kankalitala
कंकालीतला शक्ति पीठ

देश के 51 शक्ति पीठों में से एक कंकालीतला शक्ति पीठ है, जो पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन के पास स्थित है। कहा जाता है कि देवी सती का कमर वाला हिस्सा यहीं गिरा था। अन्य मंदिरों से काफी अलग यहां का माहौल बेहद शांत और कोलाहल से कोसों दूर है। यहां मां काली के रूप मां कोंकली की पूजा की जाती है। 

शांतिनिकेतन के पास स्थित है कंकालीतला

गांव के किनारे बसा है कंकालीतला शक्ति पीठ

टैगोर का स्थान शांतिनिकेतन विश्व भर में प्रसिद्ध है। भारत सरकार इसे धरोहर घोषित कर चुकी है। देश-विदेश से लोग इस स्थल को देखने और महसूस करने आते हैं। लेकिन इससे कुछ ही दूरी पर स्थित कंकालीतला शक्ति पीठ देखने कम लोग ही जाते हैं। कोपई नदी के किनारे स्थित यह शक्ति पीठ शहरों के कोलाहल से काफी दूर है। बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि कंकालीतला शक्ति पीठ गांव के किनारे बसा है। यहां लोगों की पहुंच बहुत ज्यादा नहीं है। कुछ साल पहले तक तो यहां पहुंचने के ठीक-ठाक रास्ता तक नहीं था।

कंकालीतला के पीछे की पौराणिक कथा 

मां कोंकली

देश भर में स्थित कुल 51 शक्ति पीठों में से एक शक्ति पीठ कंकालीतला भी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सतयुग में राजा दक्ष ने भगवान शिव से बदला लेने के लिए यज्ञ का आयोजन किया था। दरअसल उनकी बेटी सती ने उनकी इच्छा के खिलाफ योगी शिव से ब्याह कर लिया था। इस यज्ञ के लिए दक्ष ने शिव-सती को छोड़कर सभी को आमंत्रित किया था। सती द्वारा जिद किए जाने पर शिव ने अपने गणों के साथ सती को वहां भेज दिया। सती का वहां स्वागत नहीं हुआ। बल्कि दक्ष ने शिव का अपमान किया। इससे दुखी होकर सती ने खुद को समाप्त कर लिया। इस तकलीफ से दुखी शिव ने दक्ष का सिर काटकर उसके स्थान पर बकरी का सिर लगा दिया। बावजूद इसके वह इतने दुखी थे कि सती के शरीर को लटकाकर उन्होंने तांडव नृत्य करना शुरू कर दिया। देवों द्वारा उन्हें रोकने की नाकाम कोशिश के बाद भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के कई हिस्से कर दिए। सती के शरीर के हिस्से जहां- जहां गिरे, उस स्थल को शक्ति पीठ कहा गया। इनमें से ही एक शक्ति पीठ कंकालीतला है, जहां देवी सती का कमर गिरा था। बांग्ला में कमर को कांकल कहा जाता है। 

कंकालीतला मंदिर की विशेषता 

कंकालीतला मंदिर

कंकालीतला मंदिर को पई नदी के किनारे स्थित है। यहीं पर शमशान घाट भी है, जहां कई बड़े तांत्रिकों की समाधि भी है। यह स्थान तंत्र- मंत्र विद्या के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां के निवासी बताते हैं कि कई बड़े तांत्रिकों ने यहीं अपनी सिद्धि को प्राप्त किया। कंकालीतला मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं बल्कि मां कोंकली की एक तस्वीर (ऑयल पेंटिंग) केवल है। मां कोंकली मां काली का रूप ही हैं। जाहिर सी बात है मां कोंकली का यह रूप मां काली से काफी हद तक मिलता-जुलता है। वही रक्त रंजित लंबी सी जिह्वा और रौद्र रूप! मां कोंकली को सालों से इस जगह पर पूजा जाता है। यह मंदिर काफी छोटा और सादा है, बिना किसी प्रसिद्धि से दूर। खूबसूरती के लिहाज से यह मंदिर दिखने में बेहद सादा है। न तो कोई नक्काशी की गई है और न ही कोई शोर- शराबा। यहां के एक पेड़ पर श्रद्धालु अपनी इच्छाओं के पूरा करने की चाह में टूटे हुए ईंट के टुकड़ों को भी बांधते हैं। 

कंकालीतला मंदिर के आस-पास 

बोल गायक

कंकालीतला में एक अन्य महत्वपूर्ण स्थान मंदिर के पीछे स्थित छोटा सा तालाब है। किंवदन्तियों के अनुसार, सती मां के शरीर का हिस्सा कमर इसी तालाब में समाहित हुआ था। इस जगह पर मां सती की कमर गिरने से गड्ढा हुआ था और बाद में यहां पानी भर गया। कहा जाता है कि इस पानी के नीचे अब भी उनकी कमर समाहित है। यही वजह है कि यहां के स्थानीय निवासियों के लिए यह तालाब धार्मिक नजरिए से काफी मायने रखता है।

सती मंदिर के बाहर लगे वृक्षों पर प्रार्थना में उपयोग होने वाली मालाएं लटकी रहती हैं। मंदिर के बाहर वाले परिसर में बोल गायक और सिद्ध बाबाओं की भीड़ जमी रहती है। लंबे- बेतरतीब बढ़े बाल लगभग जटाओं से, केसरिया रंग का साफा बांधे, तुलसी की मालाएं पहने इन बोल गायकों के गले जब सुर में बंध जाते हैं तो फिर क्या कहने! ये बोल गायक मुख्यत: बंगाली भाषा में ही गाते हैं। गीतों के जरिए ये अपने दिल में छिपी भावनाएं निकाल देते हैं।

कंकालीतला मंदिर के अंदर 

मंदिर के भीतर

मंदिर से पहले ही प्रसाद के लिए कई छोटी दुकानें सजी रहती हैं। यहां प्रसाद के रूप में परंपरागत बंगाली मिष्ठान्न के अलावा गुड़हल के लाल फूल की माला भी मिलती है। गुड़हल का लाल फूल मां कोंकली को विशेष तौर पर चढ़ाया जाता है। प्रसाद लेकर जैसे ही आप मंदिर के भीतर जाएंगे, वहां बैठे पुजारी आपका और आपके अपनों का नाम लेकर पूजन विधि शुरू  कर देते हैं। फिर आप अपने पूरे लंबे-चौड़े परिवार के हर सदस्य का नाम बताना चाहें। शायद इतनी तल्लीनता से पूजा यहीं होती है। मंदिर से बाहर निकलते ही परिसर और पेड़ों के नीचे बने चबूतरे पर श्रद्धालु बैठे रहते हैं। छोटे बच्चों सहित कई बड़े लोग भी हाथ फैलाए प्रसाद मांगने लगते हैं। अन्य मंदिरों की तरह यहां बैठे बाबा आपका भविष्य देखने को तैयार रहते हैं।

कंकालीतला मंदिर की कोलकाता से दूरी 

शांत माहौल

बीरभूम जिले के बोलपुर में स्थित यह शक्ति पीठ बोलपुर रेलवे स्टेशन से नौ किलोमीटर की दूरी और शांतिनिकेतन से करीब बारह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यूं तो यह स्थान साल के बारहों महीने शहरों के कोलाहल से दूर है लेकिन दोपहर के वक्त सोया जान पड़ता है। दरअसल दोपहर के वक्त बंगाली सोना ही पसंद करते हैं। कोलकाता से इस जगह की दूरी ढाई घंटे दूर है और दुर्गापुर से करीब एक घंटे। 

Leave a comment