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Adhyatmik Chikitsa : संपूर्ण विश्व में चिकित्सा की अनेकों विधियां प्रचलित हैं जिनमें से अधिकांश विधियों में दवाईयों द्वारा ही चिकित्सा की जाती है। घरेलू चिकित्सा पद्धति, प्राथमिक चिकित्सा पद्धति, यूनानी पद्धति, आयुर्वेद पद्धति, योग चिकित्सा, एलोपैथी आदि- पद्धतियां शारीरिक रोगों की चिकित्सा पद्धतियां हैं दूसरी ओर मानसिक रोगों की चिकित्सा के लिए मनोचिकित्सा पद्धति है।

किंतु मनोचिकित्सा मन के रोगों के लिए पूर्णतय: सटीक एवं कामयाब नहीं हैं इसलिए कई प्रकार की अन्य पद्धतियों का चलन हुआ जैसे कि रंग चिकित्सा, खुशबू चिकित्सा, क्रिस्टल बॉल, हिप्नोटिज्म आदि इनसे भी पृथक एक और पद्धति प्रचलन में आई जिसे होमिंग पद्धति कहा जाता है। यह पद्धति विश्व के अनेक देशों में प्रचलन में हैं जो धीरे-धीरे भारत में भी आ रही है किंतु अपनी नवीनता के कारण इन्हें संदेह की दृष्टिï से देखा जाता है।

परंतु आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत वर्ष में प्राचीन काल से ही इस प्रकार की अनेक प्रचलित पद्धतियां थीं। जिनसे शारीरिक एवं मानसिक दोनों का एक ही पद्धति से इलाज किया जा सकता था हमारे शास्त्रों में इनका वर्णन किया गया है। ऋषि वशिष्ठï स्पर्श चिकित्सा द्वारा रोगों का नाश कर रोगियों को ठीक किया करते थे। उनकी इस विद्या को वशिष्ठï विद्या कहा जाता है।

उपरोक्त सभी विधियां वर्षों से चलन में हैं परंतु कोई भी विधि पूर्णतया सटीक प्रभावशाली एवं वैज्ञानिक कसौटी पर खरी नहीं उतरती इसलिए मैंने इसे अपने गुरु डॉ. हरिनारायण नवरंग जी के सान्निध्य में वर्षों की कड़ी तपस्या से एक ऐसी मणि तैयार की जिसे दिव्यांतक मणि का नाम दिया जिसका अर्थ यह है कि इस मणि के निर्माण में अनेकों दिव्य औषधियों का सम्मिश्रण किया गया है।

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश ये पांचों तत्त्व हमारे भीतर भी विद्यमान हैं और बाहर प्रकृति में भी विद्यमान हैं इसलिए इनका समूल नाश नहीं होता इसी अवधारणा के आधार पर प्रकृति से उन सभी औषधियों का संकलन किया गया। जिनके सम्मिश्रण से पांचों तत्त्व एक ही स्थान पर संग्रहित किए गए हैं ताकि वे हमारे पांचों तत्त्वों से सामंजस्य स्थापित कर हमारे रोगों का इलाज कर सकें।

इस नवीनतम चिकित्सा पद्धति की विशेषता यह है कि इसकी औषधियां मानव शरीर के संपर्क में आने पर अपने दिव्य गुणों के प्रभाव से स्वत: ही शरीर में प्रवेश कर उन कमियों को पूरी कर देती है जिनके कारण रोग उत्पन्न हुआ है। फिर चाहे वह शारीरिक हो या फिर किसी प्रकार का मानसिक रोग हो। मानव शरीर के संपर्क में लाने के लिए इसे हीलिंग शब्द नाम दिया गया है।

कोई भी नवीन अविष्कार ईश्वर की इच्छा एवं आशीर्वाद के बिना संभव नहीं है इसलिए ईश्वरीय प्रेरणा एवं आशीर्वाद से ओत-प्रोत व्यक्ति ही इसका निर्माण कर सकता है। इसलिए वैदिक मंत्रों एवं विधाओं के द्वारा इन औषधियों की आत्मा यानी वह तत्त्व जो इन्हें दिव्य बनाता है संग्रहित किए गए एवं उन्हें ठोस आकार में बनाया गया। भगवान शिव केवैदिक मंत्रों द्वारा इसकेसभी संस्कार पूर्ण किए गए।

उदाहरण के लिए घृत कुमारी यानी ऐलोवेरा जिसमें 18 धातुएं पाई जाती हैं जिसका सेवन करने से शरीर में धातुओं की कमी को पूरा किया जाता है। जबकि इस नवीन पद्धति में बिना सेवन किए ही दिव्यांतक मणि के माध्यम से धातुओं की पूर्ति हो जाती है। इसी प्रकार अन्य दिव्य औषधियों से भी उनके गुण तत्त्व रूप में संकलित किए गए हैं। दिव्यांतक मणि सांसारिक औषधीय तकनीक न होकर दिव्य आध्यात्मिक मणि है इसलिए यह औषधियों के साथ-साथ अनेक विद्याओं से सुसंस्कृत है, जिनमें श्री विद्या वशिष्ठï विद्या आदि प्रमुख हैं।

इस चमत्कारिक मणि की दिव्यता इसे ‘न भूतों न भविष्यति को पूर्णतया चरितार्थ करती है। अब तक इस मणि के द्वारा हीलिंग करने से अनेक लोगों के रोग, शोक, दुख व संताप नष्टï हो गए हैं। गंभीर से गंभीर रोग भी इसके प्रभाव से नष्टï हो जाते हैं।

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