हम सब जानते और मानते हैं कि हिन्दी संस्कृति में प्रसाद का अहम स्थान है। सिर्फ प्रसाद के लिए कई तरह के रीति- रिवाजों का पालन किया जाता रहा है। इन्हें ही देवी- देवताओं को चढ़ाया जाता है और बाद में श्रद्धालुओं के बीच भोग के तौर पर वितरित कर दिया जाता है। इस मामले में यह काली मंदिर अपने यूनिक प्रसाद और डॉ संस्कृतियों के मिलन का एक खूबसूरत गवाह बनकर खड़ा है।

कब और किसने बनाया यह काली मंदिर

यह माना जाता है कि इस काली मंदिर का निर्माण तब हुआ, जब 1930 के युद्ध के समय चीन से कई चाइनीज रेफ्यूजी भारत आ गए थे। ये प्रवासी कोलकाता के टांगरा इलाके में रहने लगे और वहां की संस्कृति में थोड़ा बदलाव लेकर आए। लोगों का यह विश्वास है कि करीब 60 साल पहले एक चाइनीज प्रवासी को सपने में मां काली के दर्शन हुए, जिसके बाद से उसने अन्य निवासियों के साथ मिलकर इस मंदिर का निर्माण करवाना शुरू कर दिया था।

एक अन्य कथा

कुछ रिपोर्ट बताते हैं कि यह मंदिर 80 साल पुराना है। यहां एक पेड़ के नीचे सिंदूर लगे दो ग्रेनाइट पत्थरों की हिन्दू लोग पूजा करते थे। इस समय तक यहां मंदिर नहीं बना था। करीब 20 साल पहले, टांगरा के हिन्दी और चाइनीज लोगों ने मिलकर इस कालीबाड़ी का निर्माण करवाया।

इस मंदिर से जुड़ी एक अन्य कथा भी लोग कहते हैं। इसके अनुसार एक 10 साल का चाइनीज बच्चा बीमार पड़ गया था। उसकी सेहट में कोई सुधार नहीं आ रहा था, उसे कोई भी ठीक करने में असमर्थ था। अंतिम विकल्प के तौर पर, उस बच्चे के माता- पिता उन पत्थरों के पास लेट गए और उन्होंने अपने बच्चे के लिए देवी मां से प्रार्थना की। कुछ ही दिनों में वह बच्चा ठीक हो गया। यह सब उनके और उस जगह के अन्य लोगों के लिए चमत्कार से कम नहीं था। तब से लेकर आज तक इस स्थान का चाइनीज लोगों के बीच महत्व बढ़ गया।

चाइना टाउन का चाइनीज कालीबाड़ी

यहां चाइनीज लोगों की जनसंख्या इतनी ज्यादा है कि अब टांगरा को चीन टाउन के नाम से जाना जाने लगा है। यहां के अधिकतर लोग बुद्ध भगवान को मानते हैं या फिर क्रिश्चन हैं। लेकिन काली पूजा के दौरान इसका कुछ भी पता नहीं चलता। 1998 में इस मंदिर को एक नया रूप मिला और ग्रेनाइट में यह मंदिर बड़ा बन गया। इसके निर्माण में हर चाइनीज परिवार ने दान दिया। यहां काली मां की मूर्ति के साथ शंकर भगवान और मां काली की कई छोटी मूर्तियां दिख जाएंगी।

इस जगह को अब चाइना टाउन के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि, प्रावासियों ने स्थानीय सांकृति को खत्म नहीं किया, सिर्फ कुछ बदलाव लेकर आए, और इस मेल- मिलाप ने हमें हमारा फेवरेट कुजीन दिया। इस कुजीन को आज हम इंडो- चाइनीज कुजीन कहते हैं, पॉपुलर भाषा में देसी चाइनीज।

प्रसाद में चाइनीज फूड्स

 

अन्य काली मंदिर की तरह बने इस काली मंदिर में भी सभी रीति- रिवाज किये जाते हैं। लाल गुड़हल के फूलों की माला देवी को चढ़ाई जाती है, उन्हें पोशाक भी पहनाई जाती है और बाकी रिवाज भी किये जाते हैं। लेकिन इस मंदिर को जो एक चीज बाकी काली मंदिर से अलग करती है, वह है पूजा के बाद मिलने वाले अलग प्रसाद। यहां प्रसाद में मां काली को नूडल्स, चौपसी, स्टर फ्राइड वेजीटेबल, चाइनीज राइस और मोमोज चढ़ाए जाते हैं। यहां तक कि काली मां को रोजाना चढ़ाने वाले प्रसाद भी मिठाइयां, बिस्कुट और फूल होते हैं।

अगरबत्ती नहीं कैन्डल

चाइनीज लोग इस मंदिर में जिस तरह प्रसाद में चाइनीज फूड्स मां काली को अर्पित करते हैं, वैसे ही दुष्ट आत्माओं को भगाने के लिए यहां पेपर के बने कैंडल्स का प्रयोग किया जाता है, जैसे चाइनीज चर्च में किया जाता है। यहां प्रणाम भी चाइनीज स्टाइल में किया जाता है। यहां का माहौल आपको बाकी काली मंदिर से अलग लगेगा। हाँ, यहां रोजाना असुबह और शाम की आरती करने के लिए एक बंगाली पंडित जरूर आते हैं।

काली पूजा का माहौल

काली पूजा की रात यहां लंबे- लबे कैंडल्स जलाए जाते हैं। स्पेशल चाइनीज अगरबत्ती भी यहां लाकर जलायी जाती हैं, जिसकी खुशबू अलग होती है। दिवाली के समय आपको यहां की छटा ही अलग देखने को मिलेगी। कोलकाता के अन्य इलाकों की तरह चाइना टाउन भी मां काली की भक्ति में रम जाता है। इस मंदिर में हजारों की संख्या में लोग इकट्ठा होकर काली मां की पूजा- अर्चना करते हैं।

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