Hindi Kahani: मैं जब थक हार कर घर आती तो मुझे लगता कि मेरे बच्चे दो मिनट आकर मेरे पास बैठे और पूछें ‘मम्मी तुम काम कर थक गई हो! लेकिन किसी के पास समय नहीं हुआ करता था।
‘यह मिसेज त्रिपाठी भी ना हद करती है! जहां देखो अपने डॉगी के साथ पहुंच जाती हैं!
दिनभर उसके बालों पर हाथ फिराएंगी या बालों पर कंघी करेंगी। अपने पर्स से नट्स निकाल कर उसे खिलाती रहेंगी। जैसे ये डॉगी ना हो कोई उनका अपना बेटा हो गया।
जब से मिसेज अनन्या त्रिपाठी इस मोहल्ले में आई थी, मोहल्ले भर में यह बात जोर शोर से चलती रहती थी।
चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट, आंखों में काला चश्मा और कंधे पर एक छोटा पर्स!
पेशे से वह एक अनुमंडल पदाधिकारी यानी सीओ थी। अपने प्रशासनिक काम के बीच यथासंभव सबकी मदद का प्रयास भी किया करती थीं। अभी हाल में ही वह इस मोहल्ले में शिफ्ट हुई थीं। छोटा शहर था इसलिए मोहल्ले वालों को उत्सुकता ज्यादा थी मिसेज अनन्या त्रिपाठी के बारे में जानने की।
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पता चला दो बेटे थे, दोनों बाहर कहीं पढ़ रहे थे।
पति अपने आप में ही व्यस्त रहते थे और मिसेज त्रिपाठी क्योंकि वॄकग थी और वह भी प्रशासनिक अधिकारी तो उनकी व्यस्तता ज्यादा थी। वह ज्यादा किसी से बातचीत नहीं करती थीं।
खाली समय में वह और उनका डॉगी एक साथ समय बिताया करता था। इस क्षेत्र के विकास के लिए उन्होंने काफी काम किया था। जनता के बीच वह खासी लोकप्रिय थी। उस क्षेत्र के हिंदी साहित्य अकादमी ने बुजुर्गों को डिप्रेशन से बचाने और बुजुर्गों को सकारात्मकता की तरफ झुकाने के लिए एक प्रोग्राम रखा था, जिसमें अनन्या त्रिपाठी को चीफ गेस्ट बनाकर बुलाया गया था।
प्रोग्राम का शीर्षक था, ‘जिंदगी का खालीपन! उस क्षेत्र के सभी रिटायर्ड और घर की बुजुर्ग महिलाओं को आमंत्रित किया गया था।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य था सभी रिटायर्ड लोगों के लिए एक सकारात्मक पहल करना।
मंच पर आकर सभी बुजुर्ग अपने अकेलेपन और अपनी मजबूरियां बता रहे थे। उनका हल किसी के पास नहीं था। वो सभी सिर्फ अपना दुखड़ा सुना रहे थे कि रिटायरमेंट के बाद जिंदगी में खालीपन भर जाता है। अंत में मिसेज त्रिपाठी जी को बोलना था। वह मंच में आईं। उन्होंने कहा, ‘मैं अपने घर की सबसे बड़ी बेटी थी। माता-पिता की इच्छा मेरे ऊपर कूट-कूट कर भरी हुई थी।
वह बस यह चाहते थे कि मैं किसी भी तरह से स्कूल में टॉप करूं।
मेरी अपनी आजादी खत्म हो गई। मेरे अंदर तब से ही खालीपन आने लगा था। मैं दिन रात पढ़ाई में जूझती रहती थी।
मैंने टॉप किया। मैं खुश थी पर मुझसे ज्यादा खुश मेरे माता-पिता थे।
मैं उनका चेहरा देखती रही। मुझसे यह आशा उनकी अनवरत बनी रही।
फिर धीरे-धीरे कॉलेज और प्रशासनिक परीक्षा भी पास कर लिया। उनके चेहरे पर गर्व भरी मुस्कुराहट आ गई। पर मेरे अंदर कितना खालीपन था यह उन लोगों ने महसूस नहीं किया।
एक नई जगह पर अपनी पहचान बनाना कितना कठिन होता है फिर धीरे-धीरे मैं जॉब की तरफ अग्रसर होती चली गई।
मेरी जिंदगी का खालीपन बढ़ता गया फिर मैंने अपने ही मित्र के साथ शादी कर ली। यह शादी नहीं एक तरह का कॉन्ट्रैक्ट था जिसे हम दोनों आज तक निभा रहे हैं। इस शादी से हमारे दोनों बच्चे हुए। दोनों बच्चों को हमने बढ़िया स्कूल में डाला था कि उनकी स्कूली शिक्षा और संस्कार अच्छे मिलें लेकिन यहां भी मैं हार ही गई। बच्चों के पास भी मेरे लिए टाइम नहीं था।
मैं जब थक हार कर घर आती तो मुझे लगता कि मेरे बच्चे दो मिनट आकर मेरे पास बैठे और पूछें ‘मम्मी तुम काम कर थक गई हो! लेकिन किसी के पास समय नहीं हुआ करता था।
हां किसी को पैसे चाहिए किसी को कोई सामान चाहिए तो मेरे पास दर्जनों मैसेज से लेकर फोन तक आ जाता था। लेकिन बगैर काम को याद भी नहीं करना चाहता था। मेरी जिंदगी का सारा खालीपन मेरे इस पप्पी ने हर लिया।
मुझे मेरे कलिग ने यह मेरे जन्मदिन पर तोहफा दिया था। यह तोहफा नहीं ईश्वर का वरदान था, नहीं तो मैं आज किसी पागल खाने में होती या अपने दिमाग का इलाज करा रही होती!
किसी ने मेरी जिंदगी के खालीपन को पूरी तरह से खत्म कर दिया। जब मैं घर लौटती काम से थक कर हारकर, तब यह कूंकूं करता हुआ अपने पूंछ हिलाते और अपने कान खड़े किए। जब तक मैं इसे अपने गोद में ना उठा लेती। जब मैं इसे गोद में उठाकर इसे कुछ खिला देती फिर खुश हो जाता फिर यह दौड़ लगाना शुरू करता था।
वह देख लेता कि मैं ने कुछ खा लिया या चाय पी ली है! अब मैं फ्री हूं और फ्रेश हूं तब यह मुझे खींचकर बाहर गैलरी में ले जाता और मुझे अपने साथ दौड़ाया करता था।
जब इसे नींद आती मेरे टांगों के बीच में घुसकर सो जाता और तिरछी निगाहों से मुझे देखता रहता।
हां जब मैं सो जाती थी तो सुबह यह आकर उठाया करता।
सुबह उठाने का काम बदस्तूर अभी भी जारी है!
मिसेज त्रिपाठी थोड़ा रुकीं फिर वहां उपस्थित सभी लोगों को संबोधित करते हुए बोली, ‘देखिए बहनों भाइयों, हमें अपने जीने का ढंग बदलना होगा। हमने जिसको प्यार दिया जरूरी नहीं कि वह हमसे प्यार करें।
हमें आंख खोलकर देखना है कि हम से कौन प्यार करता है!
वह हमारे सामने हमारे घरों में मौजूद पेड़ पौधे भी हो सकते हैं, उन पेड़ पौधों पर बैठने वाले पक्षी भी हो सकते हैं।
हमारे घरों में रहने वाले मूक जानवर जो हमारे घर में रहकर हमारी रक्षा करते हैं, यह भी हो सकते हैं।
मेरा बस यह कहना है कि हम अपने आपको डिप्रेशन से बचाएं और अपने सोचने का और देखने का नजरिया बदलें, तभी हम डिप्रेशन से बचे रहेंगे और अपनी जिंदगी के खालीपन को दूर करेंगे।
मिसेज त्रिपाठी की बात सुनकर पूरे सभा में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।
