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प्रेत बाधा से मुक्त कराए पीताम्बरा शक्ति पीठ: Pitambara Peeth
Pitambara Peeth

Pitambara Peeth: पीताम्बरा शक्तिपीठ दतिया में स्थित भक्तों की आस्था का केन्द्र है। भक्तों का मानना है कि
देवी पीताम्बरा सबकी मनोकामना व इच्छा पूर्ण करती हैं। मंदिर का क्या है प्राचीन इतिहास? आइए
जानते हैं लेख से।

उत्तर प्रदेश के झांसी शहर के पास मध्य प्रदेश का एक छोटा सा जनपद है- दतिया, जो अपनी आध्यात्मिक संचेतना से छोटी काशी के रूप में प्रसिद्ध है। इस शहर के बारे में एक अति प्रसिद्ध कहावत है- ‘झांसी गले की फांसी दतिया गले का हार, ललितपुर कबहुं न छोड़िये, जब तक मिले उधार। जन-जन के गले का हार दतिया आज समूचे विश्व में प्रसिद्ध तांत्रिक सिद्धपीठ- पीताम्बरा पीठ
के कारण जाना जाता है।

इस पीठ पर यहां की अधिष्ठात्री देवी भगवती पीताम्बरा (बगलामुखी) और पीठ के संस्थापक पूज्यपाद श्री श्री एक हजार आठ श्री स्वामी जी महाराज की असीम कृपा है। यहां पर समस्त देवीय शक्तियां प्रतिपल विद्यमान रहती है। इस बात को यहां से दीक्षित साधक प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर
लाभान्वित होते हैं जिससे इस कलिकाल में आध्यात्मिक शक्तियों के प्रति उनकी आस्था दृढ़ से दृढ़तर होती चली आती है।

इस पीठ के संस्थापक श्री स्वामी जी महाराज एक सर्वतन्त्र स्वतंत्र, अखंड ब्रह्मचारी संत थे। वे शंकर भगवान के अवतार थे, उन्होंने वर्तमान पीठ जो पहले श्मशान भूमि थी, को महाभारत कालीन गुरु
द्रोणाचार्य के अमृतजीवी पुत्र अश्वत्थामा के कहने पर अपनी लीला भूमि बनाया। उन्होंने तपोबल से इसे शुद्ध करके यहां पीताम्बरी माता के पवित्र विग्रह को स्थापित किया। तंत्र के अनुसार शक्ति मतानुपायी दस महा विद्याएं मानते हैं। काली, तारा, षोडषी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, घूमावती
बंगला, मातंगी और कमला। देवी बगलामुखी स्तम्मन और सम्मोहन की मातृशक्ति हैं। दस महाविद्याओं में सबसे उग्र घूमावती को पीताम्बरा पीठ में स्थान देने का श्रेयी पूज्य पाद श्री स्वामी जी को है। श्मशान वासिनी श्री घूमावती की गति अनुलोभ है ये संसार को अपनी भयंकरी शक्ति द्वारा उनके कर्मों के अनुसार दंडित करती हैं। अपने तामसी रूप में प्रतिष्ठित श्री घूमावती का शरीर कंकाल मात्र है। इनका रंग काला विधवा वेश और वाहन कौआ है। समूचे विश्व में मां घूमावती
का यह एक मात्र मंदिर है। यहां पर प्रात: व संध्या के समय ही मां के दर्शन होते हैं। शेष समय श्री विग्रह पर काला परदा पड़ा रहता है। महाराज जी के समय में पीठ पर प्रतिदिन उनके द्वारा की जाने वाली पीताम्बर माता की आरती के साथ पंक्तिबद्ध होकर ग्रहण करने आती थीं। इस घटना को पुराने साधक जानते हैं। अनेक वर्षों बाद घूमावती माई ने महाराज जी को दर्शन दिए और कहा।

‘हमने तुम्हारा काम कर दिया, अब तुम हमारा काम करो। उन्होंने पीठ में अपना मंदिर बनवाने का आदेश दिया। ऐसा ही एक आदेश शाक्त धर्म के आधाचार्य भगवान परशुराम ने महाराज जी को दिया
था। अत: दोनों शक्तियों को पीताम्बर पीठ में ससम्मान स्थान दिया गया। पीताम्बरा पीठ में अन्य देवी देवताओं के भी मंदिर हैं। इस दिव्य स्थल पर आस्था, श्रद्धा और विश्वास एवं भक्ति भावना से आए
दर्शनाॢथयों को मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। यहां आने वाले असाध्य रोगी, भूत-प्रेतादि कष्टों तथा घोर पाप से भी मुक्ति मिल जाती है। यह पीठ सच्चे अर्थों में तन्त्र पीठ का अहसास कराती है।
जगदम्बा पीताम्बरा के दरबार में प्रवेश करते ही आपको लगेगा कि आप किसी सिद्धपीठ में आ गए। सायंकाल भारी संख्या में भक्तगण मां के दर्शनार्थ आते हैं। जगदम्बा का दरबार सिद्ध है। 2 में विद्यमान है। निश्चय ही इसी कारण भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती है होगी। मां पीताम्बरा सभी का कल्याण करें।

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