दुर्गा सप्तशती एक पुस्तक ही नहीं बल्कि माता का जीता जागता आशीर्वाद है। दुर्गा सप्तशती के हर अध्याय का अपना ही महत्त्व है। उन सभी अध्यायों का अगर पूरी श्रद्घा व नियम से पाठ किया जाए तो जीवन में हर सफलता को पाया जा सकता है।

प्रथम अध्याय- अगर आपका जीवन चिंताओं से भरा है, मन में चारों तरफ निराशा ही निराशा है तो प्रथम अध्याय का पाठ करने से मानसिक शांति मिलती है और निराशा दूर होती है।

द्वितीय अध्याय- अगर आप पर कोई भी कोर्ट कचहरी का मुकदमा चल रहा है और आप अकारण ही झूठे आरोपों से घिर गए हैं तो इसके पाठ से आप पर आरोप हट जाएंगे परंतु अगर आपने किसी पर गलत व झूठा केस किया है तो हार आपकी ही होगी।

तृतीय अध्याय- अगर आपके अपने ही शत्रु बनकर खड़े हो गए हों तो ये उनसे आपकी रक्षा करके आपके शत्रुओं को शांत करेगा।

चतुर्थ अध्याय-  माता की भक्ति पाने की कामना अगर लिए आप कुछ करना चाहते हैं तो चतुर्थ अध्याय का पाठ करें, लाभ होगा।

पंचम अध्याय- अगर आप जीवन में परेशान हैं साथ ही आपके अच्छे कर्म होने के बाद भी आपको उसका फल नहीं मिल पा रहा है, पूजा-पाठ से आपका विश्वास उठ रहा हो तो पंचम अध्याय का पाठ करें लाभ होगा।

षष्टम अध्याय- अगर रहु केतु का प्रभाव बढ़ता जा रहा हो, मन में भय समा चुका हो, तंत्र-मंत्र क्रिया से लोग आपको परेशान कर रहे हों तो इसके लिए षष्टïम अध्याय का रोज पाठ करने से राहु-केतु शांत होंगे व ऊपरी बाधा का खतरा भी टल जाएगा।

सप्तम अध्याय- सर्व सुख की कामना के लिए सप्तम अध्याय का पाठ लाभकारी माना गया है।

अष्टम अध्याय- अगर कोई आपसे बिछड़ गया हो, रूठ गया हो और आप उससे पुन: मिलना चाहते हैं तो इस आठवें अध्याय का पाठ करें।

नवम अध्याय- अगर आपका कोई घर छोड़कर चला गया हो और उसके मिलने की आस न हो तो नवम पाठ का अत्यधिक शुद्घता के साथ पाठ करने से खोया व्यक्ति लौट आता है। अगर किसी के पुत्र नहीं है और वे भी पुत्र की कामना के लिए इसका पाठ करें तो पुत्र प्राप्ति होती है।

दशम अध्याय- गुमशुदा व्यक्ति, धन-वैभव व खोए मान-सम्मान की प्राप्ति इस पाठ की मनन करने से होता है साथ ही अगर घर में बच्चे व बड़े गलत मार्ग पर चल रहे हों तो भी ये पाठ फलदायी है।

एकादश अध्याय- व्यापार हानि व धन हानि को रोकने व सम्पत्ति की प्राप्ति के लिए एकादश पाठ लाभ करता है और धन के अपव्यय को भी रोकता है।

द्वादश अध्याय- अगर मान-सम्मान पर लोग वार करते हों, झूठे आरोप लगते हों  इसके साथ ही कुटुम्ब दुश्मन बन गए हों तो इस पाठ को करने से शत्रु शांत होंगे।

त्रयोदश पाठ- अगर आप कोई भी साधना करने के लिए प्रयास कर रहे हैं परंतु लाभ ना मिल रहा हो तो इस पाठ को करें। साधना पूरी होगी।

इस तरह आप नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का पाठ कर अपने जीवन को सुख और समृद्घि से भर सकते हैं।

मां दुर्गा का नवार्ण मंत्र

नवरात्रि में माता की पूजा हमेशा सुखदायी व फलदायी होती है। 

दुर्गा सप्तशती में देवी अर्थवशीर्ष में 20वां मंत्र है ‘ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ ये मां दुर्गा का नवार्ण मंत्र है। इसको मंत्रों का राजा कहते हैं। ये मां दुर्गा का ऐसा मंत्र है जो हर दुख का नाश करता है।

अगर इसके द्वारा मां दुर्गा की उपासना की जाए तो मां की नौ शक्ति जाग्रत होकर नवग्रहों को शांत करती है। देवी उपासना के इस मंत्र का जप इंसान के ग्रह दोषों को भी शांत करता है। ये मां दुर्गा का नौ अक्षरी बीज मंत्र है। इसके जाप से एक ग्रह नहीं बल्कि नौ ग्रहों के कुप्रभाव भी शांत हो जाते हैं। इसको ही नवार्ण मंत्र कहते हैं। नव शक्ति इस मंत्र में समायी है और हर देवी एक ग्रह को शांत करती है। इस मंत्र से मां दुर्गा, मां  काली, मां सरस्वती की कृपा मिलती है। ये मंत्र संयुक्त रूप से कल्याणकारी, फलदायी, शुभकारी होता है।

  • ऐं सरस्वती बीज मंत्र है
  • ह्रीं लक्ष्मी बीज मंत्र है
  • क्लीं महाकाली बीज मंत्र है। इसके जाप से सतोगुणी, तमोगुणी, रजोगुणी तीनों देवी खुश होती है।
  • इस मंत्र के जाप से कुंडली जागरण भी सम्भव है परंतु ये किसी योगगुरु के बिना नहीं करना चाहिए। क्योंकि अगर कुंडली इरा या पिगला में घुस गई तो उससे उत्पन्न पागलपन का कोई इलाज नहीं होगा।
  • ऐं से बुद्घि तेज होती है, ह्रीं से गरीबी दूर होती है मां लक्ष्मी की कृपा मिलती है व क्लीं से मोहमाया दूर होता है। शत्रु शांत होते हैं व हर संकट और ऊपरी बाधा दूर हो जाती है। नवार्ण मंत्र के जाप से माता के नौ रूप एक साथ कृपा बरसाते हैं व नवग्रहों के प्रकोप को शांत करते हैं।

आइए जानते हैं कि कैसे नवार्ण मंत्र अपने आप में पूर्ण है-

नवार्ण मंत्र का हर अक्षर एक-एक ग्रह को शांत करता है। इसके जाप मात्र से नवग्रह शांत हो जाते हैं।

ऐं- ऐं से सूर्य मजबूत होता है। इसके द्वारा माता के प्रथम स्वरूप यानी देवी शैलपुत्री की आराधना होती है।

ह्रीं- ह्रीं से चंद्र मजबूत होता है। इसकेद्वारा माता के द्वितीय स्वरूप यानी देवी ब्रह्मïचारिणी की आराधना होती है।

क्लीं- क्लीं से मंगल ग्रह मजबूत होता है। इसके द्वारा माता के तृतीय रूप यानी देवी चंद्रघंटा की आराधना होती है।

चा- चा से बुध ग्रह मजबूत होता है। इसके द्वारा माता के चतुर्थ रूप यानी देवी कुष्माण्डा की पूजा की जाती है।

मु- मु से गुरु ग्रह मजबूत होता है। इसके द्वारा माता के पांचवे रूप यानी देवी स्कंदमाता की आराधना होती है।

डा- डा से शुक्र ग्रह को मजबूती मिलती है। इसके द्वारा माता के छठे रूप यानी माता कात्यायनी की पूजा की जाती है।

ए- ए से शनि ग्रह को शांत किया जाता है। इसके द्वारा माता के सांतवे रूप यानी माता कालरात्रि की उपासना की जाती है।

वि- वि से राहू ग्रह को शांत किया जाता है। इसके द्वारा माता के आंठवे रूप महागौरी की पूजा की जाती है।

चै-  चै से केतु ग्रह को शांत किया जाता है। इसके द्वारा माता के नवें रूप यानी माता सिद्घीदात्री की पूजा होती है।

माता के नौ नामों का अर्थ इस प्रकार है-

शैलपुत्री- ‘शैल’ का अर्थ है पहाड़। चूंकि पार्वती जी पर्वतों के राजा हिमालय के घर जन्मी थीं इसलिए उनको पर्वत पुत्री यानी शैल पुत्री कहते हैं।

ब्रह्मचारिणी- ये माता का तप का रूप है। इसमें पूर्ण जगत समाया है। ब्रह्मचर्य का पालन करने के कारण ही माता ब्रह्मचारिणी कहलायीं।

चंद्रघंटा- माता के इस रूप में उनके मस्तक पर घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र है इसलिए वो चंद्रघंटा कहलायीं।

कुष्मांडा- ‘कु’ का अर्थ है छोटा। ‘ईश’ का अर्थ है ऊर्जा तथा ‘अंडा’ का अर्थ है गोलाकार। अर्थात विश्व की छोटी सी चीज भी विशाल आकार ग्रहण करने में सक्षम है।

स्कंदमाता- शिवगौरी के पुत्र कार्तिकेय हैं। उनका ही नाम स्कंद है इसलिए इनकी माता होने के कारण ही ये स्कंद माता कहलायीं।

कात्यायनी- महर्षि कात्यायन की तपस्या से खुश होकर जब माता ने उनके घर पर पुत्री रूप में जन्म लिया तो ऋषि कात्यायन ने ही मां दुर्गा के इस रूप की सर्वप्रथम पूजा की जिसके कारण ही इनका नाम कात्यायनी पड़ा।

कालरात्रि- मां दुर्गा का यह रूप अत्यंत भयंकर है। यह रात में जन्मी थीं इनकी पूजा मात्र से काल भी अपना रूप बदल लेता है। ये प्रकृति के क्रोध से उत्पन्न हुईं थीं। इसलिए इनको कालरात्रि कहा गया।

महागौरी- ये रूप बहुत सुंदर, कोमल और करुणा से भरा है। इनका यह रूप इच्छा को पूरी करता है इसलिए इन्हें महागौरी कहा जाता है।

सिद्घीदात्री- समस्त सिद्घियों को देने वाला ये रूप जातक की हर इच्छा को पूर्ण करता है इसलिए इसको सिद्घीदात्री कहते हैं।

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