स्वामी विवेकानंद भले ही रामकृष्ण परमहंस जी के शिष्य थे। परंतु वे अपना एक अलग व्यक्तित्व भी रखते थे। वे कभी सच्ची बात कहने से पीछे नहीं हटते थे। कई बार उनकी बातें सुनने वालों को अजीब भी लगती थीं पर उन बातों में गहरा सार छिपा होता था ।
स्वामी जी बहुत बलशाली थे। उन्हें कुश्ती, मुक्केबाजी, तैराकी व घुड़दौड़ आदि का अच्छा शौक था। उन्हें घोड़े पर सवारी करनी अच्छी लगती थी। वे यही मानते थे एक बलशाली शरीर में ही बलशाली दिमाग का वास हो सकता है इसलिए हमें अपने शरीर की स्वास्थ्य रक्षा करनी चाहिए।
एक बार एक नौजवान उनके पास आया और बोला-
“ मैं धर्मशास्त्र का अध्ययन करना चाहता हूं।”
स्वामी जी ने सामने मैदान में फुटबॉल खेल रहे लड़कों की ओर इशारा करते हुए कहा-
“यदि तुम धर्म की शिक्षा और सेवा करना चाहते हो तो वहां मैदान में जा कर फुटबॉल खेलो। इससे तुम्हारी धर्म की रक्षा अपने-आप हो जाएगी।”
यह बात उस नौजवान को समझ नहीं आई। तब स्वामी जी ने उसे समझाया कि एक स्वस्थ समाज ही जीवन के सभी पहलुओं व धर्म की रक्षा कर सकता है इसलिए हमें अपने शरीर को बलशाली बनाने पर भी ध्यान देना चाहिए। देश के नौजवान अगर बलशाली होंगे तो वे अपने मार्ग में आने वाले किसी भी विरोध का सामना कर सकेंगे और एक आदर्श समाज बनाने की पहल कर सकेंगे।

स्वामी जी सकारात्मक मानसिक शक्ति पर भी बहुत बल देते थे। उनका मानना था कि असली शक्ति हमारे अंदर छिपी होती है। वे कहते थे- सकारात्मक सोच वाला इंसान ही जीवन में आगे बढ़ सकता है। नकारात्मक सोच रखने वाला आगे नहीं जा सकता। सकारात्मक विचार जीवन में आशा का संचार करते हैं। इन विचारों से व्यक्ति का मनोबल बढ़ता है। उसके भीतर की शक्तियां और भी जाग जाती हैं। “
जब कभी काम के बारे में चर्चा होती तो स्वामी जी उत्साह पर बल देते हुए कहते-
“उत्साह से अपने दिल को भर लो और काम पर जुट जाओ। काम करो, काम करो। नेतृत्व करते समय सब के दास हो जाओ। निःस्वार्थ हो जाओ और कभी एक मित्र को पीठ पीछे दूसरे की निंदा करते मत सुनो । अनंत धैर्य रखो। तभी सफलता तुम्हारे पास आएगी। असत्य को अपने पास मत आने दो।
इस तरह चाहे थोड़ा समय लगे पर सफल अवश्य होंगे। इस तरह काम करते जाओ मानो मैं कभी था ही नहीं! इस तरह काम करो कि मानो तुममें से हरेक के ऊपर ही सारा काम निर्भर है।

भविष्य की पचास सदियां तुम्हारी ओर ताक रही हैं। भारत का आने वाला कल तुम पर ही निर्भर करता है। काम करते जाओ। दूसरे के लिए रत्ती भर भी काम करने से हृदय में सिंह जैसा बल आ जाता है ||
भले ही मैं तुमसे स्नेह करता हूं पर अगर तुम दूसरों के लिए परिश्रम में लग कर जान देते हो तो, उसे देख कर भी मुझे खुशी ही होगी। काम में लग जा – कितने दिनों के लिए है ये जीवन ? संसार में जब आया है तो एक स्मृति छोड़ कर जा वरना पेड़ और पत्थर भी तो पैदा और नष्ट होते रहते हैं । “

