भारतीय देवमंडल में प्रथम पूजनीय भगवान श्री गणेश की आराधना के कई रूप दिखायी देते हैं। इन्हीं रूपों में से एक अष्टविनायक को महाराष्ट्र में विशेष स्थान प्राप्त है। हर वर्ष महाराष्ट्र में 10 दिवसीय गणेशोत्सव का आयोजन किया जाता है। अष्टविनायक की आराधना भक्ति भाव के साथ वर्ष भर की जाती है। अष्टविनायक के दो स्वरूपों को मान्यता दी गई है। इन रूपों में विदर्भ के अष्टविनायक तथा पुणे और रायगढ़ के अष्टविनायक का समावेश है। 

पश्चिम महाराष्ट्र में गणपति के आठ प्रख्यात मंदिर हैं। दंडक राजा की कर्मभूमि कहे जाने वाले विदर्भ को प्राचीन काल में ‘दंडकारण्य’ नाम से संबोधित किया जाता था। इतिहास और प्राचीन शिलालेखों का अध्ययन करने पर विदर्भ में वाकाटक के शासन काल से भगवान श्रीगणेश की आराधना किए जाने का उल्लेख मिलता है। उसी समय विदर्भ के अष्टविनायक की आराधना का जिक्र भी मिला है।  

स्वामी विघ्नेश गणेश (आदसा, कलमेश्वर)

विदर्भ के अष्टविनायक में दर्शन का पहला मान नागपुर जिले की कमलेश्वर तहसील के आदसा नामक गांव में स्थित श्री महागणेश को प्राप्त है, इस गणेश मंदिर का निर्माण पत्थर से किया गया है। इस परिसर में महादेव, भैरव तथा हनुमान के भी मंदिर हैं। मूर्ति नृत्य मुद्रा वाली तथा संधारा प्रकार की है। परिसर में बारह ज्योतिर्लिंग भी बनाए गए हैं। वामन पुराण में इस गांव का नाम अदोष क्षेत्र बताया गया है। गणपत्य संप्रदाय के श्रद्धालुओं के लिए इस स्थान का विशेष महत्त्व है।

चिंतामणि गणेश (कलंब)

नागपुर-यवतमाल राज्य महामार्ग नंबर- 3 पर यवतमाल से 20 किलोमीटर दूरी पर कदंबपुर नामक प्राचीन नाम वाला यह मंदिर है। सर्व चिंता से मुक्ति देने वाले गणेश मंदिर के रूप में इसका विशेष महत्त्व है। जमीन के अंदर 10 मीटर दूरी पर स्थित इस मंदिर में स्थापित इस मूर्ति पर सिंदूर लगा हुआ है। मंदिर में स्थित कुएं के पानी में औषधीय गुण होने का दावा भी किया जाता है। स्थानीय लोगों का दावा है कि मंदिर स्थित कुएं के पानी से सभी प्रकार के त्वचा रोग दूर हो जाते हैं। हर 12 वर्ष में इस कुएं के जल का स्तर बढ़ता है और वह जल भगवान गणेश जी की मूर्ति तक आता है। 

एकचक्र सिध्दिविनायक (केलजर, वर्धा)

नागपुर- वर्धा राष्ट्रीय महामार्ग क्रमांक 3  पर वर्धा जिले के केलजर मंदिर है। मुगल काल में इस गांव को विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ है। महाभारत में बकासुर के संदर्भ में केलजर का उल्लेख मिलता है। कुछ दिनों तक इस गणेश मंदिर में भैंसा की बलि देने की प्रथा बेरोकटोक जारी थी, लेकिन अब इस कुप्रथा पर पूरी तरह से प्रतिबंध लग चुका है। मंदिर में सवा मीटर ऊंची गणेशमूर्ति स्थापित की गई है, यह मूर्ति पूरी तरह से सिंदूर से व्याप्त है। मूर्ति की सूंड दायी ओर घूमी हुई है। यह मूर्ति नृत्य मुद्रा में होने के कारण शोधार्थियों के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है। 

अष्टादशभुजा गणेश (रामटेक) 

नागपुर से 47 किलोमीटर दूरी पर स्थित रामटेक नामक तीर्थक्षेत्र में 18 हाथ वाले श्रीगणेश का अति प्राचीन मंदिर है। डेढ़ मीटर ऊंची यह गणेश मूर्ति पद्मासन में आसीन है। भंडारा जिले से इस देवस्थान तक पहुंचने के लिए 1.30 घंटे लगते हैं। रामटेक शहर के शिवाजी वार्ड में स्थित इस मंदिर में गणेशोत्सव के दौरान भारी भीड़ उमड़ती है। इस मंदिर में विदर्भ क्षेत्र में आने वाले सभी अष्टविनायक मंदिरों के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी गई है। नागपुर तथा भंडारा से लगभग समान दूरी पर स्थित इस मंदिर को जागृत मंदिर का दर्जा प्राप्त है। 

टेकड़ी गणगति (नागपुर)

विदर्भ के अष्टïविनायक में नागपुर के वरद विनायक को विशेष तौर पर ऐतिहासिक महत्त्व प्राप्त है। यह गणपति टेकड़ी के रूप में प्रसिद्ध है। यह 12वीं शताब्दी में यादवकालीन राज के कार्यकाल की स्वयंभू मूर्ति है। इस मंदिर में स्थापित भगवान गणेश की मूर्ति दाये संूड की है। सामाजिक कार्यों के लिए इस मंदिर को मिली धनराशि का उपयोग किया जाता है।

वरद विनायक (गौराला, भद्रावती, चंद्रपुर)

नागपुर से 130 किलोमीटर दूरी पर स्थित भांदक (प्रचलित नाम भद्रावती) में पहाड़ी पर स्थित श्री गणेश का मंदिर है। मुख्य मंदिर में 16 स्तंभ हैं,  जिसमें उमा महेश्वर की मूर्ति है। कुछ वर्ष पूर्व यह मंदिर ध्वस्त हो गया था, जिसे पुरातत्त्व विभाग ने फिर से बनवाया। ढाई मीटर ऊंची तथा 1.10 मीटर चौड़ी इस मूर्ति पर सिंदूर के कई स्तर हैं। मंदिर परिसर में भारी संख्या में प्राचीन मूर्ति के अवशेष मिले, जिनमें से कुछ नागपुर के संग्रहालय में रखे गए हैं। मूर्ति के दोनों हाथ में मोदक के पात्र हैं। इस मूर्ति के वाकाटक कालीन होने का अनुमान व्यक्त किया गया है।

भ्रुशुंड गणेश (मेढा, भंडारा)

भंडारा शहर में राष्ट्रीय महामार्ग क्रमांक छह पर मेंढा उपनगर में यह मंदिर स्थित है। जिस क्षेत्र में यह मंदिर स्थित है, उसका प्राचीन नाम शांडिल्यग्राम है। इस मंदिर में स्थापित गणेशमूर्ति की ऊंचाई ढाई मीटर, चौड़ाई डेढ़ मीटर है। इस मूर्ति में ॠषि-मुनी की तरह दाढ़ी मूंछ है। मूर्ति पर भारी मात्रा में सिंदूर का लेप किया गया है। यहां पर   भगवान गणेश वामललितासन पर आसीन है। वैनगंगा नदी तट पर स्थित इस मंदिर का इतिहास कुछ प्रसिद्ध प्राचीन ग्रंथों में भी उल्लेखित किया गया है। इस मंदिर में गणेशोत्सव के दौरान भारी भीड़ उमड़ती है। संकष्टी तथा गणेश चतुर्थी के मौके पर यहां अनेक धार्मिक तथा सामाजिक कार्यक्रम होते हैं। 

पंचानन विघ्नराज गणपति (पवनी, भंडारा)

भंडारा शहर से 50 और नागपुर से 87 किलोमीटर की दूरी पर केवल विदर्भ का ही नहीं, अपितु समूचे महाराष्ट्र के इतिहास के सबसे प्राचीन स्थल के रूप में ख्यात पवनी अपने में बहुत कुछ समेटे है। यहां एक ही पत्थर में गणेश की पांच मूर्तियां बनायी गई हैं। पवनी में भगवान श्री गणेश के उक्त मंदिर के अलावा अन्य देवी देवताओं के मंदिर भी हैं। ये सभी मंदिर पुरातत्त्व क्षेत्र में शोध करने वाले विद्यार्थियों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। 

पुणे, रायगढ़ के अष्टविनायक मंदिर

विदर्भ के अष्टविनायक के अलावा महाराष्ट्र के पुणे तथा रायगढ़ में भी अष्टविनायक के मंदिर हैं। आमतौर पर भक्त इन्हीं अष्टविनायक मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं। इन अष्टविनायक मंदिरों में से 6 पुणे जिले में और 2 रायगढ़ में हैं। गणपति का दूसरा नाम है विनायक। गणपति या श्री विनायक बुद्धि और विद्या के आदि देव हैं। गणपति ‘प्रथम आराध्य’ भी हैं, जिसका अर्थ यह है कि किसी भी पूजा या यज्ञ के दौरान सबसे पहले भगवान गणेश जी की पूजा जाती है। ऐसी मान्यता है कि भगवान गणेश के  हर भक्त को अपने जीवन काल में कम से कम एक बार अष्टविनायक की यात्रा जरूर करनी चाहिए।

इस क्रम से करें दर्शनअष्टविनायक यात्रा पूरी करने हेतु इन मंदिरों के एक विशेष क्रम में दर्शन करें। 

श्री मयूरेश्वर (मोरगांव)- यह मंदिर पुणे से करीब साठ किलोमीटर  दूर स्थित है। इस मंदिर का नाम मयूर या मोर के नाम पर रखा गया है, ऐसा माना जाता है कि सिंधु नामक असुर का विनाश करने के लिए भगवान गणेश मोर के रूप में मोरगांव में आये थे। मोरगांव कारहा नदी के तट पर स्थित है। यहां स्थापित भगवान गणेश की मूर्ति की तीन आंखें हैं तथा सूंड बायीं ओर मुड़ी हुई है। इस तरह का घुमाव यश प्राप्ति करवाता है। यहां भगवान गणेश ऋद्धि, सिद्धि के साथ विराजमान हैं। इस मंदिर को बहमनी शासनकाल में बनाया गया था। इस मंदिर की वास्तुशैली पर मुगलकालीन प्रभाव दिखायी देता है।

श्री सिद्धिविनायक (सिद्धटेक)-  यह मंदिर पुणे-सोलापुर मार्ग पर स्थित है। इसे पेशवा काल में बनवाया गया था। इस मंदिर का मुख्य मंडप, महारानी अहिल्याबाई होल्कर, जो इंदौर की महारानी थीं, ने बनवाया था। यह गांव भीम नदी के किनारे बसा है। माना जाता है कि श्री विष्णु को इसी सिद्धटेक के पहाड़ों पर सिद्धि प्राप्त हुई, जिसके बल पर वे मधु और कैटाब जैसे दानवों का विनाश कर सके। इस मंदिर में स्थापित की गई मूर्ति की सूड दाहिने तरफ मुड़ी हुई है। अष्टविनायक मंदिरों में से सिर्फ यही एक मंदिर ऐसा है, जिसमें इस तरफ का घुमाव है। 

श्री बल्लालेश्वर (पाली)- पाली गांव रायगढ़ जिले में स्थित है। यह मंदिर सारसगढ़ किले और अम्बा नदी के बीचों बीच है। इस मंदिर को पेशवा काल में बनवाया गया था। स्थानीय लोग यह मानते हैं कि एक युवक, जिसका नाम बल्लाल था, वह भगवान गणेश की बहुत ज्यादा आराधना करता था, उसकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने ब्राह्मण वेश में उसकी सहायता की। इस मंदिर में भगवान गणेश की मूर्ति ब्राह्मण वेश में स्थापित की गई है। यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसमें भक्त के नाम से भगवान जाने जाते हैं। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि सूर्योदय के समय, सूर्य की किरणें ठीक मूर्ति पर पड़ती हैं और मूर्ति की आंखों में लगे रत्न चमक उठते हैं।

श्री वरद विनायक (महाड)-  यह मंदिर महाड गांव (खोपोली) के पास रायगढ़ जिले में स्थित है। मराठी में वरद विनायक का अर्थ है- वरदान देने वाला इस मंदिर में स्थित मूर्ति सन् 1690 में पास के एक तालाब से प्राप्त हुई थी। यह मंदिर सूबेदार रामजी महादेव ने 1725 में बनवाया था। इस मंदिर में एक दीपक है, जिसे नंदादीप कहते हैं। यह दीपक सन् 1892 से निरंतर जल रहा है। इस मंदिर की प्रतिमा तथा परिसर प्राचीन हैं। यह एकमात्र अष्टविनायक मंदिर है, जहां भक्त स्वयं देवता के समीप जाकर पूजा अर्चना कर सकते हैं। मुख्य कक्ष में दो मूर्तियां स्थापित हैं। एक श्री वरद विनायक की, जिनकी सूंड बायीं ओर है और एक संगमरमर से बनी मूर्ति, जिसकी सूंड दाहिनी ओर है।

श्री चिंतामणि (थेऊर)-  यह मंदिर पुणे से करीब 25 किमी पर स्थित है। थेऊर का अष्टविनायक मंदिर तीन नदियों मूला, मूठ और भीमा के सम्प्रवाह के पास स्थित है। इस मंदिर को माधवराव पेशवा ने बनवाया था। ऐतिहासिक कथाओं के अनुसार ऋषि कपिल के पास एक चिंतामणि पत्थर था, जिसे गुण नामक लालची राजकुमार ने हर लिया था। जब गणपति ऋषि कपिल को वो पत्थर लौटाने आये तब ऋषि ने वह चिंतामणि पत्थर गणपति के गले में डाल कर उन्हें अर्पित कर दिया। इसीलिए गणेश जी को यहां चिंतामणि संबोधित किया जाता है। भक्तों का यह भी मानना है कि भगवान गणेश अपने भक्तों की हर चिंता का शमन करते हैं और उन्हें मानसिक शांति प्रदान करते हैं। इस मंदिर में भगवान गणेश के अलावा भगवान शिव, विष्णु-लक्ष्मी तथा हनुमान के भी मंदिर हैं।

श्री गिरिजात्मजा (लेण्याद्री)- यह मंदिर लेण्याद्री के पहाड़ से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह स्थान कुकड़ी नदी के पास है और इस मंदिर से पशुपति नदी के दर्शन अच्छी तरह से हो सकते हैं।

गिरिजात्मजा का अर्थ है गिरिजा का पुत्र। गिरिजा, देवी पार्वती का दूसरा नाम है। ऐसी मान्यता है कि देवी पार्वती ने 12 वर्ष पुत्र प्राप्ति के लिए यहां तपस्या की थी। यह मंदिर गुफाओं के बीच स्थित है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए 300 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इस मंदिर को एक ही पत्थर से निर्मित किया गया है। इस मंदिर में गणपति की मूर्ति भी गुफा की एक दीवार पर तराशी गयी है।

श्री विघ्नेश्वर (ओझर)- नारायणगांव, जुन्नर तहसील में स्थित ओझर, कुकड़ी नदी के तट पर है। यह पुणे से 80 किमी पुणे-नासिक राजमार्ग पर स्थित है। माना जाता है कि जब विघ्नासुर ऋषियों को कष्ट दे रहा था, तब भगवान गणेश ने विघ्नासुर पर विजय प्राप्त की थी।  जब असुर ने क्षमा याचना की, तब भगवान गणेश ने उसे यह कहकर छोड़ दिया कि जहां भगवान गणेश जी की पूजा हो रही हो वहां असुर कभी नहीं जाएगा। विघ्नासुर ने तब प्रभु से अपना नाम अपनाने की मांग की और विघ्नासुर की मांग भगवान गणेश ने स्वीकार कर लिया, तभी से यहां गणपति को विघ्नेश्वर के नाम से पूजा जाने लगा। यह मंदिर चारों ओर से भव्य दीवारों से घिरा हुआ है तथा इस मंदिर का गोपुर सोने का है। श्री गणेश यहां पूर्व मुखी होकर ऋद्धि सिद्धि के साथ विराजमान हैं।

श्री महागणपति (रंजनगांव)-  रंजनगांव पुणे के पास एक छोटा सा गांव है। इस मंदिर को माधवराव पेशवा ने बनवाया था। इस मंदिर में महागणपति का स्वरूप है, जो गणेश जी के सबसे शक्तिशाली स्वरुप माने जाते हैं। इस मूर्ति में 10 सूंड और 20 हाथ हैं। माना जाता है कि त्रिपुरासुर से युद्ध करने के पहले भगवान शिव ने महागणपति की आराधना की थी। इस स्थान को त्रिपुररिदेव महागणपति भी कहते हैं।

दक्षिणायन के समय सूर्य की किरणें महागणपति की प्रतिमा पर पड़ती हैं। यह मंदिर पूर्व मुखी है और इसके सामने भव्य प्रवेश द्वार है। इस प्रवेश द्वार पर जय-विजय (वैकुण्ठ के द्वारपाल )की प्रतिमाएं भी हैं।

मूर्तियों को प्राप्त है विशेष महत्त्व

भगवान गणेश जी की अनेक मूर्तियां समूचे भारत में हैं, लेकिन पत्थरों को तराश कर बनाई गई प्राचीन गणेश मूर्तियों की खोज जिस स्थान पर हुई, उन स्थानों को विशेष महत्त्व प्राप्त है, ऐसी श्रेणी के मंदिरों में  अष्टविनायक मंदिरों का समावेश है। हर वर्ष महाराष्ट्र के लाखों गणेश भक्त अष्टविनायक की यात्रा करते हैं। अष्टविनायक के सभी मंदिरों के बीच बहुत ज्यादा फासला नहीं है। दो दिन में सभी अष्टविनायक मंदिर के दर्शन आसानी से किए जा सकते हैं। 

पौराणिक महत्त्व रखने वाले इन अष्टविनायक मंदिरों में स्थापित भगवान गणेश की मूर्तियों की एक खास विशेषता यह है कि ये स्वयंभू हैं। चूंकि ये मूर्तियां स्वयंभू हैं, इसलिए इन्हें विशेष महत्त्व प्राप्त है, ऐसी मान्यता है कि ये मूर्तियां स्वयं प्रकट हुई हैं और इसलिए इनका स्वरूप प्राकृतिक माना जाता है। हिन्दू धर्मग्रंथों की सृष्टि करने वाले भगवान ब्रह्मदेव ने यह भविष्यवाणी की थी कि प्रत्येक युग में भगवान गणेश अलग- अलग रूप लेकर अवतार लेंगे। कृतयुग में भगवान गणेश ने विनायक के रूप में अवतार लिया तो त्रेतायुग में वे मयूरेश्वर के रूप में अवतरित हुए, द्वापर युग में गजानन और ध्रूमकेतु के नाम से अवतरित हुए।

मुद्गल पुराण में मिलता है अष्टविनायक का उल्लेख 

मुद्गल पुराण में अष्टविनायक की आराधना, किए जाने का उल्लेख मिलता है। महाराष्ट्र के मुख्य आराध्य देवता भगवान श्री गणेश के कम से कम दो तीन मंदिर तो हर गांव में हैं। महाराष्ट्र के महापर्व गणेशोत्सव के दौरान भी इन अष्टविनायक के मंदिरों में भक्तों के आने जाने का सिलसिला पूरे दस दिनों तक जारी रहता है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी गणेशोत्सव के दौरान इन मंदिरों में भगवान गणेश के उपासकों का सैलाब उमड़ेगा। महाराष्ट्र के पश्चिम क्षेत्र तथा कोंकण क्षेत्र में स्थित आठ मंदिरों को ‘अष्टविनायक’ नाम दिया गया है। गणपति बुद्धि के देवता हैं, इसलिए भगवान गणेश के भक्त अपने आराध्य देवता को सुखकर्ता, दुखहर्ता तथा रक्षणकर्ता के रूप में देखते हैं।  

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