखा के कारण उनमें से अनेक मानसिक रोगों के शिकार बने और उनकी महान सफलताओं में बाधा पहुंची।

मन में निरन्तर निराशा के विचार आने से, निरुत्साह से व्यक्ति की आकांक्षाएं ही नहीं कुचली जातीं, बल्कि कार्य के लिए जागृति भी मन्द पड़ती है। आदर्श स्पष्ट नहीं रहते, वरन धुंधले पड़ने लगते हैं और मानसिक शक्ति भी प्राय नष्ट हो जाती है। जितनी बार भी आप निराशा के आगे घुटने टेकते हैं, जितनी बार निरुत्साहित होते हैं, उतनी ही बार आप अपनी उन आशाओं के महल को ध्वस्त करते हैं, जिन्हें आपने बड़े श्रम से बनाया था।

जितनी बार आपकी आशाएं-आकांक्षाएं धराशायी होती हैं, उतनी ही बार आपकी मानसिक शक्तियां कार्य के अयोग्य और निकम्मा बनाती हैं। जो मन निरुत्साहित है, वह किसी भी प्रकार का निर्माण-कार्य कैसे करेगा? वह तो रचनात्मक रह ही नहीं सकता, क्योंकि वह तो नष्ट करने में लगा हुआ है, ध्वंस करने में लगा हुआ है।

इसका अर्थ यही है कि यदि आप अपने मन में निराशा के भाव आने देते हैं तो निश्चित जानिए कि आप अपने हाथों से अपना विनाश कर रहे हैं। आपको ज्ञात नहीं है कि संभवत: दस मिनट की निराशा और अनुत्साह आपके कई दिन के प्रयत्नपूर्वक बनाए गए कार्यों को पल भर में समाप्त कर देती है, नष्ट कर देती है।

मानसिक रूप से नीचे गिरना आसान है अथवा ध्वंसात्मक होना बहुत सरल है, जिस प्रकार मकान को गिराना बहुत सरल काम है, परंतु उसका त्वरित निर्माण बहुत कठिन और श्रमसाध्य है। पर्वत की चोटी के नीचे उतरना सरल है लेकिन चढ़ना बहुत दु:साध्य और कठिन होता है। जब हम स्वयं अपने को निरुत्साहित होने देते हैं तो यह पता ही नहीं चलता कि हम क्या कर रहे हैं। वास्तव में हम उस समय अपने शरीर और भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे होते हैं। उस समय निराशा की अंधकारपूर्ण काली छाया हमारी चेतना पर अत्यन्त गहरी छाप छोड़ती है, उसे भयंकर रूप से कुंठित करती है। वस्तुत: हमारे शत्रु भी यही काम करते हैं। निराशा हमारी इसी प्रकार की भयंकर शत्रु है।

जब भी हम पर निराशा का आक्रमण होता है अथवा भय हमें निरुत्साहित करता है तो यह प्रत्यक्ष रूप से अपने प्रति किया गया हमारा अपराध ही होता है। प्राय: ऐसा माना जाता है कि युवक और युवतियां अधिक आशावान होते हैं, और भविष्य के प्रति सचेत होते हैं, लेकिन सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए तो पता चलेगा कि युवावस्था में ही निराशा अधिक घेरती है।

कई बार सुनने में आता है कि फलां युवक अथवा युवती ने निराशा से तंग आकर आत्महत्या कर ली अथवा बेकारी से ऊबकर या परीक्षा में असफल होने के कारण अपने जीवन का अंत कर लिया। यदि उन युवक अथवा युवतियों को अपने भावी जीवन की सफलताओं या सफलता की संभावनाओं में विश्वास होता तो वे कभी भी अपने इस अमूल्य जीवन को इस प्रकार नष्ट न कर देते। संभवत: हम नहीं जानते कि यदि हम अपनी मनोवृत्तियों, मनोदशा अथवा मन स्थिति को ठीक रख सकें तो हम क्या चमत्कार कर सकते हैं।

यदि हम सर्वोच्च आकांक्षा के स्तर पर अपनी भावनाओं को स्थिर रख सकें तो हमें सभी प्राकृतिक पदार्थों से प्रसन्नता प्राप्त होगी। ऐसा प्रतीत होगा कि प्रकृति हम पर एक अद्ïभुत चमत्कार प्रकट कर रही है, क्योंकि हम जानते हैं कि प्रकृति हमसे जो कुछ प्राप्त करती है, वही बदले में देती भी है। यदि मन सर्वोच्च स्थिति या स्वाभाविक स्थिति में रहता है तो हमें अपार हर्ष और आनन्द प्राप्त होता है पर कठिनाई यही है कि हमें यह ज्ञात ही नहीं कि संसार हमें अपनी मानसिक स्थिति के अनुरूप ही दिखाई देता है।

यदि हमारी मानसिक स्थिति रंगीन है तो यह संसार हमें रंगीन ही दिखाई देगा। यदि हमने मन पर निराशा का काला लबादा डाल रखा है तो संसार भी हमें निराशा से घिरा हुआ ही दिखाई देगा। यह कैसे हो सकता है कि अपनी आंखों पर तो काला चश्मा लगा रखा हो और हमें सफेद दिखाई दे। बहुत से लोगों का विचार है कि मानसिक स्थिति पर अपना अधिकार नहीं होता अर्थात् मनोदशा हमारी अपनी इच्छा के अनुरूप नहीं हो सकती। वह व्यक्ति के अंदर प्राकृतिक रूप से घर कर जाती है, अत: हम इसमें परिवर्तन कैसे कर सकते हैं, पर वास्तव में ऐसा सोचना हमारी भूल है, ऐसा करना गलत है।

हम अपनी मानसिक स्थिति को बदल सकते हैं, अपनी मनोदशा में ठीक उसी प्रकार आमूल-चूल परिवर्तन कर सकते हैं, जिस प्रकार हम अपने वस्त्रों को, अपनी पोशाक को, अपनी वेशभूषा को बदल सकते हैं।

आप अपने प्रयत्नों से मन में व्याप्त घोर से घोर निराशा की भावना को भी दूर कर सकते हैं, और निष्क्रियता को तिलांजलि दे सकते हैं, बशर्ते कि आप अपने अंदर निराशा के विरोधी भावों उत्साह और आदि को जगाएं और अपने जीवन में रचनात्मकता को प्राथमिकता दें। जब कभी निराशा आप पर आक्रमण करे, आप को अभिभूत करना चाहे तो आप अपने मन को दृढ़ रखिए निराशा के आगे उसे झुकने मत दीजिए अपनी इच्छाशक्तिको प्रबल कीजिए, अपने आदर्शों को सदा सर्वोच्च रखिए। निराशा की भावना को, निरुत्साहपूर्ण विचारों को मन में आने से पूर्व कुचल डालें तो फिर उन्हें टिकने के लिए स्थान ही प्राप्त नहीं होगा।

जब भी आपके मन में निराशाजनक भाव आएं तो फौरन भांप जाइए कि यह ध्वंसात्मक भावना है, अनिष्ट करने वाली भावना है। उसी समय अपने मन में रचनात्मक विचार लाइए। अपने विचारों में परिवर्तन लाना असंभव कार्य नहीं है। इसमें सीखने जैसी कोई बात नहीं है। हमारी मानसिक स्थिति हमारी इच्छाशक्ति के वश में होती है और हम अपनी मानसिक स्थिति को जैसा चाहें वैसा बना सकते हैं।

जो मनुष्य प्रेमी है, प्रेम करना जिसका स्वभाव है, वह सब कुछ प्रेममय देखता है, उसके लिए संसार का स्वरूप ही बदल जाता है। उसके लिए सभी पदार्थ सुन्दर बन जाते हैं, गौरवमय हो जाते हैं, क्योंकि उसकी मानसिक स्थिति वैसी है। यह कहना सर्वथा गलत है कि निराशा की भावना हमें विरासत में मिली है। वास्तव में हम अपने द्वारा अपने समाज का ढांचा खड़ा करते हैं, अपने संसार की रचना करते हैं और हमसे संसार भी बनता है। कुल मिलाकर भावों का चुनाव हमारे अपने वश की बात है, उसके लिए हम स्वतंत्र हैं।

जिस प्रकार एक क्षार दूसरे क्षार को निष्क्रिय कर देता है तथा जिस तरह सूर्य की किरणें धुंध को नष्ट कर देती है उसी प्रकार आशा और उत्साह के स्पर्श मात्र से निराशा और निष्क्रियता से भरी मनोस्थिति में परिवर्तन आ जाता है।

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