इसे थोड़ा समझना पड़ेगा। असल बात यह है, इस जगत में, इस जीवन में कोई भी घटना इतनी सरल नहीं है जिसको तुम एक ही तरफ से देखो और समझ लो, उसे बहुत तरफ से देखना पड़े। अब जैसे मैं इस दरवाजे पर जाऊं और जोर से एक हथौड़ा मारूं और दरवाजा खुल जाए, तो मैं यह कह सकता हूं कि मेरे हथौड़े से दरवाजा खुला और यह कहना एक अर्थ में सच भी है, क्योंकि मैं अगर हथौड़ा नहीं मारता तो दरवाजा अभी खुलता नहीं था लेकिन इसी हथौड़े को मैं दूसरे दरवाजे पर मारूं और दरवाजा न खुले, हथौड़ा ही टूट जाए- तब? तब तुम्हें दूसरा पहलू भी खयाल में आएगा कि जब एक दरवाजे पर मैंने हथौड़ा मारा और दरवाजा खुला, तो सिर्फ हथौड़े के मारने से नहीं खुला, दरवाजा भी खुलने के लिए पूरी तरह तैयार था, क्योंकि दूसरा दरवाजा नहीं खुला। किसी भी कारण से तैयार था-कमजोर था, जरा जीर्ण था,पर उसकी तैयारी थी। यानी खुलने में सिर्फ हथौड़ा ही नहीं खोल दिया है उसे, दरवाजा भी खुला, क्योंकि और दूसरे दरवाजों पर हथौड़े की चोट करके देखी है तो हथौड़ा ही टूट गया है कहीं, कहीं हथौड़ा नहीं टूटा, न दरवाजा खुला, कहीं हम थक गए चोट कर-कर के, वह नहीं खुला।
तो इस घटना में जहां शक्तिपात से कुछ घटना घटती है, वहां शक्तिपात से ही घटती है, इस भ्रांति में नहीं पडऩे की जरूरत है। वहां वह दूसरा व्यक्ति भी किसी बहुत आंतरिक तैयारी के एक छोर पर पहुंच गया है, जहां जरा सी चोट सहयोगी हो जाती है। नहीं यह चोट लगती तो शायद थोड़ी देर लग सकती थी। तो इस शक्तिपात से जो हो रहा है वह कुंडलिनी सहस्रार तक नहीं पहुंच रही, इस शक्तिपात से इतना ही हो रहा है कि टाइम एलिमेंट जो है, समय का जो थोड़ा व्यवधान था, वह कम हो रहा है, और कुछ भी नहीं हो रहा। यह आदमी पहुंच तो जाता ही। समझ लो कि मैं इस हथौड़े से चोट नहीं मारता इस दरवाजे पर, और यह जराजीर्ण दरवाजा, यह बिलकुल गिरने को हो रहा है, कल हवा के थपेड़े से गिर जाता। हवा का थपेड़ा भी न आता, क्योंकि दरवाजे का भाग्य- न आए, हवा का थपेड़ा ही न आए उस तरफ- तो क्या तुम सोचते हो, यह दरवाजा खड़ा ही रहता? यह दरवाजा जो एक ही चोट से गिर गया, जो हवा के थपेड़े से डरता था कि गिर जायेगा, यह बिना हवा के थपेड़े के भी एक दिन गिर जाएगा।
जब तुम्हें कारण भी बताना मुश्किल हो जाएगा कि किसने गिराया,तब यह अपने से भी गिर जाएगा, यह गिरने की तैयारी इकट्ठी करता जा रहा है। तो ज्यादा से ज्यादा जो फर्क लाया जा सकता है, वह सिर्फ समय की परिधि का, टाइम गैप का। जो घटना रामकृष्ण के पास अगर विवेकानंद को घटी, उसमें अगर अकेले रामकृष्ण ही जिम्मेवार हैं, तो फिर और किसी को भी घट जाती, बहुत लोग उनके करीब गए। सैकड़ों उनके शिष्य हैं। तो और किसी को नहीं घट गई है और अगर विवेकानंद ही जिम्मेवार थे अकेले, तो वे रामकृष्ण के पहले और बहुत लोगों के पास गए थे, उनके पास वह नहीं घटी थी। समझ रहे हो न? तो विवेकानंद की अपनी एक तैयारी थी, रामकृष्ण की अपनी एक सामथ्र्य थी, यह तैयारी और यह सामर्थ्र्य किसी बिन्दु पर अगर मिल जाएं, तो टाइम गैप कम हो सकता है। विवेकानंद, हो सकता है अगले जन्म में यह घटना घटतीवर्ष भर बाद घटती, दो वर्ष बाद घटती, दस जन्मों बाद घटती- यह सवाल नहीं है, इस व्यक्ति की अपनी भीतरी तैयारी अगर हो रही थी तो घटना घटती। टाइम गैप कम हो सकता है और समझने की बात यह है कि टाइम बड़ी ही फिक्टीशस, बड़ी मायिक घटना है, इसलिए उसका कोई बहुत मूल्य नहीं है। असल में, समय इतनी ज्यादा स्वप्निल घटना है कि उसका कोई बड़ा मूल्य नहीं है। अभी तुम एक झपकी लो और हो सकता है कि घड़ी में एक ही मिनट गुजरे और तुम जागकर कहो कि मैंने इतना लंबा स्वपन देखा कि मैं बच्चा था, जवान था, बूढ़ा हुआ, मेरे लड़के थे, शादी हुई, धन कमाया, सट्टे में हार गया यह सब हो गया! और यहां बाहर हम कहें कि यह तुम कैसी बातें कर रहे हो, इतना हो, इतना लंबा सपना देखने के लिए भी वक्त लगेगा, क्योंकि अभी तुम एक सेंकेंड तुम्हारी आंखें बंद हुई है सिर्फ, तुमने झपकी भर ली है। असल में ड्रीम टाइम जो है, स्वपन का जो समय है, उसकी यात्रा बहुत अलग है।
वह बहुत छोटे से समय में बहुत घटनाएं घटाने की उसकी संभावना है, इसलिए हमें बड़ी भ्रांति होती है। अब ये कुछ कीड़े हैं जो कि पैदा होते हैं सुबह और सांझ मर जाते हैं। हम कहते हैं, बेचारे! लेकिन हमें यह पता नहीं कि उनका टाइम का जो अनुभव है, वह उतना ही है जितना हमें सत्तर साल में होता है। कोई फर्क नहीं पड़ता। वे इस बारह घंटे में वह सब काम कर लेते हैं- घर बना लेते हैं, पत्नी खोज लेते हैं, शादी-विवाह रचा लेते हैं, लड़ाई-झगड़ा कर लेते हैं- जो भी करना है, सब कर-करा के सांझ मर जाते हैं। इसमें कुछ कमी नहीं छोड़ते, इसमें सब हो जाता है।
इसमें शादी-विवाह, तलाक, लड़ाई-झगड़ा, सब घटना घटा-घटा कर वे संन्यास वगैरह भी सब कर डालते हैं, सुबह से सांझ तक! पर वह जो समय का उनका जो बोध है, उसमें फर्क है। इसलिए हमें लगता है, बेचारे! और वे अगर सोचते होंगे तो हमारे बाबत सोचते होंगे कि जो हम बारह घंटे में कर लेते हैं, तुमको सत्तर साल लग जाते हैं-बेचारे! इतना काम तो हम बहुत जल्दी निपटा लेते हैं, इन लोगों को क्या हो गया! कैसी मंद बुद्धि के हैं, सत्तर साल लगा देते हैं! समय जो है वह बिल्कुल ही मनोनिर्भर, मेंटल एनटाइटी है। इसलिए हम भी हमारे मन के अनुसार समय का अनुपात छोटाबडा होता रहता है। जब तुम सुख में होते हो, समय एकदम छोटा हो जाता है, जब तुम दुख में होते हो, समय एकदम लंबा हो जाता है।
घर में कोई मर रहा है और तुम उसकी खाट के पास बैठे हो, तब रात बहुत लंबी हो जाती है, कटती ही नहीं। ऐसा लगता है कि अब यह रात कभी खत्म होगी कि नहीं होगी, सूरज उगेगा कि नहीं उगेगा। रात इतनी लंबी होती जाती है कि लगता है कि अब नहीं, यह आखिरी रात है! अब यह कभी होगा नहीं, सूरज उगेगा नहीं! दुख समय को बहुत लंबा कर देता है, क्योंकि दुख में तुम जल्दी से समय को बिताना चाहते हो, तुम्हारी अपेक्षा जल्दी की हो जाती है। तुम्हारा एक्सपेक्टेशन है कि जल्दी बीत जाए।
जितनी तुम्हारी अपेक्षा तीव्र हो जाती है, समय उतना मंदा मालूम पडऩे लगता है, क्योंकि उसका अनुभव रिलेटिव है। जब तुम्हारी अपेक्षा बहुत तीव्र होती है, वह तो अपनी गति से चला जा रहा है, पर तुम्हें ऐसा लगता है कि बहुत धीमे जा रहा है। जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेयसी से मिलने बैठा है और वह चली आ रही है। वह तो चाहता है कि बिलकुल दौड़ती हुई जेट की रफ्तार से आओ, लेकिन वह आदमी की रफ्तार से आ रही है। तो उसे लगता है, कैसी मंद गति चल रही है! तो दुख में तुम्हारा समय का बोध एकदम लंबा हो जाता है। सुख आता है, तुम्हारा मित्र मिलता है, प्रियजन मिलता है, रात भर जागकर तुम गपशप करते रहते हो, सुबह विदा होने का वक्त आता है, तुम कहते हो, रात कैसे बीत गई क्षण भर में! यह तो आई न आई बराबर हो गई!
ऐसा लगता ही नहीं कि आई भी। सुख में तुम्हारे समय का बोध एकदम भिन्न हो जाता है, दुख में भिन्न हो जाता है। तो तुम्हारी मनोनिर्भर इकाई है समय। इसलिए इसमें तो फर्क पैदा ही किए जा सकते हैं, क्योंकि तुम्हारे मन तक तो चोट की जा सकती है। इसमें कोई कठिनाई नहीं है। अगर मैं तुम्हारे सिर पर लात मार दूं तो तुम्हारा सिर खुल जाता है। तो अब तुम क्या कहोगे कि तुम्हारा सिर एक आदमी ने खोल दिया, उस पर निर्भर हो गए तुम! हो ही गए निर्भर। तुम्हारे शरीर को चोट की जा सकती है, तुम्हारे मन को भी चोट की जा सकती है। हां, तुमको चोट नहीं की जा सकती, क्योंकि तुम न शरीर हो, न तुम मन हो। लेकिन अभी तुम मन पर ठहरे हुए अपने मन मान रहे हो, या अपने को शरीर मान रहे हो, तो इन सबको तो चोट की जा सकती है। और इनकी चोट से तुम्हारे समय के अंतर को बहुत कम किया जा सकता है- कल्पों को क्षणों में बदला जा सकता है, क्षणों को कल्पों में बदला जा सकता है।
