Hindi Kahani: “स्नेहा भाभी जल्दी कीजिए। अभी तक आप तैयार नहीं हुईं, सभी औरतें पूजा के लिए बैठी हुई हैं।”
“क्यों बुला रही है उसको। क्या उसका पति अब है इस दुनिया में? जो वो उसके लिए यह करवाचौथ का व्रत करेगी। वो है कि उसका इंतजार कर रही है। हमें तो पक्का पता है वो उस दुर्घटना में मारा गया है। ये तो वो अपने सजने धजने के कारण ही खुद को विधवा नहीं मानती। पर तूं तो समझदार है। खुद जाकर देखा था ना तूने उस ट्रेन एक्सिडेंट के बाद कितने लोग मारे गए। तेरा भाई भी तो उसी ट्रेन से जा रहा था।”
“नहीं आप लोग झूठ बोलते हो… भाई जिंदा है। मृतकों की सूची में भाई का नाम नहीं था वो कोई दूसरा सुशांत होगा जो मरा था… ना ही भाई की लाश मिली थी। कैसे मान लें हम कि वो अब इस दुनिया में नहीं है।”
“अरे! मर गया है तेरा भाई। तुम दोनों ननद भाभी को ना जाने क्या हो गया है? किस भ्रम में जी रहे हो। पति के मरने के बाद भी वो हम सुहागिनों के साथ पूजा पर बैठेंगी। ऐसा नहीं हो सकता।”
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“ऐसा मत कहिए चाचीजी मेरी भाभी का विश्वास है कि भईया जहां भी हैं ठीक हैं।”
“गुड़िया मत बहस कर किसी से। चल आ मेरे साथ हम अपने कमरे में ही पूजा कर लेंगे और छत पर जाकर चांद देख लेंगे। तुम्हारे भइया जरूर आएंगे।”
लाल रंग की साड़ी पहने, मेंहदी लगे हाथों में शादी वाला लाल चूड़ा, माथे पर लाल बिंदी और सिंदूर से भरी मांग, गले में मंगलसूत्र के साथ हल्का सा मेकअप किए स्नेहा हाथ में पूजा की थाल लिए नीचे आंगन में आई जहां सभी औरतें करवाचौथ की पूजा कथा के लिए बैठीं थीं जो स्नेहा को देखते ही खड़ी होकर वहां से जाने लगीं।
“भाभी आप आ गईं। देखिए ना ये लोग क्या उल्टा सीधा बोल रहीं हैं भईया के बारे में।”
स्नेहा ने सबके आगे हाथ जोड़ लिए।
“माफ कीजिएगा मेरी गुड़िया को कुछ मत कहिए। हम इस पूजा में आपके साथ नहीं बैठेंगी। आप लोग कहीं मत जाइए। हर साल की तरह यहीं बैठकर पूजा कीजिए।”
“हम बैठने देंगे एक विधवा को अपने साथ इस पूजा में तब ना। हम जा रहीं हैं। कहीं और जाकर कथा कर लेंगी।”
“प्लीज़ चुप हो जाइए आप सब। जब गुड़िया बोल रहीं हैं कि उनके भाई जिंदा हैं तब आप लोग क्यों आज के दिन अशुभ शब्द अपने मुंह से निकाल रहीं हैं।”
अपनी ननद गुड़िया का हाथ पकड़े स्नेहा अपने कमरे में आ गई।
“भाभी वो लोग झूठ बोल रहीं थीं ना… भाई जिंदा है ना। वो आएगा मुझे विश्वास है। आपने उसकी लंबी उम्र के लिए व्रत रखा है। आप का सुहाग सही सलामत है। भाई को कुछ नहीं हुआ है वो ठीक है। वो उस ट्रेन हादसे में बच गया था।”
गुड़िया रोते रोते अपनी भाभी की गोद में सो गई और स्नेहा अपने पति सुशांत की यादों में खो गई।
दोनों ने प्रेम विवाह किया था। सुशांत के माता-पिता की भी एक रेल दुर्घटना में ही मौत हो गई थी । सुशांत ने ही उसे बताया था। दोनों भाई बहन ही एक दूसरे का सहारा थे। फिर स्नेहा सुशांत की जिंदगी में आई तो तीनों का जीवन बहुत ही आनंद से बीत रहा था।
सुशांत स्नेहा को बहुत प्यार करता था वो कहता था…
” प्यार में बहुत शक्ति होती है स्नेहा मुझे विश्वास है कि तुम्हारा प्यार मुझे मौत के मुंह से भी बचा लेगा। जैसे सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान को छीन लिया था तुम भी यमराज से लड़ जाओगी मेरे लिए।”
स्नेहा अपनी ननद गुड़िया को अपनी छोटी बहन की तरह मानती थी। दोनों ननद भाभी के प्यार को देखकर सुशांत मज़ाक में कहता…
“ओए गुड़िया स्नेहा मेरी बीबी है। मेरे खिलाफ भड़काती तो नहीं है तू इसे।”
“भाई आपकी तो सिर्फ पत्नी हैं पर भाभी तो मेरी मां, बहन, टीचर और सहेली सब कुछ हैं।”
उस दिन सुशांत को इंटरव्यू के लिए बनारस युनिवर्सिटी जाना था जिसका वो बहुत समय से इंतजार कर रहा था पर ना जाने क्यों वो सुबह से ही बेचेन था।
इतनी अच्छी पोस्ट के लिए उसे मौका मिला था पर उसका जाने का मन नहीं कर रहा था कुछ अनहोनी होने की आशंका उसे सता रही थी।
“आप भी ऐसे ही चिंता कर रहे हैं। आराम से जाईए बस कुछ दिनों की ही तो बात है। मैं गुड़िया का पूरा ध्यान रखूंगी। आप बिल्कुल भी चिंता मत कीजिए।”
“जानता हूं स्नेहा तुम इसे मां की तरह प्यार करती हो पर न जाने क्यों ऐसा लग रहा है कि यह ट्रेन मेरे लिए मौत लेकर आ रही है।” ट्रेन में चलते वक्त आखरी बार उसने यही कहा था स्नेहा से।
“मां पापा भी तो 10 साल पहले ऐसे ही दिल्ली से बनारस वाली ट्रेन में जो गए फिर लौटकर कभी आए ही नहीं।”
स्नेहा भी मन ही मन तो बहुत डर रही थी सुशांत की बातों से। पर उसने उसे हिम्मत दिलाई। अपने मां पापा को बहुत याद कर रहा है सुशांत शायद इसीलिए उसे ऐसा लग रहा है।
“मां पापा का आशीर्वाद आपके साथ हमेशा है। आप चिंता मत कीजिए इंटरव्यू बहुत अच्छा होगा।”
“भाई वहां से आते वक्त मेरे लिए कुछ लाईएगा जरूर।”
“हां मेरी लाडो क्या चाहिए तुझे? बस एक बार यह नौकरी लग जाए और अच्छी आमदनी होने लगे तो तेरे हाथ पीले करवा दूंगा। ढेर सारा सामान तुझे तेरी शादी में दूंगा।”
“भाई आप ऐसा क्यों बोलते हैं। ये शादी-वादी मुझे तो नहीं करनी। मुझे तो हमेशा अपने भाई भाभी के पास ही रहना है।”
“तेरे लिए तो राजकुमार खोज के लाऊंगा जो मेरी बहना को रानी की तरह रखेगा।”
“क्या पता भाई आपका राजकुमार मुझे रानी की जगह नौकरानी बना दे तो। मुझे तो कोई रिस्क नहीं लेना शादी करके मैं तो यहीं आप दोनों के साथ भली चंगी हूं।”
ट्रेन ने सीटी बजा दी थी। स्नेहा और गुड़िया दोनों को नीचे उतर कर आना ही पड़ा। बिल्कुल मन नहीं कर रहा था सुशांत को छोड़ने का। एक बार तो उसने कहा भी था चलो तुम दोनों को भी ले चलता हूं बनारस से घाट घुमा दूंगा।
,, पर गुड़िया की परीक्षाएं जो चल रही थी तो ऐसे में कैसे चली जातीं हम दोनों ननद भाभी उनके साथ।
सुशांत हर एक घंटे बाद फोन करके हमसे बात कर रहा था। स्नेहा ने उससे कहा भी था कि वह अपना फोन ऑन ही रखें आजकल तो ट्रेन में फोन चार्ज करने की सुविधा हर बॉगी में होती है।
“फोन स्विच ऑफ मत होने दीजिएगा। आपने अपना चार्जर तो रख लिया है ना संभाल कर।”
” हां बाबा… रख लिया है और मुझे तुम्हारी बात बिल्कुल ध्यान रहेगी। फोन करता रहूंगा।”
कुछ घंटे ही तो बीते थे सुशांत के गए हुए और दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। आंखों से नींद कोसों दूर थी।
“क्या हुआ भाभी नींद नहीं आ रही है क्या आपको? सो जाइए ना दिन भर की थकी हुईं हैं। बीमार पड़ गईं तो भाई को क्या जवाब दूंगी।”
“अच्छा मेरी दादी अम्मा आप भी तो नहीं सोई हैं, तो मैं कैसे सो जाऊं।”
“मेरी प्यारी भाभी कल भी इक्जाम है तो पढ़ना जरूरी है।”
परीक्षा की घड़ी तो अब स्नेहा की शुरू होने वाली थी जिससे वह उस समय बिल्कुल अनजान थी।
सुबह जब उसके घर में अखबार आया तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। यह तो वही ट्रेन है जिसमें सुशांत गया था जिसकी दुर्घटना की खबर मुख्य पृष्ठ पर ही थी।
ऐसा नहीं हो सकता। सुशांत मुझे और अपनी बहन को छोड़कर इस तरह नहीं जा सकता।
गुड़िया को उस समय कुछ भी बताना सही नहीं लगा पर उसकी नजर भी मेरे हाथ में पड़े पेपर पर चली ही गई और वह न्यूज़ उसने भी पढ़ ली।
“तुम एग्जाम देने के लिए जाओ मैं पता करती हूं।”
“नहीं भाभी पहले हमें भाई को ढूंढना है।”
रेलवे इंक्वायरी और पुलिस के दिए हुए उन नंबरों से कई बार फोन किया पर कुछ भी ठीक से पता चल ही नहीं पा रहा था ।इसलिए हम दोनों वहां दुर्घटना स्थल तक पहुंच गए बहुत ही भयावह स्थिति थी वहां की। कई शरीर क्षत विक्षत हालत में पड़े हुए थे।
वही दृश्य फिर से आंखों में घूम गया पूरे दिन हम लोग वहीं भटकते रहे मृतकों की सूची निकल गई उसमें सुशांत का नाम भी था।
दुनिया में सिर्फ एक ही तो नहीं है हो सकता है यह कोई और हो।
गुड़िया तो पागलों की तरह हो गई थी। उस दुर्घटना के दृश्य का उस पर बहुत ही बुरा असर पड़ा था। कई महीने लगातार उसका इलाज चला। सुशांत नहीं आया। साल भर होने को था पिछले करवा चौथ के अगले दिन ही तो यहां से गया था फिर आ गया था यह त्यौहार।
स्नेहा ने पूरे दिन निर्जला व्रत रखा था पिछले तीन साल की तरह ही।
वो अपने अतीत से वर्तमान में लौट आई थी। गुड़िया को बिस्तर पर सुला कर। पूजा करने के लिए बैठी ही थी कि फोन की घंटी बज उठी। मां का फोन था प्रणाम किया तो वो बोलीं सदा सुहागन रहो।
“मां आपका आशीर्वाद साथ है बस यही मुझे हिम्मत दिलाता है।”
“तू अपना विश्वास बनाए रख बिटिया। तेरा सुहाग हमेशा सही सलामत रहेगा। अच्छा ये बता पूजा कर ली तूने।”
“बस मां वही करने जा रही थी।”
” देखना तेरी पूजा जरूर सफल होगी।”
“मां से आशीर्वाद लेकर अकेले बैठकर ही पूजा कर ली उसने । रात को चांद देखने छत पर आ गई थी अपने सुशांत की फोटो हाथ में लिए।
गुड़िया भी उसके पीछे खड़ी थी।
आसमान में चांद निकल गया था जैसे ही उसने छलनी आगे कर आंखें बंद की… वो अपने सुशांत को बंद आंखों से देखने लगी।
गुड़िया को ऐसा लगा जैसे सीढ़ियों पर से कोई आ रहा है अपना भ्रम समझ वो थोड़ी देर खड़ी रही फिर जैसे ही उसने पलटकर देखा अपने भाई सुशांत को देख खुशी से उछल पड़ी।
सुशांत ने मुंह पर उंगली रख उसे चुप रहने का इशारा किया। फिर वह ठीक स्नेहा के आगे आकर खड़ा हो गया स्नेहा ने आंखें खोली तो छलनी से उसे सुशांत दिखाई दिया बंद आंखों में भी तो वही दिखाई दे रहा था खुली आंखों में भी उसी का चेहरा नजर आ रहा है।
सुशांत ने उसके सर पर हाथ रखा और उसे अपने हाथ से पानी पिलाया।
“आप आएंगे मुझे पूरा विश्वास था।”
“हां भैया गली मोहल्ले के सारे लोग झूठ बोलते थे मैंने तो भाभी से पहले ही कहा था की भैया को कुछ नहीं हुआ है मेरे कहने पर ही देखो भाभी ने इस बार भी यह व्रत रखा।”
सुशांत ने उस रेल दुर्घटना में अपने साथ हुए हादसे के बारे में बताया कैसे वो चलती ट्रेन से कूद गया था जब उसने देखा उसमें आग लग रही है उसने कई लोगों को बचाने की कोशिश की पर वो कब नदी में बह गया वो जान ही नहीं पाया। ट्रेन का आधा हिस्सा नदी में लटक गया था। कुछ लोगों ने उसे नदी में डूबने से बचाया। उसे काफी समय कुछ याद ही नहीं आ रहा था कि वो कौन है कहां से आया है। अभी कुछ दिन पहले ही उसे सब याद आ गया।
स्नेहा का सुहाग लौट आया था उसका विश्वास और उसकी आस्था जीत गई थी।
