Wow Deepak
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दीपक का स्नेह समाप्त हो गया। रुई की बाती चहुं ओर धीमा-धीमा प्रकाश छोड़ रही थी। अन्तिम लौ तीव्रता से चमकी और शून्य में विलीन हो गयी।

बुझते दीपक के सम्मुख एक प्रश्न था बन्धु अभी तक तो तुम मंद-मंद जल रहे थे और अब एक साथ अपनी तीव्रतम लौ से वातावरण को अलौकिक कर बुझ गए ऐसा क्यों?, दीपक ने धूम्र को वक्र रेखा बनाते हुए कहा- “अन्तिम समय भी मेरा प्रयास यह था कि संपूर्ण शक्ति लगाकर इतना प्रकाश फैला दूं कि यदि अंधकार से कोई जीव भटक रहा हो तो उसे मार्ग दिखाई दे जाए।”

ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंAnmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)